बुधवार, 30 सितंबर 2015

मेरा नाम ही मेरी पहचान है

वो शायर है शायरी करता है
उसने कहा तू आग है
मै जल गयी।।
फिर कहा तू मोम है
मै पिघल गयी।।
फिर कहा तू हवा है
मै बह गयी।।
फिर कहा तू जज्बात है
मै मचल गयी।।
फिर कहा तू हालात है
मै बदल गयी।।
बुरा तो तब लगा
जब उसने कहा
तू सिर्फ नाम है
और मै बदल ना सकी।।
क्युकी मेरा नाम ही
मेरी पहचान है।।

तुम मुझे आजमाओगे

बड़ा गुमान था तुमपर
की मेरा साथ निभाओगे
नही मालुम था मुझको
की तुम मुझे आजमाओगे।
दुनिया के भीड़ से तुझको
रखा था संभाल के
पर भूल गयी थी की
तुम हो हस्ती कमाल के।
दिखा के ख्वाब आँखों को
मुझे फिर सताओगे
नही मालुम था मुझको
की तुम मुझे आजमाओगे।
तुम्हारी बातें ही मेरे
जीने का सहारा है
तेरे सिवा जहाँ में
और क्या हमारा है।
बहला के दिल को मेरे
यु तुम चले जाओगे
नहीं मालुम था मुझको
की तुम मुझे आजमाओगे।।

क्यों है

बिखरे थे हम तुझसे मिलने से पहले
आज सिमटे हुए सारे अरमान क्यों है।

चाहत थी कोई आके थाम ले मुझको
बदले हुए से आज हालात क्यों है।

मै तनहा थी दुनिया वीरानी थी मेरी
महके हुए से आज दिन रात क्यों है।

तुझमे ही सारी दुनियां सिमटी है मेरी
तुझसे ही शुरू मेरी हर बात क्यों है।

तकदीर नही थी

मै तनहा जिन्दगी के सफर में थी अबतक
मेरे पास तेरे प्यार की जंजीर नही थी।

बहुत चाहा तुझे ऐ जिन्दगी हमने पर
मेरी ऐसी खुबसूरत तकदीर नही थी।

तो हाथ ही जख्मी कर लिया हमने
जिसमे तेरे प्यार की लकीर नही थी।

तुझे देखा था भरी भीड़ में तनहा मैंने
पर मेरे आँखों में तेरी तस्वीर नही थी।

तूने देखा भी नहीं एक बार पलटकर
शायद मेरे हक़ में वो तदवीर नही थी।।

आवाज देना

कोई जख्म गहराए तो आवाज देना।
कोई साथ ना आये तो आवाज देंना।।

बहुत है जमाने में तेरे चर्चे ऐ हुजुर।
हुनर राख हो जाये तो आवाज देना।।

दामन छोड़ के जाना तेरी फितरत होगी।
जिन्दगी खाक हो जाए तो आवाज देना।।

तेरी हकीकत से कोई गिला नही मुझको।
वक्त बेहिसाब हो जाए तो आवाज देना।।

दिलो को तोडना तेरी आदत पुरानी है।
ये आदत जब बदल जाये तो आवाज देना।।

कलम

मेरी कलम हर बात लिखेगी
अपने और तेरे जज्बात लिखेगी।।

धड़कनो में छुपा के रक्खा है जो
वो सारी बात खुलेआम लिखेगी।।

बाते जो तस्वीरो से किया है मैंने
उनके वो शब्द तमाम लिखेगी।।

कैसे काटी हु जिन्दगी का सफर
फिर से वो सारी दास्तान लिखेगी।।

क्या होगा अंजाम मेरे इश्क का
देंगे हम सारे इम्तिहान लिखेगी।।

बेख़ौफ़ शायर

मेरी आवाज को यु ना दबाओ लोगो।
मै हु सरफिरा बेख़ौफ़ बन लिखता शायर।।

वक्त की ठोकरों से बेशक इरादे है जख्मी मेरे।
खुद के जख्मों को खुद से ही सिलता शायर।।

