मंगलवार, 27 अक्टूबर 2015

मेरे मिटने से पहले

मुझे फर्क नही पड़ता
रूप का श्रृंगार का
शर्त बस इतनी ही है की
सोच सही और दिल सच्चा हो
इंसानियत बसी हो रग रग में
जवाँ हो समझदारी
पर दिल बच्चा हो
रूप का क्या
माटी ही तो है
हल्की सी बारिश में गल जायेगी
तेज धुप में बदल जायेगी
बस एक ख्वाहिश है
जिंदगी तेरे
बीतने से पहले
कुछ ऐसा हो मेरे नसीब की
रेखाएं मिटने से पहले
किसी की के नसीब में उजाला ला सकूँ
किसी भूखे को रोटी खिला सकूँ
किसी के आँसू हर लूँ
किसी का दामन खुशियों से भर दूँ
मरे तो माटी मरे
#वजूद में जिन्दा रहूँ हरपल पल पल!!

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2015

नजर आता है

आईना तुझमे मुझे एक शहर नजर आता है।
फिजाओं में घुला है जो जहर नजर आता है।।

झुग्गियाँ जल गयी बदनसीबो की देखा मैंने।
उनके पीछे की हर एक वजह नजर आता है।।

मांग कर भी नही मिलता जिन्हें जीने के लिए।
उनके चेहरे का हर एक सन्ताप नजर आता है।।

रोज घुटता है दम मेरा आईने में किस तरह।
अब तो हर चेहरे में मुझे पाप नजर आता है।।

खुद से टुटा है वजूद ए शहर देख तो जरा।
जाने क्यों आज हर एक वजह नजर आता है।।

रविवार, 18 अक्टूबर 2015

मेरी सोच

सोच रही हूँ आजकल
कलम को एक नई दिशा देदूँ।
जिंदगी तो चलती ही रहेगी
एहसासो के साथ
या एहसासों के परे
माथे की लकीर हो
या हाथो की लकीर
बदलना है तो
बदल जायेगी
नही लिखना मुझे
कोई दर्द कोई फ़साना
अब लिखूँगी वही
जो जमाना बोलता है
साकी का पैमाना बोलता है
समाज की जटिलताएं
लोगो की भावनाएं
राजनीति के रंग
और आपस के जंग
जिनकी वजह से
इंसानियत है तंग
होगा कुछ प्रतिकार कलम का
बदलेगा आकार कलम का
कुछ विरोध की भावना होगी
कुछ बातो में सद्भावना होगी
मानवता की बाते होंगी
अद्भुत दिन और रातें होंगी
कलम चाहती है
बदल दूँ ढंग
एक बार चलो
फिर जमा इस खामोश
स्याही का रंग
अपनी माटी के संग
देश की थाती का रंग
मेरी कलम पर चढ़ी है
आज फिर से
#मेरे_देश_की_माटी_का_रंग

गुरुवार, 15 अक्टूबर 2015

कुछ भी नही

जिंदगी तेरा अहले एहसान बस इतना ही रहा।
जीने के लिए दिया दर्द के सिवा कुछ भी नही।।

घर तो कबका बदल चुका था मकानों की तरह।
है जहाँ हम वो दीवारों के सिवा कुछ भी नही।।

मेरा कातिल निकला माहि जो दिल में रहता था।
उसको कहना है बेगानो के सिवा कुछ भी नही।।

ख्वाब जितने थे मेरे आँखों में वो जल गए सारे।
सुखीदरिया में अब नमी के सिवा कुछ भी नही।।
#दिव्या

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015

ये कलयुग है

जिंदगी के रंग मंच पर कितना नाटक कर लिया।
बिना आग लगे ही गैरो को देख कर जल लिया।।

अपनी चादर छोटी पड़ी तो ताक लगाई दूसरी ओर।
वो प्यासा ही मर गया और अपनी गागर भर लिया।।

झूठ ओढ़कर निकल गए फिर मासूमियत के हाट में।
कुछ इंसा मासूम मिले तो उनका सुख फिर हर लिया।।

खुदगर्जी की दुनियाँ में किसी का सपना किसी का सच।
कैसे अपना ईमान गिरा के फिर से इसने छल किया।।

भरम तोड़ दो कलयुग है ईमान नही दीखता यहाँ अब।
रंग मंच पर आकर देखो किसको क्या किरदार मिला।।
  

