रविवार, 9 नवंबर 2025

जुदाई

हर मुलाक़ात… जैसे कोई किस्सा अधूरा रह गया,
हर जुदाई… दिल में एक मौसम-सा ठहरा रह गया।

कभी ग़ज़लों में सुनी थी फ़िराक़ की बातें,
पर जब खुद पे गुज़री… तो एहसास नया रह गया।

वक़्त ने तो बस अपनी रवानी निभाई,
मगर हर मोड़ पर दिल… फिर वही ज़ख्म पा गया।

अब समझ आई… इश्क़ सिर्फ अल्फ़ाज़ नहीं होता,
कभी सुकून दे जाता है… कभी तन्हाई सिखा जाता है।

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