शनिवार, 30 दिसंबर 2017

तुम और मैं

इस जमाने मे उस जमाने की बातें किया करते है।
एक हम है दोस्तो जो बेबाक ही जिया करते है।।

कभी कोई अलाप नही पुराने रागों का मुझपर।
हम तो हर रोज एक नया धुन रचा करते है।।

जिसको देखो यहाँ गुमान है अपनी हस्ती का।
एक हम है जो जमीं पर औकात देखा करते है।।

नई रवायतें ना चढ़ी ना अदावतों का पर्दा ही लगा।
हम तो आंखों में तसव्वुर को छुपा के रखते है।।

कोई मिटा के दिखाए खुद को किसी के लिए।
हम तो हर रोज हर वक्त तुझपर ही मिटा करते है।।

मुझको गिला नही तू रह पुराने ढर्रे पर अपने।
हम तो हर रोज एक नया आसमान गढ़ते है।।

डॉ दिव्या पाठक

सोमवार, 25 दिसंबर 2017

औरत की जिंदगी

तुम जली तो साथ मे तुम्हारे सारे सपने जल गए...ऐसा क्यों हुवा तुम्हारे साथ मन बहुत व्यथित हो गया सुनकर...तुम तो जिंदादिल औरत थी संस्कारी सभ्य और हुनरमंद..फिर क्यों जला दिया तुम्हे क्या नही कर पाई...
  वाह रे दुनियाँ सारी त्रासदी का अंत केवल औरत को जलाकर ही होता है क्या???
चूल्हे में तपती औरत की जिंदगी
इच्छाओ की लकड़ी पर
सपनो को जलाकर
रोज झुलसती औरत की जिंदगी
ना खुद के अरमान
ना खुद के सपने
ना कोई अपना वजूद
फिर भी उलझती सी औरत की जिंदगी
भूमिकाये अलग अलग
माँ बहन बेटी बहु बीबी
गजब की कलाकार है
हर किरदार में है औरत की जिंदगी
कभी दायरा तो कभी दीवार
कुछ भी नही लांघती
फिर भी कैद फिर भी कैद
रोज दीवारों में चुनती औरत की जिंदगी
संस्कारो की चादर में समेटकर
दहलीज के अंदर समाये है
अपने ही अंदर घुटकर
मर्यादा को बचाये है
फिर भी जलती है हरबार औरत की जिंदगी।

मंगलवार, 3 अक्टूबर 2017

काश जिंदगी कविता होती

काश की जिंदगी कविता होती
रोज पढ़ती एक एक करके
रोज लिखती एक एक करके
सांसो की डोर से शब्दों के
ताने बाने बुनती
दिल की धड़कनों से
उतार चढ़ाव लिखती
लहू के रंग से स्याही बनाती
काश की जिंदगी एक कविता होती
जीवन के अनुभव भरती
कोरे कागज को स्याह करती
आँसुवों की रबड़ बनाकर
दुःख के पल को मिटाती
सुख लिखती बस सुख लिखती
काश की जिंदगी एक कविता होती।

गुरुवार, 21 सितंबर 2017

फिर वही किताबें दे दो

मेरे हाथों में फिर से वहीे किताबे दे दो।
जिंदगी का एक और सबक पढ़ना है।।

बहुत मुश्किल से चल रहे है कदम मेरे।
अब आसान सा एक पंथ गढ़ना है।।

कही छाँव तो कही धुप की बाते होगी।
जीवन के हर रंग में मुझको ढलना है।।

पत्थरों के शहर में आ तो गयी हूँ चलके।
बनके मोम सा अब मुझे पिघलना है।।

देदो ना किताबें फिर से मुझको एक बार।
जीवन के छूटे सबक को पढ़ना है।।

मंगलवार, 20 जून 2017

जिंदगी आ रही हूँ मैं

आंखों में कुछ सपने लिए
दिल मे कुछ अरमान लिए
तेरे ही सब फरमान लिए
जिंदगी आ रही हूँ मैं...