सोमवार, 12 अक्टूबर 2015

एक सच

दोपहर तक बिक गया बाजार का हर एक झूठ,
और मैं एक सच लेकर शाम तक बैठी रही।।

हजार चेहरों से रूबरू हुवा वजूद मेरा लेकिन।
सच का चेहरा ना दिखा मै शाम तक तकती रही।।

काश! की खोज रही काश! की बुलन्दी तक।
हर एक झूठ में उस काश! को ढूँढती ही रही।।

बोलबाला है आज भी बाजार में झूठ का देखो।
एक सच के साथ मै धुप में हर बार ही जलती रही।।

बेनकाब होगा किसी रोज झूठ का परदा यारो।
जिसके आड़ में ये मुफलिसी आज तक पलती रही।।

बुधवार, 7 अक्टूबर 2015

नन्ही गौरैया

मन के आँगन में उतरती है
हर सुबह एक नन्ही सी गौरैया
उछलती कूदती
पंखो को फैलाकर अटखेलियां
करती,
न जाने रोज कितने सन्देश लेकर
आती जीवन के....
मै अक्सर उसके साथ खेलती
उसके नन्हे पंखो को सहलाती
उसकी आँखों में झाँकती
ऐसा लगता मानो वह
चहचहाकर मुझसे कहती
तू तोड़ धरातल की बंदिशों को
मेरे पंख भी नए है
और तेरे सपने भी
आ तू मुझे उड़ना सीखा दे
मै भी तुझे पंख पसारना सीखा दूँ
तोड़ बेड़िया
घर की चहारदीवारी से कुछ
आगे बढ़ एक नए
आसमाँ की तरफ..
वह नन्ही गौरैया रोज देती
मुझे जीवन का एक नया
सन्देश~~~~~~
#सुप्रभात

रविवार, 4 अक्टूबर 2015

सोच बदलो

दोस्तों आज वक्त और हालात दोनों बदल गए है आधुनिकता की दौड़ में हम इतने आगे निकलते जा रहे है की समय के साथ हमारी सोच भी बदलती जा रही है जिसका प्रभाव हमारी संस्कृति और सभ्यता पर भी पड़ रहा है। वक्त के साथ आगे बढे ये तो एक हद तक ठीक है पर ऐसा ना हो कीवक्त की आँधी में हम बह जाए और सबकुछ हमसे छूट जाए। मिले तो बस एक तिश्नगी की हमने क्या खोया और क्या पाया~~~

है इस जहाँ में बेशुमार आदमी।
पर खुद में ही है बेजार आदमी।।

खुद बर्बादियों की वजह बन गया।
फिर भी टुटा नही खुमार आदमी।।

साथ मंजर वो सारे बिखर से गए।
है कितना खुद में खुद्दार आदमी।।

शौक सीढ़ी बना के बढ़ तो गया।
पर अंदर ही अंदर बीमार आदमी।।

जिंदगी वक्त के साथ ढल जायेगी।
और हो जाएगा तू लाचार आदमी।।

चल बदल सोच दुनियाँ में रहकर जरा।
वक्त मिलता नही है हर बार आदमी।।

शनिवार, 3 अक्टूबर 2015

एक उड़ान सपनो की

कोई सपने सजाता है आँखो में
तो कोई ठोकर मार कर आगे
बढ़ने की कोशिश करता है
क्या वास्तविक जिंदगी में जीने
के लिए है कुछ इन
सपनो के सिवा...
जीवन में उड़ान की एक सोच
कैसे उभरती है
आखिर सोच भी तो सपनो का
एक हिस्सा ही होता है
हा मैंने सुना है कुछ एक से
जीने का मकसद ही
ख्वाब को पूरा करना है
तो सच तो है ना
बिना सपनो के जीना कैसा
तुम ही कहो क्या
रखा है जीने में इन
सपनो के बिना...
मेरी इन जागती आँखो में
भी पलता है
एक ख्वाब जज्बातों का
रोज निकलता है
जज्बा बनकर
छूता है मन की खामोशियो को
और हँसाता है बेरंग सी
दुनिया को मेरे
फिर क्यों सोचूँ कुछ और मै
चलो आज उड़ान भरती हूँ
मै भी
एक अनुभूति को साथ लेकर
अनन्त आकाश में
पंख पसारे
अपनों के लिए
अपने
सपनो के लिए
बस एक उड़ान...