ख़ुशी से झूम उठेंगे मुझे सुनकर अब लोग।
हु मै हजार काटों के बिच में खिलता शायर।।

बड़े बे आबरू होकर चले जो शायरों की महफ़िल से।
वो जानते है की किश्मत से भी नही मिलता
शायर।।

खरीद लो मेरे अल्फाज मान जाए तुम्हे।
चंद खुशियों के खातिर भी नही बिकता शायर।।

ज़माना झूम रहा है जिसके गजलो पर।
मै हु वो बेवाक सा हालात पर लिखता शायर।।

आवाज देना

कोई जख्म गहराए तो आवाज देना।
कोई साथ ना आये तो आवाज देंना।।

बहुत है जमाने में तेरे चर्चे ऐ हुजुर।
हुनर राख हो जाये तो आवाज देना।

दामन छोड़ के जाना तेरी फितरत होगी।
जिन्दगी खाक हो जाए तो आवाज देना।।

तेरी हकीकत से कोई गिला नही मुझको।
वक्त बेहिसाब हो जाए तो आवाज देना।।

दिलो को तोडना तेरी आदत पुरानी है।
ये आदत जब बदल जाये तो आवाज देना।।

हर बात लिखेंगे

कुछ अनुभवों की दास्तान लिखेंगे।
एक बार अपनी पहचान लिखेंगे।।

बिता है दौर जो मुफलिसी का यारो।
उस दौर की सारी दास्तान लिखेंगे।।

ईमान बेच कर जीते है जो इन्सान।
उनके लिए कुछ और ब्यान लिखेंगे।।

बदल दे समाज के रिवाज जो ऐ रीत।
ऐसे अल्फाज हजार बार लिखेंगे।।

कुछ तो समझ ले दुनीयाँ ईमान की कीमत।
हम सोच समझ कर हर बात लिखेंगे।।

खुद को बदल के देख

बदल जायेगी जिन्दगी तेरी जरा साथ चल के देख।
मेरे लिए भी तू कभी खुद को बदल के देख।।

नखरे तेरे हजार है शिकवे भी है शामिल।
मेरे लिए तू अपना नजरिया बदल के देख।।

खामोश है जुबाँ क्यों? ऐतराज क्या तुझे?
मेरे लिए तू अपने अहसास बदल के देख।।

मुसाफिर हु तेरे राह की मंजिल है मेरी तू।
मेरे लिए भी तू कभी मेरे साथ चल के देख।।

एहसान इश्क का कर न फैसला सुना।
मेरे लिए तू अपना फ़रमान बदल के देख।।

बदल जाएगी जिंदगी तेरी जरा साथ चल देख।।
मेरे लिए भी तू कभी खुद को बदल के देख।।

तेरा साथ नही है

अब दिन भी मेरा रात की तन्हाइयों सा है।
गजब शोर में जो तेरी आवाज नही है।।

गूंजती है बेसबब आवाज भी यहाँ।।
हलचल जो मचा दे वो बात नही है।।

कारवां गुजरा है मेरे साथ भी बहुत।
पर ऐ हमसफर तेरा साथ नही है।।

दुनिया के रंगमंच पर अजब सी भीड़ है।
हर किसी में तुझसा अंदाज नही है।।

आगाज मैंने देखा अंजाम भी दिखा।
हर शख्स यहाँ तुझसा बेहिसाब नही है।।

हर बात कहेंगी

आँखे गर भर आई
कुछ ख़ास कहेंगी
बीते हुए कल की
हर बात कहेंगी।
वो बाते पुरानी
तुम्हे थी सुनानी
लहू में रवानी
बेख़ौफ़ थी जवानी।
उन दिनों के ये सारे
अंदाज कहेंगी
बीते हुए कल की
हर बात कहेंगी।
वो सपनो का बुनना
वो ख़्वाबों में उड़ना
वो जुगनू पकड़ना
वो खुद पर अकड़ना।
फिर से वो सारी
दास्तान कहेंगी
बीते हुए कल की
हर बात कहेंगी।
वो सखियों की टोली
वो मस्ती की बोली
वो बाते सुहानी
वो अपनी कहानी।
कहानी और सारे
जज्बात कहेंगी
बीते हुए कल की
हर बात कहेंगी।
क्या दिन थे वो भी
क्या पल थे वो भी
उस पल का गुजरना
और फिर अब अखरना।
पा लूं वो फिर से
हालात कहेंगी
बीते हुए कल की
हर बात कहेंगी।।