कोई भी अब क्या बोलेगा
मुझको अब कितना तोलेगा
छोड़ के सारे शिकवे गीले
जिंदगी आ रही हूँ मै...

खूब निभाई हमने यारी
जीने की है अब तैयारी
रोकर मुझको क्या मिलेगा
जिंदगी आ रही हूँ मैं....

देखी ऐसी दुनिया दारी
खुदगर्जी की है बीमारी
भूल गयी अब समझदारी
जिंदगी आ रही हूँ मैं...

संघर्ष नही सुकून दे
सूनापन नही हुजूम दे
अब आयी है मेरी बारी
जिंदगी आ रही हूँ मैं...

सोमवार, 15 मई 2017

Ptita

जिंदगी की रफ़्तार कोई नही समझ पाता कब और कैसे रास्ते से मुड़ जाए और निर्वाध गति से बढ़ती चली जाए शायद भाग्य की ही बिडम्बना कही जा सकती है मैंने देखा है उसे बचपन से लेकर जवानी तक, बचपन में खिलौनों के बीच खेलती हुयी मासूम सी लड़की ।सुख साधन का कोई अभाव न था प्यार सम्मान में कोई कमी न थी पढ़ाई लिखाई में अब्बल थी।देखते ही देखते मेरी आँखो के सामने बड़ी हुयी अब उसके ब्याह की चिंता, माँ बाऊजी दिन रात अच्छे रिश्ते की खोज में लग गए। एक दिन पता चलता है की उस गुड़िया का ब्याह भी तय हो गया नियत समय पर ब्याह हुवा और अपने ससुराल चली गयी। मै तो पडोसी ठहरी पर उसे देखकर खुश होना मेरी आदत में बस गयी थी।उसके जाने के बाद कई दिनों तक उसकी कमी मुझे खलती।पर बेटी थी ससुराल तो जाना था यही सोचकर दिल को तसल्ली दे दी।
  दिन महीने साल गुजर गए उसे नही देखा धीरे धीरे उसकी यादें भी धुंधली होने लगी तभी एक दिन वो दिखती है बिछिप्त सी एक बच्ची की ऊँगली पकड़े और एक बच्चा पेट में लिए हुए।
बाल उलझे से साड़ी अस्तव्यस्त रोती हुयी आते हुए। अभी अपने मायके की चौखट पर ही पहुची थी की मुझसे रहा नही गया मै दौड़ गयी उसके घर के लिए। और उसे बाँहो में भर लिया पूछ बैठी बिटिया क्या हुवा कैसा हाल बना रखा है बता मुझे।
     उसका तो गला ही सुख गया था हलक से दो शब्द भी ना निकल पाये बस रोती रही। तभी मैंने उसकी माँ को आवाज दिया- बहन जी देखो गुड़िया आई है। माँ बाहर आई साथ में पिता भाई और भाभी भी।माँ ने आते ही कहा क्या गुड़िया मैंने कहा था ना की कोई गलत कदम मत उठाना। अभी अभी जमाई बाबू का फोन आया था की आपकी बेटी चली गयी आपके यहाँ अब चली गयी तो उसे कभी यहाँ मत भेजना। बोल अब क्या तू मायके में ही जीवन भर रहेगी। तू अकेली होती तो भी ठीक ये तेरी जिम्मेदारियो को कौन संभालेगा। तेरे बाबूजी भी रिटायर हो गए है तू तो बोझ बन के आ गयी।
     उनकी बाते सुनकर मै स्तब्ध सी रह गयी कुछ सोचने लगी।फिर बोली बहन जी गुड़िया पेट से है इसे सहारा तो देना ही पड़ेगा।अगर आपको कोई परेशानी ना हो तो इसे मेरे साथ भेज दो भगवान् ने मुझे औलाद सुख नही दिया कुछ दिन मै भी माँ बन के इसकी देखभाल कर लूँ बच्चा होने के बाद इसके ससुराल वालो से बात कर लेंगे। मुझे बड़ा आश्चर्य हुवा की उसकी माँ ने बिना किसी टाल मटोल के गुड़िया को मेरे साथ दरवाजे से ही भेज दिया। लेकिन मै समझ सकती थी उसे क्या महसूस हो रहा था।