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2015

दिल तोड़ दिया

दिल चाहा जज्बात से खेला
दिल चाहा दिल तोड़ दिया।
अहसासों के गहरे उतरकर।
मांझी ने कश्ती मोड़ दिया।।

उनसे क्या उम्मीद करुँ अब
जिसने दिल से मेरे खेला है।
इश्क का एक खिलौना देके
दिल का खिलौना तोड़ दिया।

दर्द भरी एक दरिया हूँ मै।
रोज आँख से बहती हूँ।
उसको इसमें बहा ले जाऊ।
जिसने मुझको तोड़ दिया।

दुनियाँ के बाजार में अब तो
साथ मेरे मेरा साया बस है।
गम मेरा मझधार हो गया।
जबसे उसने मुझे छोड़ दिया।।

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2015

वृद्ध दिवस पर

बड़े नाजो से पाला था सारे दुःख सह गयी।
पर अभागन माँ मै आज अकेली रह गयी।।

बेटा जो मेरे सारे जीवन का एक सहारा था।
उसी बेटे ने एक दिन मुझे घर से निकाला था।।

उमर का क्या अब थोड़े दिन का ही गुजारा है।
चली जाऊ दुनियाँ से यहाँ अब क्या हमारा है।।

उसे ना धूप लग जाए मेरा आँचल सहारा था।
कह दिया फर्ज था तेरा जो तूने खुद उतारा था।।

चलो तुम्हारी ख़ुशी की खातिर मै सब सह गयी।
इसीलिए तो अपने अंत में मै अकेली रह गयी।।

खिला के पेट भर खाना उसे भूखी ही सोती थी।
रोता था मेरा बच्चा अगर तो मै भी रोती थी।।

मेरी ममता का मोल नही उसको गवारा था।
यही सोच कर उसने मुझे घर से निकाला था।।

कोई बात नही मै बोझ थी उसके जमाने की।
तभी तोकोशिश की शायद मुझको भुलाने की।।

मगर एक बात सुन बेटे आखिरी वक्त है मेरा।
भेज दे कफ़न मेरे लिए क्योंकि तू लाल है मेरा।।

मुझे अब तेरे कन्धों का नही कोई सहारा है।
इसीलिए तो तुमने मुझे घर से निकाला है।

तुझे आशीष है मेरा तेरी दूनियाँ महक जाए।
तेरा बेटा तुझे हक दे तू हरदम घर में रह जाए।।

तेरी बगिया भरी हो चाँद आँगन में उतर जाए।
तू दुनिया में हमेशा खूब खुदा की रहमते पाये।।

एक नया एहसास

जिंदगी के उतार चढ़ाव में जब मन कुछ व्यथित होने लगे...आशा और प्रत्याशा युद्ध की स्थिति उत्पन्न करने लगे...और हृदय में तमाम ज्वार उठने लगे..तब इस युद्ध की स्थिति पर विराम लगाने के लिए लिखने बैठ जाइए...कलम और कागज जीवन के वो मित्र है जो आपकी हर बात को सहजता से सुनते है...यकीन मानिए लिखने से बहुत सुकून मिलेगा..जैसे मुझे मिला..आत्म मन्थन की कुछ पंक्तिया आपके साथ...

बहुत दूर थी मंजिल मेरी और कठिन था रास्ता।
ना कोई पहचान थी और ना किसी से था वास्ता।
तुम मिले और मै चली, मै से फिरमै भी हम हुयी।
मिल गया एक कारवाँ फिर मिल गयी मंजिल नई।
साज सुर सब साथ है गीत सब लब पर सजे।
गम भी सारे मिट गए जब साथ मेरे तुम हँसे।

बुधवार, 30 सितंबर 2015

मेरा नाम ही मेरी पहचान है

वो शायर है शायरी करता है
उसने कहा तू आग है
मै जल गयी।।
फिर कहा तू मोम है
मै पिघल गयी।।
फिर कहा तू हवा है
मै बह गयी।।
फिर कहा तू जज्बात है
मै मचल गयी।।
फिर कहा तू हालात है
मै बदल गयी।।
बुरा तो तब लगा
जब उसने कहा
तू सिर्फ नाम है
और मै बदल ना सकी।।
क्युकी मेरा नाम ही
मेरी पहचान है।।