जवाब दो

आज मै सवाल करती हु
जवाब दो तो मान जाये तुम्हे।
गर हम इंसान है
हमारी इंसानियत कहाँ है?
क्यों जकड़े है हम बेड़ियों में?
बेवजह की रुढियो में?
क्यों जुड़ नही पाते हम सब
एक कड़ीयो में?
बेकार की रीतियाँ
अनसुलझी नीतियाँ
जिनका ना कोई आकार
जिनका ना कोई प्रकार
उलझ रहे है क्यों बेकार के सवाल में?
जवाब दो तो मान जाये तुम्हे।
क्या इंसानों का धर्म यही है?
चोट देना किसी को अधर्म नही है?
क्या मन को मार देना अभिशाप नही है?
उलझ रहे है क्यों बेकार के बवाल में।
जवाब दो तो मान जाए तुम्हे?
क्या बना सकते है हम एक नया समाज?
बदल सकते है क्या हम बेकार के रिवाज?
सुना है आज मानव सभ्य हो रहा है।
क्या बना सकते है अब हम एक नया मिशाल?
जवाब दो तो मान जाए तुम्हे।

आओ तुम्हे एक खुला आसमान दे दूँ

आओं एक बार तुम्हे
कुछ सामान दे दू।
खुले आसमान के नीचे
एक नया आसमान दे दू।
मांग ले अगर तू तो
तुम्हे सारा जहां दे दू।
इबादत करती हु जिसकी
अपना वो भगवान दे दू।।
आओं एक बार तुम्हे
कुछ सामान दे दू।
दिल में छुपा के रखा है जो
वो सारे अरमान दे दू।
बिगड़े हालात के साथी थे जो
मै वो सारे इंसान दे दू।
मेरी खुदगर्जी की पहचान है जो
अपना वो ईमान दे दू।
आओ एक बार तुम्हे
कुछ सामान दे दू।
आओ ना!
एक बार तुम्हे
फिर से एक खुला
आसमान दे दू!!!!!!

मै परेशान बहुत हूँ

समय बदला
सोच बदला
इंसान बदला
तबतक तो ठीक
ईमान बदल गया
परेशान बहुत हूँ.....
आदत बदली
चाहत बदली
हसरत बदली
तबतक तक तो ठीक
फितरत बदल गयी
परेशान बहुत हूँ.....
अदब बदला
लिहाज बदला
अंदाज बदला
तबतक तो ठीक
नियत बदल गयी
परेशान बहुत हूँ....
सपने बदले
अपने बदले
सुरत बदला
तबतक तो ठीक
सीरत बदल गयी
परेशान बहुत हूँ....
घर बदला
रिश्ते बदले
नाते बदले
तबतक तो ठीक
तू भी बदल गया
परेशान बहुत हूँ....
मै परेशान बहुत हूँ..

दर्द अब सिकन्दर हो गया

दर्द मेरा सहरा था अब समुन्दर हो गया।
बड़ा अजीब सा इस दर्द का मंजर हो गया।।
तकदीर की गवाही थी और वक्त का तकाजा।
आज फिर से मै देखो मस्त कलंदर हो गया।।
आइना तो अब भी वही है सदियों से रहा।
बात और है की अक्स मेरा बंजर हो
गया।।
खामोशियाँ मेरी उसे खलती नही कभी।
वो दर्द देके आज सिकंदर हो गया।।

कही तुम वही तो नही?

कल दिखी मुझे
एक धुंधली सी
परछाई
मन से आवाज आई
कही तुम वही तो नहीं....
वर्षो से जिसे ढूंढता
है व्याकुल मन
कभी तस्वीरो में
कभी हाथ की
लकीरों में दिन की
उजास में कही तुम
वही तो नहीं....
तुम मेरे बीते
वक्त की पहचान
हो और तुमसे
जुडी है मेरी
बहुत सारी यादें
मेरे क्रोध में
मेरे प्रेम में
ह्रदय में तुम ही
तुम ही तो हो
तभी दिल ने
फिर से एक बार
पूछा कही तुम
वही तो नही...
कही तुम
वही तो नही....