    समय बीतता गया ससुराल से आने के ठीक बीस दिन बाद गुड़िया ने एक बहुत ही सुंदर बेटे को जन्म दिया ये खबर मैंने जब गुड़िया के माँ के पास भेजी तो उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नही दी और ना ही बेटी और नाती को देखने की इच्छा जताई।मै बोझिल मन से वापस आ गयी।गुड़िया ने भी कुछ नही पूछा मानो उसे सब पता हो। उसकी आँखो से आँसू गिर रहे थे। मैंने उसे सीने से लगाया और कहाँ- की शायद मुझे भगवान् ने इसी लिए बेऔलाद रखा था क्योंकि तू मेरी किस्मत में थी। खैर गुड़िया अब सम्भल गयी थी और मुझे माँ कहने लगी।
  नवंबर का महीना था तबतक बच्चा डेढ़ महीने का हो गया था हम धुप में बच्चे को लेकर बैठे थे तभी गुड़िया ने कहाँ-माँ एक बार मेरे पति से बात कर लो क्या पता बेटे के बारे में जानकर उनका गुस्सा गायब हो जाए और वो हमे अपना ले।मैंने कहाँ ठीक तू फोन लेकर आ मै अभी बात करती हूँ। वो अंदर से फोन लेकर आई तो मैंने नम्बर पूछकर मिलाया जमाई बाबू ने ही फोन रिसीव किया थोड़ी सी औपचारिकता के बाद मैंने उन्हें गुड़िया और उसके बेटे के बारे में बताया की अचानक फोन कट हो गया। मुझे लगा की नेटवर्क की वजह से फोन कट गया। मैंने फिर से फोन मिलाया पर फोन नही उठा। मै बार बार फोन मिलाती रही की अचानक फोन किसी महिला ने उठा लिया मैंने कहा की संजय जी(जमाई बाबू का नाम) से बात कराओ तो उसने कहा की मै संजय की बीबी बोल रही हूँ आप बताईये क्या बात है मै उन्हें बता दूँगी। ये सुनते ही मेरे हाथ से फोन छूट गया और मेरा शरीर बुरी तरह काँपने लगा। मै समझ नही पा रही थी  की क्या कहूँ। गुड़िया ने मुझे देखा तो परेशान होक पूछने लगी माँ बताओ ना क्या हुवा? बेबस सी मै बस इतना ही कह पायी----ये कर्म क्षेत्र है आगे बढ़!!
   वो समझ गयी की कुछ गलत हुवा है पर क्या ये नही पूछा बस बोली माँ मै भी पतिता हो गयी। और रोती हुयी अपने कमरे में चली गयी। मैंने उसे बहुत समझाया शायद वो समझ भी गयी तभी उसने अपने मांग का सिंदूर पैरो की बिछुवा गले का मंगलसूत्र और हाथो की चूड़िया निकाल फेकी। उसका ये रूप देखकर मै सदमे में थी की तभी वो बोली--माँ मै पतिता नही ये कर्म क्षेत्र है मेरा साथ दो मै आगे बढ़ना चाहती हूँ मुझे आशीर्वाद दो।
  सच मानिए मेरी ख़ुशी का कोई ठिकाना ही नही रहा मै तुरन्त अंदर गयी और आलमारी में से कुछ पैसे निकाल कर उसे दे दी बोली--बेटा तू अपना सफर तय कर मै तेरे साथ हूँ। गुड़िया ने अगले दिन ही जाकर बीएड का फॉर्म भरा और मेहनत से पढ़ने लगी उसने 85 %मार्क से बीएड क़्वालीफाई किया। गुड़िया के पंख निकल आये है अब उड़ान भरने की देरी है। उसे देखकर यही लगता है की---
मुश्किलें किसी को तोड़ती नही बल्कि हौसला देती है की वो अपने कर्म क्षेत्र में आगे बढ़ सके जरूरत है समाज को जागरूक करने का की वो किसी को रास्ता दिखाकर उसका सम्बल बने।।
         #धन्यवाद 
डॉ दिव्या पाण्डेय 
गोला बाजार गोरखपुर
उत्तर प्रदेश