तुम मुझे आजमाओगे

बड़ा गुमान था तुमपर
की मेरा साथ निभाओगे
नही मालुम था मुझको
की तुम मुझे आजमाओगे।
दुनिया के भीड़ से तुझको
रखा था संभाल के
पर भूल गयी थी की
तुम हो हस्ती कमाल के।
दिखा के ख्वाब आँखों को
मुझे फिर सताओगे
नही मालुम था मुझको
की तुम मुझे आजमाओगे।
तुम्हारी बातें ही मेरे
जीने का सहारा है
तेरे सिवा जहाँ में
और क्या हमारा है।
बहला के दिल को मेरे
यु तुम चले जाओगे
नहीं मालुम था मुझको
की तुम मुझे आजमाओगे।।

क्यों है

बिखरे थे हम तुझसे मिलने से पहले
आज सिमटे हुए सारे अरमान क्यों है।

चाहत थी कोई आके थाम ले मुझको
बदले हुए से आज हालात क्यों है।

मै तनहा थी दुनिया वीरानी थी मेरी
महके हुए से आज दिन रात क्यों है।

तुझमे ही सारी दुनियां सिमटी है मेरी
तुझसे ही शुरू मेरी हर बात क्यों है।

तकदीर नही थी

मै तनहा जिन्दगी के सफर में थी अबतक
मेरे पास तेरे प्यार की जंजीर नही थी।

बहुत चाहा तुझे ऐ जिन्दगी हमने पर
मेरी ऐसी खुबसूरत तकदीर नही थी।

तो हाथ ही जख्मी कर लिया हमने
जिसमे तेरे प्यार की लकीर नही थी।

तुझे देखा था भरी भीड़ में तनहा मैंने
पर मेरे आँखों में तेरी तस्वीर नही थी।

तूने देखा भी नहीं एक बार पलटकर
शायद मेरे हक़ में वो तदवीर नही थी।।

आवाज देना

कोई जख्म गहराए तो आवाज देना।
कोई साथ ना आये तो आवाज देंना।।

बहुत है जमाने में तेरे चर्चे ऐ हुजुर।
हुनर राख हो जाये तो आवाज देना।।

दामन छोड़ के जाना तेरी फितरत होगी।
जिन्दगी खाक हो जाए तो आवाज देना।।

तेरी हकीकत से कोई गिला नही मुझको।
वक्त बेहिसाब हो जाए तो आवाज देना।।

दिलो को तोडना तेरी आदत पुरानी है।
ये आदत जब बदल जाये तो आवाज देना।।

कलम

मेरी कलम हर बात लिखेगी
अपने और तेरे जज्बात लिखेगी।।

धड़कनो में छुपा के रक्खा है जो
वो सारी बात खुलेआम लिखेगी।।

बाते जो तस्वीरो से किया है मैंने
उनके वो शब्द तमाम लिखेगी।।

कैसे काटी हु जिन्दगी का सफर
फिर से वो सारी दास्तान लिखेगी।।

क्या होगा अंजाम मेरे इश्क का
देंगे हम सारे इम्तिहान लिखेगी।।

बेख़ौफ़ शायर

मेरी आवाज को यु ना दबाओ लोगो।
मै हु सरफिरा बेख़ौफ़ बन लिखता शायर।।

वक्त की ठोकरों से बेशक इरादे है जख्मी मेरे।
खुद के जख्मों को खुद से ही सिलता शायर।।

ख़ुशी से झूम उठेंगे मुझे सुनकर अब लोग।
हु मै हजार काटों के बिच में खिलता शायर।।

बड़े बे आबरू होकर चले जो शायरों की महफ़िल से।
वो जानते है की किश्मत से भी नही मिलता
शायर।।