तुम कौन हो?

तुम कौन हो जो
जो मेरे वजूद में
उतर जाते हो चुपके से....
तुम कौन हो जो मेरे
गीतों में सज जाते हो
चुपके से....
मेरी रूह बनके तो
कभी सुर बनके।
कौन हो तुम!
कितनी बार देखा है
तुम्हे अपनी पलकों
पर सजते हुए
कितनी बार देखा है
तुम्हे अपनी सासों
में घुलते हुए..
कौन हो तुम जिसके
ख्याल से ही वांछा
खिल जाती है
अस्तित्व हिल जाता है।
कितनी बार देखा है तुम्हे!
कौन हो तुम जो
ख्यालो में बस जाते हो
चुपके से...
कौन हो! तुम????

चलो पत्थर पर फूल उगाया जाए

चलो पत्थर पर फूल
उगाया जाये
कुछ पागलपन
दुनियां को दिखाया जाये
कहते है सब लोग
यहाँ जिन्दगी शर्तो
पर नही चलती चलो
ना एक बार अपनी शर्तो
पर दुनियां को घुमाया जाये।
आओ कुछ पागलपन
दुनियाँ को दिखाया जाये।
क्या होगा क्या नहीं
होगा।
ये तो कोई जवाब नही।
क्यों मान ले आसानी
से जिन्दगी का कोई
हिसाब नही।
जिसका कोई उत्तर न हो
ऐसा कोई सवाल नही।
अपनी ही बातो को
खुद पर आजमाया जाये।
कुछ पागलपन दुनियाँ
को दिखाया जाये।
आओ ना एक बार
पत्थर पर फूल उगाया जाए।।

शब्दों से पहचान बना लूँ

शब्दों से पहचान बना लू।
आरजू पूरी हो जाए।।
कुछ सपने आँखों में सजा लूँ।
आरजू पूरी हो जाए।।
गीत बना के खुद को गुनगुना लूँ।
आरजू पूरी हो जाए।।
एक हसरत दिल में जगा लूँ।
आरजू पूरी हो जाए।।
ग़मों को दूर भगा लूँ।
आरजू पूरी हो जाए।
चाहत का शमां दिल में जला लूँ।
आरजू पूरी हो जाए।।

जिंदगी और कितने हिसाब दूँ

जिन्दगी कितने सवाल
है तेरे मुझको लेकर
किन किन सवालों का
जवाब दू।
कितने जख्म सहे है दिल
पर कितने जख्मों का
हिसाब दूँ।
कभी धुप तो कभी
छाँव हर हाल में
चलती रही।जिन्दगी
सबक सिखाती रही
मै आगे बढती रही
मैंने देखा रंग बदलते
मौसम को भी...
खुद को ना बदल सकी
बहुत ढंग थे जमाने में
पर खुद को ना रंग सकी।
और क्या जवाब दूँ
और कितने हिसाब दूँ।

बिटिया मेरे मन को छू ले

बिटिया घर में तेरा बसेरा
महक उठा है आंगन मेरा।
तेरा आना कितना प्यारा
बहे उमंगो की जल धारा।।
स्नेह से पूरित तेरी आँखे।
कोयल की जैसे भीगी पांखे।।
मधुर मधुर आवाज तुम्हारी।
सबसे मीठी सबसे प्यारी।।
मेरी बाहों में झुला झूले।
बिटिया मेरे मन को छुले।।

कैसा रिश्ता है

कैसा रिश्ता है उससे हमारा
ना वो गैर है ना अपना है।।
महसूस करती हु हर पल उसको
खुली आखो में बसा कैसा सपना है।।
उसे पाने का कोई इरादा नही बेशक।
पर उसके बिन कैसे रहना है।।
सवर लिया है उसके खातिर।
वो रूप का मेरे सुंदर गहना है।।
चाहत ऐसी मिली है मुझको उससे।
आसूँ बन खुद आँखों से बहना है।।