Ptita

जिंदगी की रफ़्तार कोई नही समझ पाता कब और कैसे रास्ते से मुड़ जाए और निर्वाध गति से बढ़ती चली जाए शायद भाग्य की ही बिडम्बना कही जा सकती है मैंने देखा है उसे बचपन से लेकर जवानी तक, बचपन में खिलौनों के बीच खेलती हुयी मासूम सी लड़की ।सुख साधन का कोई अभाव न था प्यार सम्मान में कोई कमी न थी पढ़ाई लिखाई में अब्बल थी।देखते ही देखते मेरी आँखो के सामने बड़ी हुयी अब उसके ब्याह की चिंता, माँ बाऊजी दिन रात अच्छे रिश्ते की खोज में लग गए। एक दिन पता चलता है की उस गुड़िया का ब्याह भी तय हो गया नियत समय पर ब्याह हुवा और अपने ससुराल चली गयी। मै तो पडोसी ठहरी पर उसे देखकर खुश होना मेरी आदत में बस गयी थी।उसके जाने के बाद कई दिनों तक उसकी कमी मुझे खलती।पर बेटी थी ससुराल तो जाना था यही सोचकर दिल को तसल्ली दे दी।
  दिन महीने साल गुजर गए उसे नही देखा धीरे धीरे उसकी यादें भी धुंधली होने लगी तभी एक दिन वो दिखती है बिछिप्त सी एक बच्ची की ऊँगली पकड़े और एक बच्चा पेट में लिए हुए।
बाल उलझे से साड़ी अस्तव्यस्त रोती हुयी आते हुए। अभी अपने मायके की चौखट पर ही पहुची थी की मुझसे रहा नही गया मै दौड़ गयी उसके घर के लिए। और उसे बाँहो में भर लिया पूछ बैठी बिटिया क्या हुवा कैसा हाल बना रखा है बता मुझे।
     उसका तो गला ही सुख गया था हलक से दो शब्द भी ना निकल पाये बस रोती रही। तभी मैंने उसकी माँ को आवाज दिया- बहन जी देखो गुड़िया आई है। माँ बाहर आई साथ में पिता भाई और भाभी भी।माँ ने आते ही कहा क्या गुड़िया मैंने कहा था ना की कोई गलत कदम मत उठाना। अभी अभी जमाई बाबू का फोन आया था की आपकी बेटी चली गयी आपके यहाँ अब चली गयी तो उसे कभी यहाँ मत भेजना। बोल अब क्या तू मायके में ही जीवन भर रहेगी। तू अकेली होती तो भी ठीक ये तेरी जिम्मेदारियो को कौन संभालेगा। तेरे बाबूजी भी रिटायर हो गए है तू तो बोझ बन के आ गयी।
     उनकी बाते सुनकर मै स्तब्ध सी रह गयी कुछ सोचने लगी।फिर बोली बहन जी गुड़िया पेट से है इसे सहारा तो देना ही पड़ेगा।अगर आपको कोई परेशानी ना हो तो इसे मेरे साथ भेज दो भगवान् ने मुझे औलाद सुख नही दिया कुछ दिन मै भी माँ बन के इसकी देखभाल कर लूँ बच्चा होने के बाद इसके ससुराल वालो से बात कर लेंगे। मुझे बड़ा आश्चर्य हुवा की उसकी माँ ने बिना किसी टाल मटोल के गुड़िया को मेरे साथ दरवाजे से ही भेज दिया। लेकिन मै समझ सकती थी उसे क्या महसूस हो रहा था।