खरीद लो मेरे अल्फाज मान जाए तुम्हे।
चंद खुशियों के खातिर भी नही बिकता शायर।।

ज़माना झूम रहा है जिसके गजलो पर।
मै हु वो बेवाक सा हालात पर लिखता शायर।।

आवाज देना

कोई जख्म गहराए तो आवाज देना।
कोई साथ ना आये तो आवाज देंना।।

बहुत है जमाने में तेरे चर्चे ऐ हुजुर।
हुनर राख हो जाये तो आवाज देना।

दामन छोड़ के जाना तेरी फितरत होगी।
जिन्दगी खाक हो जाए तो आवाज देना।।

तेरी हकीकत से कोई गिला नही मुझको।
वक्त बेहिसाब हो जाए तो आवाज देना।।

दिलो को तोडना तेरी आदत पुरानी है।
ये आदत जब बदल जाये तो आवाज देना।।

हर बात लिखेंगे

कुछ अनुभवों की दास्तान लिखेंगे।
एक बार अपनी पहचान लिखेंगे।।

बिता है दौर जो मुफलिसी का यारो।
उस दौर की सारी दास्तान लिखेंगे।।

ईमान बेच कर जीते है जो इन्सान।
उनके लिए कुछ और ब्यान लिखेंगे।।

बदल दे समाज के रिवाज जो ऐ रीत।
ऐसे अल्फाज हजार बार लिखेंगे।।

कुछ तो समझ ले दुनीयाँ ईमान की कीमत।
हम सोच समझ कर हर बात लिखेंगे।।

खुद को बदल के देख

बदल जायेगी जिन्दगी तेरी जरा साथ चल के देख।
मेरे लिए भी तू कभी खुद को बदल के देख।।

नखरे तेरे हजार है शिकवे भी है शामिल।
मेरे लिए तू अपना नजरिया बदल के देख।।

खामोश है जुबाँ क्यों? ऐतराज क्या तुझे?
मेरे लिए तू अपने अहसास बदल के देख।।

मुसाफिर हु तेरे राह की मंजिल है मेरी तू।
मेरे लिए भी तू कभी मेरे साथ चल के देख।।

एहसान इश्क का कर न फैसला सुना।
मेरे लिए तू अपना फ़रमान बदल के देख।।

बदल जाएगी जिंदगी तेरी जरा साथ चल देख।।
मेरे लिए भी तू कभी खुद को बदल के देख।।

तेरा साथ नही है

अब दिन भी मेरा रात की तन्हाइयों सा है।
गजब शोर में जो तेरी आवाज नही है।।

गूंजती है बेसबब आवाज भी यहाँ।।
हलचल जो मचा दे वो बात नही है।।

कारवां गुजरा है मेरे साथ भी बहुत।
पर ऐ हमसफर तेरा साथ नही है।।

दुनिया के रंगमंच पर अजब सी भीड़ है।
हर किसी में तुझसा अंदाज नही है।।

आगाज मैंने देखा अंजाम भी दिखा।
हर शख्स यहाँ तुझसा बेहिसाब नही है।।

हर बात कहेंगी

आँखे गर भर आई
कुछ ख़ास कहेंगी
बीते हुए कल की
हर बात कहेंगी।
वो बाते पुरानी
तुम्हे थी सुनानी
लहू में रवानी
बेख़ौफ़ थी जवानी।
उन दिनों के ये सारे
अंदाज कहेंगी
बीते हुए कल की
हर बात कहेंगी।
वो सपनो का बुनना
वो ख़्वाबों में उड़ना
वो जुगनू पकड़ना
वो खुद पर अकड़ना।
फिर से वो सारी
दास्तान कहेंगी
बीते हुए कल की
हर बात कहेंगी।
वो सखियों की टोली
वो मस्ती की बोली
वो बाते सुहानी
वो अपनी कहानी।
कहानी और सारे
जज्बात कहेंगी
बीते हुए कल की
हर बात कहेंगी।
क्या दिन थे वो भी
क्या पल थे वो भी
उस पल का गुजरना
और फिर अब अखरना।
पा लूं वो फिर से
हालात कहेंगी
बीते हुए कल की
हर बात कहेंगी।।

जवाब दो

आज मै सवाल करती हु
जवाब दो तो मान जाये तुम्हे।
गर हम इंसान है
हमारी इंसानियत कहाँ है?
क्यों जकड़े है हम बेड़ियों में?
बेवजह की रुढियो में?
क्यों जुड़ नही पाते हम सब
एक कड़ीयो में?
बेकार की रीतियाँ
अनसुलझी नीतियाँ
जिनका ना कोई आकार
जिनका ना कोई प्रकार
उलझ रहे है क्यों बेकार के सवाल में?
जवाब दो तो मान जाये तुम्हे।
क्या इंसानों का धर्म यही है?
चोट देना किसी को अधर्म नही है?
क्या मन को मार देना अभिशाप नही है?
उलझ रहे है क्यों बेकार के बवाल में।
जवाब दो तो मान जाए तुम्हे?
क्या बना सकते है हम एक नया समाज?
बदल सकते है क्या हम बेकार के रिवाज?
सुना है आज मानव सभ्य हो रहा है।
क्या बना सकते है अब हम एक नया मिशाल?
जवाब दो तो मान जाए तुम्हे।