बस तेरी ही आरजू है

तुम पर ही शुरू करुँगी मै
प्रेम का समर्पण।
तुमपर ही ख़त्म होगी
बेमोल अब ये जीवन।
तुम एहसासों में बध गये हो
साँसों में घुल गये हो
मन में समा के देखो
धड़कन ही बन गये हो
जिस राह पर चलोगे
वो राह मेरी होगी
थक के कही रुके तो
वो बाह मेरी होगी....
तुमसे ही जल उठा है
आशाओं का ये दीपक।
तुम पर ही ख़त्म होगी....
तुम सुर बन गये हो
मै गीत की हु लड़िया
तुझे गुनगुनाऊ मै अब
न बिते अब ये घड़िया।
मेरा समर्पण तुझको
उस राह पर ले आये
जहाँ से तेरी मंजिल मेरा
प्यार ही बन जाए।
तू रूह बनके उतर जा
तेरी ही आरजू है।
बस तेरी ही आरजू है..

परवाना

कभी तन्हाइयो में कोई
बिखरा तो होगा।
कभी टूट के संभला
तो होगा।
जिन्दगी दर्द की कहानी
ही सही।
मेरे आलावा भी इस
राह पर कोई
चला तो होगा।
सूना है इश्क में खुमारी
है ।
बेशक कोई चिराग
जला तो होगा।
बहुत उड़ते है
पतिंगे चिरागों के
आस पास
क्या आज फिर कोई
परवाना फना तो
होगा।।।।

ये कैसा अंजाम है

कही उलझ गयी जिन्दगी
की डोर कुछ हुवा तो नही
कैसी खामोशी है
क्यों थम गया है शोर
क्यों भीड़ में तनहा सी
जिन्दगी है
क्यों बोझिल सी साँसे
क्यों उखड़ा सा मन है
क्यों धुंधला सा दर्पण
कहो ना कुछ हुवा तो नही।
समझाओ ना एक बार
बतलाओ ना एक बार
क्यों टूटने लगे है तार
क्यों रुठा है प्यार
क्या उजड़ गया संसार।
आने वाले जीवन का
कैसा आगाज है
बीते लम्हों का ये
कैसा अंजाम है
ये कैसा अंजाम है???

मुझे खुद से बिदाई दे दो!!

दिल टूटने की फिर गवाही दे दो।
आके फिर एक और तबाही दे दो।।
अश्क बहकर युही बेकार हो रहे है।
सहेज लू मुझे एक सुराही दे दो।।
कैसे चलू सरे राह सफर लंबा है।
आज मुझे साथ एक राही दे दो।।
मै परेशान रही आज तक तेरे खातिर।
दो पल के लिए गम से जुदाई दे दो।।
बहुत घुटता है दम तेरी खामोशी से।
जिन्दगी अब मुझे खुदसे बिदाई दे दो।।

वजूद को दर्पण मिला

चलो जिन्दगी का कुछ
तजुर्बा तो मिला
राह चले तो कुछ सिला
तो मिला....
कुछ हार मिला तो
कुछ जीत तो मिला
कुछ पने मिले
कोई बेगाना भी मिला
समर्पित है जीवन
समर्पित है तन मन
मुझे मेरे वजूद का
एक दर्पण तो मिला।।

मुट्ठी में आसमान भर लूँ

टूटते बिखरते सपनो को
जोड़ने की कोशिश करती
मै काश खुद की
पहचान कर लूँ....
चल आज फिर अपनी
मुट्ठी में सारा आसमान
भर लू..
खोज लू खुद के लिए
राह अगर साथ दे दो
तुझमे खो के मै
जिन्दगी आसान कर लू
चल एक बार फिर
अपनी बंद मुट्ठी में
सारा आसमान
भर लूँ...
तू अगर साथ दे दे
चुन लू कुछ सपने
नये
तू अगर साथ दे दे
बुन लू कुछ अरमां
नये..
खुद अपने ही लिए
कुछ अहसान कर लूँ
आओ ना एक बार
फिर
अपनी मुठ्ठी में सारा
आसमां भर लूँ...
संभव है तेरे साथ से
सब कुछ हासिल हो
मिल जाए वह राह
जो मेरे काबिल हो
आओ ना तेरे साथ
एक राह चुन लूँ
एक बार खुद की बंद
मुट्ठी में सारा आसमान
भर लूँ...आओ
तुझसे जुड़ के
खुद की पहचान कर लूँ
आओ ना.....