    समय बीतता गया ससुराल से आने के ठीक बीस दिन बाद गुड़िया ने एक बहुत ही सुंदर बेटे को जन्म दिया ये खबर मैंने जब गुड़िया के माँ के पास भेजी तो उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नही दी और ना ही बेटी और नाती को देखने की इच्छा जताई।मै बोझिल मन से वापस आ गयी।गुड़िया ने भी कुछ नही पूछा मानो उसे सब पता हो। उसकी आँखो से आँसू गिर रहे थे। मैंने उसे सीने से लगाया और कहाँ- की शायद मुझे भगवान् ने इसी लिए बेऔलाद रखा था क्योंकि तू मेरी किस्मत में थी। खैर गुड़िया अब सम्भल गयी थी और मुझे माँ कहने लगी।
  नवंबर का महीना था तबतक बच्चा डेढ़ महीने का हो गया था हम धुप में बच्चे को लेकर बैठे थे तभी गुड़िया ने कहाँ-माँ एक बार मेरे पति से बात कर लो क्या पता बेटे के बारे में जानकर उनका गुस्सा गायब हो जाए और वो हमे अपना ले।मैंने कहाँ ठीक तू फोन लेकर आ मै अभी बात करती हूँ। वो अंदर से फोन लेकर आई तो मैंने नम्बर पूछकर मिलाया जमाई बाबू ने ही फोन रिसीव किया थोड़ी सी औपचारिकता के बाद मैंने उन्हें गुड़िया और उसके बेटे के बारे में बताया की अचानक फोन कट हो गया। मुझे लगा की नेटवर्क की वजह से फोन कट गया। मैंने फिर से फोन मिलाया पर फोन नही उठा। मै बार बार फोन मिलाती रही की अचानक फोन किसी महिला ने उठा लिया मैंने कहा की संजय जी(जमाई बाबू का नाम) से बात कराओ तो उसने कहा की मै संजय की बीबी बोल रही हूँ आप बताईये क्या बात है मै उन्हें बता दूँगी। ये सुनते ही मेरे हाथ से फोन छूट गया और मेरा शरीर बुरी तरह काँपने लगा। मै समझ नही पा रही थी  की क्या कहूँ। गुड़िया ने मुझे देखा तो परेशान होक पूछने लगी माँ बताओ ना क्या हुवा? बेबस सी मै बस इतना ही कह पायी----ये कर्म क्षेत्र है आगे बढ़!!
   वो समझ गयी की कुछ गलत हुवा है पर क्या ये नही पूछा बस बोली माँ मै भी पतिता हो गयी। और रोती हुयी अपने कमरे में चली गयी। मैंने उसे बहुत समझाया शायद वो समझ भी गयी तभी उसने अपने मांग का सिंदूर पैरो की बिछुवा गले का मंगलसूत्र और हाथो की चूड़िया निकाल फेकी। उसका ये रूप देखकर मै सदमे में थी की तभी वो बोली--माँ मै पतिता नही ये कर्म क्षेत्र है मेरा साथ दो मै आगे बढ़ना चाहती हूँ मुझे आशीर्वाद दो।
  सच मानिए मेरी ख़ुशी का कोई ठिकाना ही नही रहा मै तुरन्त अंदर गयी और आलमारी में से कुछ पैसे निकाल कर उसे दे दी बोली--बेटा तू अपना सफर तय कर मै तेरे साथ हूँ। गुड़िया ने अगले दिन ही जाकर बीएड का फॉर्म भरा और मेहनत से पढ़ने लगी उसने 85 %मार्क से बीएड क़्वालीफाई किया। गुड़िया के पंख निकल आये है अब उड़ान भरने की देरी है। उसे देखकर यही लगता है की---
मुश्किलें किसी को तोड़ती नही बल्कि हौसला देती है की वो अपने कर्म क्षेत्र में आगे बढ़ सके जरूरत है समाज को जागरूक करने का की वो किसी को रास्ता दिखाकर उसका सम्बल बने।।
         #धन्यवाद 
डॉ दिव्या पाण्डेय 
गोला बाजार गोरखपुर
उत्तर प्रदेश

