रविवार, 23 नवंबर 2025

पूरी हु...

तुम्हारे एहसासों के दरमियां,
कहीं एक अनसुना मौसम पलता है,
जहाँ धूप भी चुपके से
छांव के गले लगकर रो लेती है।

तुम्हारे एहसासों के बीच में
कुछ सपनों के पंख सुनाई देते हैं,
जिनकी उड़ानों से पहले
हवा दुआ बनकर पीछे चलती है।

एक अधूरा सा नाम है वहाँ
जो होठों पर नहीं टिकता,
और एक पूर्ण कहानी है
जो दिल की दीवारों पर लिखता —
सिर्फ तुम्हारी नब्ज़ की भाषा में।

मेरी धड़कनों का शहर
तुम्हारे अहसासों में ही बसता है,
जहाँ हर सड़क
तुम्हारी तरफ ही मुड़ जाती है।

वहाँ कोई शोर नहीं,
न ही दुनिया के झूठे तराजू,
सिर्फ सच्चाई की बारिश है
जो मेरे भीतर तक भीग जाती है।

तुम्हारे एहसासों के मोड़ पर
मेरी सोच अपना घर बनाती है,
हंसी की खिड़कियाँ खोल
रोशनी को आवाज़ देती है —
"आ जा, मैंने तुझे पहचान लिया है!"

इन एहसासों की गलियों में
जब तुम मुस्कुराते हो,
तो लगता है जैसे कहानियाँ
किसी चमत्कार की भाषा बोलती हैं।

और जब तुम ख़ामोश होते हो,
तब हर शब्द
मेरी पलकों पर रखे हुए
आंसुओं को समझाता है —
"ये भी मोहब्बत है..."

तुम्हारे एहसासों के दरमियां
मेरे अस्तित्व की कविता है,
जिसे लिखते हुए
मैं खुद को बार-बार तुम करती जाती हूँ।

शायद यही इश्क़ है—
जहाँ तुम हो,
पर कहां?
कोई नहीं जानता,
सिवाय मेरे दिल के,
जो हर धड़कन में
तुम्हारा नाम पुकारता है…

हर रात, हर सवेरे—
तुम्हारे एहसासों के दरमियां
मैं ज़िंदा हूँ,
मैं पूरी हूँ,
मैं… तुम हूँ। 

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