मंगलवार, 29 सितंबर 2015

चुप हूँ

हम अगर चुप है तो इसको भी गनीमत समझो।
हम अगर सब्र ना करे तो कयामत होगी।।

शोर करने से भी क्या हासिल होता जहाँ में।
हाशिये पर मेरे अपनों की ही इज्जत होगी।।

तुझसे मिलना भी नसीब का लिखा था मेरा।
तेरी रुसवाई मगर जान की कीमत होगी।।

तुझपर मै क्या अपने जज्बात लिखूँ अबतो।।
लिख दे गर कलम तो ये उसकी ही नैमत होगी।।

भूल गया वो मै भी भूला दूँ उसको मगर।
फिर रुसवा उससे मेरी ही मुहब्बत होगी।।

सबक

मेरे हाथों में फिर से वहीे किताबे दे दो।
जिंदगी का एक और सबक पढ़ना है।।

बहुत मुश्किल से चल रहे है कदम मेरे।
अब आसान सा एक पंथ गढ़ना है।।

कही छाँव तो कही धुप की बाते होगी।
जीवन के हर रंग में मुझको ढलना है।।

पत्थरों के शहर में आ तो गयी हूँ चलके।
बनके मोम सा अब मुझे पिघलना है।।

देदो ना किताबें फिर से मुझको एक बार।
जीवन के छूटे सबक को पढ़ना है।।

मेरी दोस्त के जन्मदिन पर एक छोटी सी पेशकश

सबने तुम्हे उपहारों से नवाजा
आओ मै तुम्हे एक पोटली देती हूँ
जब भी तुम्हारे आसपास कोई गम
आये खोल लेना इसकी हर गिरह
और ले लेना इसमें से ढेर सारी हँसी
ढेर सारी ख़ुशी ढेर सारे मुस्कान
और खूबसूरत जिंदगी के
कुछ खूबसूरत सामान...

सोमवार, 28 सितंबर 2015

खुद की तलाश

वर्षो बीत गए
खुद में खुद की तलाश
करते हुए...
पर आज भी वो तलाश
पूरी नही हो पायी
कैसी बिडम्बना है
कहने को मै तो मै हूँ
पर मुझमे मै कहाँ??
उम्र के हर मोड़ पर
मेरी पहचान छुपी रह गयी
कभी बेटी...फलां की
कभी बीबी...फलां की
तो कभी माँ...फलां की
तो आखिर मै कहाँ???
कितनी बार घुटी हूँ
ये सोचकर मेरा अस्तित्व
तो सभी स्वीकारते है
पर वास्तव में मै कहाँ??
क्या अस्तित्व होते हुए
भी अस्तित्व विहीन हूँ
या नारी होना मतलब
अस्तित्व को खोना..
देखो ना जन्म से लेकर
आज तक संस्कारो
में पली हूँ
फिर भी जाने क्यों
समाजिक बेड़ियों से
जड़ी हूँ..तो फिर
कहो ना मुझमें मै
कहाँ हूँ???
मुझे खुद की तलाश है..

तेरे बाद

इतनी मजबूती से वीरानों ने दर को बंद किया।
की दिल में उतरी न कोई बात तेरे बात के बाद।।

तुझमे खोयी रही उमर भर इस कदर मै तो।
की कोई याद ना रहा है अब तेरी याद के बाद।।

तेरा किस्सा भी अजीब ढंग से जुड़ा है मुझसे।
कोई किस्सा ना बना तेरे ख्यालात के बाद।।

तुझसे मिलने की दुवा बार बार करते है हम।
कोई मुलाक़ात न हुवा एक मुलाक़ात के बाद।।

ना टूट जाए कही फिर से मेरे सब्र की वो बाँध।
जिसे बाधा था उन कड़वे अल्फाज के बाद।।

