हर फूल को अपना समझती रहीं,
जुगनू अपनी ही रौशनी में डूबे रहे,
उन्हें कहाँ दिखी मेरी बुझी सी परछाई।
मैंने शब्दों में नहीं — सन्नाटों में लिखा था,
कागज़ नहीं, अपनी साँसों पर अंकित किया था,
पर मेरी किताब तक कोई पहुँचा ही नहीं —
सिवाय उन दीमकों के,
जो हर अक्षर को भीतर तक चबाकर समझ गए,
कि मैं जी नहीं रही थी, बस घुल रही थी धीरे-धीरे…
तितलियों ने रंग देखा, पर दर्द नहीं,
जुगनुओं ने रोशनी देखी, पर आग नहीं,
जो सच में पढ़ सकता था मुझे,
वो शायद अब भी किसी और कहानी में उलझा है…
🙏🙏
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