Ptita

जिंदगी की रफ़्तार कोई नही समझ पाता कब और कैसे रास्ते से मुड़ जाए और निर्वाध गति से बढ़ती चली जाए शायद भाग्य की ही बिडम्बना कही जा सकती है मैंने देखा है उसे बचपन से लेकर जवानी तक, बचपन में खिलौनों के बीच खेलती हुयी मासूम सी लड़की ।सुख साधन का कोई अभाव न था प्यार सम्मान में कोई कमी न थी पढ़ाई लिखाई में अब्बल थी।देखते ही देखते मेरी आँखो के सामने बड़ी हुयी अब उसके ब्याह की चिंता, माँ बाऊजी दिन रात अच्छे रिश्ते की खोज में लग गए। एक दिन पता चलता है की उस गुड़िया का ब्याह भी तय हो गया नियत समय पर ब्याह हुवा और अपने ससुराल चली गयी। मै तो पडोसी ठहरी पर उसे देखकर खुश होना मेरी आदत में बस गयी थी।उसके जाने के बाद कई दिनों तक उसकी कमी मुझे खलती।पर बेटी थी ससुराल तो जाना था यही सोचकर दिल को तसल्ली दे दी।
  दिन महीने साल गुजर गए उसे नही देखा धीरे धीरे उसकी यादें भी धुंधली होने लगी तभी एक दिन वो दिखती है बिछिप्त सी एक बच्ची की ऊँगली पकड़े और एक बच्चा पेट में लिए हुए।
बाल उलझे से साड़ी अस्तव्यस्त रोती हुयी आते हुए। अभी अपने मायके की चौखट पर ही पहुची थी की मुझसे रहा नही गया मै दौड़ गयी उसके घर के लिए। और उसे बाँहो में भर लिया पूछ बैठी बिटिया क्या हुवा कैसा हाल बना रखा है बता मुझे।
     उसका तो गला ही सुख गया था हलक से दो शब्द भी ना निकल पाये बस रोती रही। तभी मैंने उसकी माँ को आवाज दिया- बहन जी देखो गुड़िया आई है। माँ बाहर आई साथ में पिता भाई और भाभी भी।माँ ने आते ही कहा क्या गुड़िया मैंने कहा था ना की कोई गलत कदम मत उठाना। अभी अभी जमाई बाबू का फोन आया था की आपकी बेटी चली गयी आपके यहाँ अब चली गयी तो उसे कभी यहाँ मत भेजना। बोल अब क्या तू मायके में ही जीवन भर रहेगी। तू अकेली होती तो भी ठीक ये तेरी जिम्मेदारियो को कौन संभालेगा। तेरे बाबूजी भी रिटायर हो गए है तू तो बोझ बन के आ गयी।
     उनकी बाते सुनकर मै स्तब्ध सी रह गयी कुछ सोचने लगी।फिर बोली बहन जी गुड़िया पेट से है इसे सहारा तो देना ही पड़ेगा।अगर आपको कोई परेशानी ना हो तो इसे मेरे साथ भेज दो भगवान् ने मुझे औलाद सुख नही दिया कुछ दिन मै भी माँ बन के इसकी देखभाल कर लूँ बच्चा होने के बाद इसके ससुराल वालो से बात कर लेंगे। मुझे बड़ा आश्चर्य हुवा की उसकी माँ ने बिना किसी टाल मटोल के गुड़िया को मेरे साथ दरवाजे से ही भेज दिया। लेकिन मै समझ सकती थी उसे क्या महसूस हो रहा था।