कभी आना नही मुड़के मेरे जज्बात के घर में।
दिल तोड़ लिया मैंने तेरे हर एक बात के बाद।।

दुनियाँ को खबर हो जाए

मेरा जब्त कहता है की खामोशी में बसर हो जाए।
पर दिल की ये जिद है की दुनिया को खबर हो जाए।

कोई आये ना आये मेरे विरान सी दुनियां में कभी।
तुम ना आना कभी जब तेरा आबाद शहर हो जाए।।

रोक लेंगे हम भी दिल के हर शैलाब को भी अपने।
मेरी ये जिद है की तुफानो पर भी असर हो जाए।।

बन गया है रकीब अपना ये खामोशियो का मंजर।।
काश इस बात की मेरे माही को भी खबर हो जाए।।

हर एक शख्स ये कहता है की नसीब था वो तेरा।
काश ऐ खुदा बिन उसके मेरा भी गुजर हो जाए।।

जलती कलम से क्या लिखूँ

कभी प्रणय के गीत लिखू
तो कभी हृदय की
पिर लिखूँ अब तुम
ही बता दो
इस जलती कलम से
क्या लिखूँ।
संवेदना के स्वर लिखूँ
या आहत मन के
भाव लिखूँ अब
तुम ही बता दो
इस जलती कलम से
क्या लिखूँ।
धैर्य की बाते या
अश्कों की बरसाते लिखूँ
प्रेम की हार
या कुंठा की मार लिखूँ
अब तुम ही बता दो
ना इस जलती
कलम से क्या लिखूँ।
शब्दों की खामोशी
या भावों की मदहोशी।
कुछ सवाल या
सवालो के जवाब लिखूँ
अब तुम ही बता दो
इस जलती कलम से
क्या लिखूँ??????

दास्ताँ -ए -दर्द

लहजे से उठ रही थी दास्तान-ए-दर्द मेरा।
चेहरा बता रहा था सब कुछ गवाँ दिया।।

कैसे छुपाते अश्क दिल नादाँ जो था मेरा।
दुःख जो था की मुझे उसने भुला दिया।।

हँसते हुए चेहरे की रौनक कुछ और थी।
बड़ा बेदर्द रकीब था मुझको रुला दिया।।

मत पूछ मेरे इश्क की इंतहा मै क्या कहूँ।
माही ने जुदाई का मुझे जहर पिला दिया।।

उनका एहतराम था या की भूल थी मेरी।
चाहत में उनके मैंने सर को झुका दिया।।

मै टूट  गयी जिंदगी अब तू फैसला सुना।
क्या हक दू उसे जिसने मुझको हरा दिया।।

क्यों रखूँ

गर मुहब्बत की हद नही कोई
तो  दर्द का हिसाब क्यों रखूँ।
जिसे पढ़ना हो आसान यहाँ
मैं भी ऐसी किताब क्यों रखूँ।

महकी  फ़िजा उनकी खुसबू से
मैं अपने घर में गुलाब क्यों रखूँ।
भटकते रूह में बस जाता है वो
दिल में उलझे सवाल क्यों रखूँ।

मेरी साँसों गर बसा है वो साथी
अब मै उड़ती बयार क्यों रखूँ।
वो शख्श ही सबकुछ है मेरे लिए
दुनियाँ से मै व्यवहार क्यों रखूँ।

तू मेरे साथ साथ रहता है हरपल।
तेरा इन्तजार अब मै क्यों रखूँ।
जिसे पढ़ना हो आसान यहाँ
मै भी ऐसी किताब क्यों रखूँ।।

मेरा शायर नही बदला

है शौक-ए-सफर ऐसा की एक मुद्दत से हमने।
रास्ता भी नही पाया मंजिल भी नही बदला।

मेरी आँखो के समन्दर की किश्मत तो देखिये।
लहरे तो है आज भीपर साहिल नही बदला।।

दिल चीर के लहू से लिखा जो दास्ताने इश्क।
धुंधली तो पड़ गयी पर कागज नही बदला।।

रोज देता है जख़्म मुझको मेरा दिलवर लेकिन।
लाख कोशिशो के बाद भी आदत नही बदला।।

वो राह छोड़ दूँ मै किसी और के खातिर जब।
अनजान बन तो गया पर वो रहबर नही बदला।।

हर घड़ी लिखता है एक नया जख्म मेरे लिए।
परेशान हूँ आज भी मेरा शायर नही बदला।।

एक बार प्यार जताता कोई

जो भी आया मुझे ठोकर से नवाजा उसने।
मै तो पत्थर थी मुझे कैसे उठाता कोई।

हर शख्स अजनबी बन राह गुजरता गया।
काश जख्मों का भी हिसाब लगाता कोई।

फूल होती तो किताबों में जगह मिल जाती।
मुझसे भी जिंदगी के पन्ने सजाता कोई।

लोग इतने खुदगर्ज क्यों है यहाँ दूनियाँ में।
कौन अपना है काश मुझको बताता कोई।।

सबसे टूटे है  किसको अपना माने अब तो।
काश इस तरह ना मुझको सताता कोई।।

ठोकरों पर रखा है क्यों ये जिंदगी का सबब।
फ़क़त एक बार मुझसे प्यार जताता कोई।।

किस जहाँ में रहते हो

मुझसे मुहब्बत की बात करते हो।
बता दो किस जहाँ में रहते हो।।

रोज लिखते हो फ़साने इश्क के।
वफ़ा  किस बला को कहते हो।।

मेरे शुरुर में उठी है नई बात कोई।
कौन सी आग में तुम जलते हो।।

शहर का शहर लूट गया है देखो तो।
किस खुशफहमी में तुम रहते हो।।

ना भाये आज तेरे गीत हमे दिव्या।
जिसको तुम गजल ही कहते हो।।

तू बेवफा ही सही

छुप कर मैंने कभी किसी से प्यार ना किया।
देख तेरे प्यार का हर कर्जा चुका दिया।।

तू बेवफा सही तुझे क्या मै अब कहूँ।
तुमने तो दिल के सारे अरमाँ मिटा दिया।।

अँधेरा बहुत है आज चिराग बुझ गए।
मैंने फिर तेरे इश्क में ये दिल जला दिया।।

तुझे चाहना गजब था इंतहा की हद थी।
भुला के तुझको सबकुछ भुला दिया।।

दीवारो दर मैंने लिखा था तेरा नाम।
आज उनको मैंने खुद ही मिटा दिया।।

जब भी किसी ने पूछा हाल दिल का मेरे।
कागज पर टूटे दिल का टुकड़ा बना दिया।।

मेरे पास चले आना

जब याद मेरी हद कर दे
तो रुकना नही तुम
मेरे पास चले आना।
जब भी घना अँधेरा छा जाए
तो डरना नही
मेरे पास चले आना।
जब हर तरफ चिराग बुझ जाए।
और कुछ भी नजर ना आये।
तुम घबराना मत
मेरे पास चले आना।
जब आकाश में बादल
छ जाए।
यादों की बरसात हो जाए।
तुम उदास मत होना।
मेरे पास चले आना।
जब साँसे उखड़ने लगे
आहे तड़पने लगे।
तुम टूटना मत
मेरे पास चले आना।
जब दिल तुम्हारा दुखने लगे
कोई तुम्हारा छूटने लगे
तुम रोना मत
मेरे पास चले आना।
मैंने भी तो किया है
तुमसे हद तक प्यार
आज भी करती हूँ
तुम्हारा इन्तजार।
तुम सोचना नही
मेरे पास चले आना....

तुझमे जो बात है

बात उन्ही की होती है जिनमे कुछ बात होती है।
दिल में बस जाए यहाँ किसकी औकात होती है।।

वक्त को भीच के मुट्ठी में बंद कर तो जाने तुमको।
ऐसी किस्मत नही यहाँ हर किसी के पास होती है।।

जो मोड़ देते है तुफानो को मचलने से साहब।
साथ उनके दुनिया और सारी कायनात होती है।।

जिनको आता है मौजो में कश्ती को चलाना।
उस शख्स के लिए हर राह आसान होती है।।

तेरे जज्बे को  सलाम करती हु ऐ दोस्त मेरे।
तुझमे जो बात है सब में कहाँ वो बात होती है।