    समय बीतता गया ससुराल से आने के ठीक बीस दिन बाद गुड़िया ने एक बहुत ही सुंदर बेटे को जन्म दिया ये खबर मैंने जब गुड़िया के माँ के पास भेजी तो उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नही दी और ना ही बेटी और नाती को देखने की इच्छा जताई।मै बोझिल मन से वापस आ गयी।गुड़िया ने भी कुछ नही पूछा मानो उसे सब पता हो। उसकी आँखो से आँसू गिर रहे थे। मैंने उसे सीने से लगाया और कहाँ- की शायद मुझे भगवान् ने इसी लिए बेऔलाद रखा था क्योंकि तू मेरी किस्मत में थी। खैर गुड़िया अब सम्भल गयी थी और मुझे माँ कहने लगी।
  नवंबर का महीना था तबतक बच्चा डेढ़ महीने का हो गया था हम धुप में बच्चे को लेकर बैठे थे तभी गुड़िया ने कहाँ-माँ एक बार मेरे पति से बात कर लो क्या पता बेटे के बारे में जानकर उनका गुस्सा गायब हो जाए और वो हमे अपना ले।मैंने कहाँ ठीक तू फोन लेकर आ मै अभी बात करती हूँ। वो अंदर से फोन लेकर आई तो मैंने नम्बर पूछकर मिलाया जमाई बाबू ने ही फोन रिसीव किया थोड़ी सी औपचारिकता के बाद मैंने उन्हें गुड़िया और उसके बेटे के बारे में बताया की अचानक फोन कट हो गया। मुझे लगा की नेटवर्क की वजह से फोन कट गया। मैंने फिर से फोन मिलाया पर फोन नही उठा। मै बार बार फोन मिलाती रही की अचानक फोन किसी महिला ने उठा लिया मैंने कहा की संजय जी(जमाई बाबू का नाम) से बात कराओ तो उसने कहा की मै संजय की बीबी बोल रही हूँ आप बताईये क्या बात है मै उन्हें बता दूँगी। ये सुनते ही मेरे हाथ से फोन छूट गया और मेरा शरीर बुरी तरह काँपने लगा। मै समझ नही पा रही थी  की क्या कहूँ। गुड़िया ने मुझे देखा तो परेशान होक पूछने लगी माँ बताओ ना क्या हुवा? बेबस सी मै बस इतना ही कह पायी----ये कर्म क्षेत्र है आगे बढ़!!
   वो समझ गयी की कुछ गलत हुवा है पर क्या ये नही पूछा बस बोली माँ मै भी पतिता हो गयी। और रोती हुयी अपने कमरे में चली गयी। मैंने उसे बहुत समझाया शायद वो समझ भी गयी तभी उसने अपने मांग का सिंदूर पैरो की बिछुवा गले का मंगलसूत्र और हाथो की चूड़िया निकाल फेकी। उसका ये रूप देखकर मै सदमे में थी की तभी वो बोली--माँ मै पतिता नही ये कर्म क्षेत्र है मेरा साथ दो मै आगे बढ़ना चाहती हूँ मुझे आशीर्वाद दो।
  सच मानिए मेरी ख़ुशी का कोई ठिकाना ही नही रहा मै तुरन्त अंदर गयी और आलमारी में से कुछ पैसे निकाल कर उसे दे दी बोली--बेटा तू अपना सफर तय कर मै तेरे साथ हूँ। गुड़िया ने अगले दिन ही जाकर बीएड का फॉर्म भरा और मेहनत से पढ़ने लगी उसने 85 %मार्क से बीएड क़्वालीफाई किया। गुड़िया के पंख निकल आये है अब उड़ान भरने की देरी है। उसे देखकर यही लगता है की---
मुश्किलें किसी को तोड़ती नही बल्कि हौसला देती है की वो अपने कर्म क्षेत्र में आगे बढ़ सके जरूरत है समाज को जागरूक करने का की वो किसी को रास्ता दिखाकर उसका सम्बल बने।।
         #धन्यवाद 
डॉ दिव्या पाण्डेय 
गोला बाजार गोरखपुर
उत्तर प्रदेश

मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017

दिल बंजारा सा

दिल बंजारा सा
घूमता आवारा सा
गलियाँ गलियाँ शहर शहर
कभी इस पहर कभी उस पहर
कभी इधर ठहर कभी उधर ठहर
दिल बंजारा सा...
जाने क्या ढूंढे जाने क्या चाहे
जाने किस तरह जाती है ये
अनजान सी गुमसुम सी राहे
ये अजनबी राहे
खड़ी है फैलाये बाहें
फिर भी दिल बंजारा सा...
हर बस्ती का एक चौराहा
चार दिशाएं ले जाए
खुशियों की दस्तक दे मुझको
वो मंजिल कैसे हम पाये
कभी रुकी रुकी कभी
भागमभाग ये दिल बंजारा सा...
नादान है दिल ना समझ है मन
बेसुध सा है जीवन का प्रण
कभी समझ के समझे
कभी उलझ गए
जाने कब संवरे
कब बिखर गए
कभी बहक बहक
कभी संभल सम्भल
ये बंजारा सा दिल
घूमता आवारा सा...

दिल की बातें

ना होठो पर शिकायत होगी
ना आँखों से शिकवे गिरेंगे।
कुछ इस तरह से तेरे हर एक
अहसान अब अदा हम करेंगे।।

तुम्हे मिला के सबसे एकदिन
दूर हम खुद से हो जाएंगे।।
ख़ुशी लाकर तुम्हारे जहाँ में
खुद दुनियां को छोड़ जाएंगे।।

कुछ इस तरह से तेरे एहसान
देख लेना तुम हम चुकाएंगे।
रश्मो कसमो से बांधो मुझको
हम रवायतों को छोड़ जाएंगे।।

मुझे किसी से भी गिला नही
सकून की बात मत कर यारो
यही वो चीज है जहाँ में जो
हर एक शख्श को मिला नही।।

#शुभसंध्या

आखिर क्यूँ

कभी चहकती चिड़िया
आज लाचार सी है
हा समाज का सच ही तो है
जो आज की नारी बीमार सी है...
कभी उसके चहचहाने से
बगियाँ गूंज जाती थी
आज खामोशियो में ही
सदियां बीत जाती है...
कभी रातें छोटी लगती थी
और दिन बड़ी सी लगती थी
अब रातें है सदियों जैसा
और दिन है तिनका तिनका सा
जीना भी अब क्या जीना है
जीवन तो है मरना सा...
जब जब उभरी शक्ति बनकर
तब तब उसका प्रतिकार हुवा
पर सच है जब जब देवी माना
तब तब समाज का उद्धार हुवा
मत भूलो की नारी माता है
जिसने नर की नीव रखी
फिर भी नर के ही कारण क्यों
आज हर नारी है बहुत दुःखी
कभी सीता बनकर हरी गयी
कभी दामिनी सी ठगी गयी
ये रूप बदलता नर ही क्यूँ
क्यूँ काली बनती नारी ना
क्यूँ आखिर क्यों?????

उम्मीद

मुझसे जलाया ना गया उम्मीदों
के पुरजे सारे।
वफ़ा के नाम पर जिसमे बेवफाई
थी लिखी।।

आसुवो को मिली सजा गिरने की
दरिया में।
खुशियों को मेरे दर्द की दवाई  थी
लिखी।।

रहनुमा जीत गया मुझसे मुझे हार
मिली।
सब्र को कब नही यहाँ जगहँसाई थी
मिली।।

खत का लिखना उसे गवारा तो नही था
शायद।
खुदा का शुक्र है की पुरजो की गवाही है
मिली।।

गजल

बोझील जिंदगी का वज़न बेवज़ह उठाते चले गए।
हर एक से रिश्ता तहे दिल से निभाते चले गए।।

मुशाफिर तो बहुत थे जिंदगी के सफर में लेकिन।
काफिर दिल को अकेले ही हम घुमाते चले गए।।

एक उम्मीद से जुड़ा था दिल मरहम तो मिलेगा।
सभीके हाथ में खंजर था और चुभाते चले गए।।

मैं अपने घाव को किसी को दिखाती भी तो कैसे।
मेरे रहनुमा भी घावो पर नमक लगाते चले गए।।

मैंने अरमानो को जलाया  फ़क़त रौशनी के लिए।
उजाले ख़ाक मिले मेहरबाँ दिए बुझाते चले गए।।

माँ बहन बेटी बहु बनकर जिंदगी कैसे गुजारती।
रिश्ते  बेमोल के थे सब पल्ला छुड़ाते चले गए।।

हर हाथ में था पत्थर और मुजरिम बनी थी मै।
अपनी मर्जी से मुझपर पत्थर बहाते चले गए।।

ऐ खुदा खुशियों से भर सकता था दामन भी मेरा।
तेरे करम से हम दामन में कंकड़ उठाते चले गए।।