आओ तुम्हे एक खुला आसमान दे दूँ

आओं एक बार तुम्हे
कुछ सामान दे दू।
खुले आसमान के नीचे
एक नया आसमान दे दू।
मांग ले अगर तू तो
तुम्हे सारा जहां दे दू।
इबादत करती हु जिसकी
अपना वो भगवान दे दू।।
आओं एक बार तुम्हे
कुछ सामान दे दू।
दिल में छुपा के रखा है जो
वो सारे अरमान दे दू।
बिगड़े हालात के साथी थे जो
मै वो सारे इंसान दे दू।
मेरी खुदगर्जी की पहचान है जो
अपना वो ईमान दे दू।
आओ एक बार तुम्हे
कुछ सामान दे दू।
आओ ना!
एक बार तुम्हे
फिर से एक खुला
आसमान दे दू!!!!!!

मै परेशान बहुत हूँ

समय बदला
सोच बदला
इंसान बदला
तबतक तो ठीक
ईमान बदल गया
परेशान बहुत हूँ.....
आदत बदली
चाहत बदली
हसरत बदली
तबतक तक तो ठीक
फितरत बदल गयी
परेशान बहुत हूँ.....
अदब बदला
लिहाज बदला
अंदाज बदला
तबतक तो ठीक
नियत बदल गयी
परेशान बहुत हूँ....
सपने बदले
अपने बदले
सुरत बदला
तबतक तो ठीक
सीरत बदल गयी
परेशान बहुत हूँ....
घर बदला
रिश्ते बदले
नाते बदले
तबतक तो ठीक
तू भी बदल गया
परेशान बहुत हूँ....
मै परेशान बहुत हूँ..

दर्द अब सिकन्दर हो गया

दर्द मेरा सहरा था अब समुन्दर हो गया।
बड़ा अजीब सा इस दर्द का मंजर हो गया।।
तकदीर की गवाही थी और वक्त का तकाजा।
आज फिर से मै देखो मस्त कलंदर हो गया।।
आइना तो अब भी वही है सदियों से रहा।
बात और है की अक्स मेरा बंजर हो
गया।।
खामोशियाँ मेरी उसे खलती नही कभी।
वो दर्द देके आज सिकंदर हो गया।।

कही तुम वही तो नही?

कल दिखी मुझे
एक धुंधली सी
परछाई
मन से आवाज आई
कही तुम वही तो नहीं....
वर्षो से जिसे ढूंढता
है व्याकुल मन
कभी तस्वीरो में
कभी हाथ की
लकीरों में दिन की
उजास में कही तुम
वही तो नहीं....
तुम मेरे बीते
वक्त की पहचान
हो और तुमसे
जुडी है मेरी
बहुत सारी यादें
मेरे क्रोध में
मेरे प्रेम में
ह्रदय में तुम ही
तुम ही तो हो
तभी दिल ने
फिर से एक बार
पूछा कही तुम
वही तो नही...
कही तुम
वही तो नही....

तुम कौन हो?

तुम कौन हो जो
जो मेरे वजूद में
उतर जाते हो चुपके से....
तुम कौन हो जो मेरे
गीतों में सज जाते हो
चुपके से....
मेरी रूह बनके तो
कभी सुर बनके।
कौन हो तुम!
कितनी बार देखा है
तुम्हे अपनी पलकों
पर सजते हुए
कितनी बार देखा है
तुम्हे अपनी सासों
में घुलते हुए..
कौन हो तुम जिसके
ख्याल से ही वांछा
खिल जाती है
अस्तित्व हिल जाता है।
कितनी बार देखा है तुम्हे!
कौन हो तुम जो
ख्यालो में बस जाते हो
चुपके से...
कौन हो! तुम????

चलो पत्थर पर फूल उगाया जाए

चलो पत्थर पर फूल
उगाया जाये
कुछ पागलपन
दुनियां को दिखाया जाये
कहते है सब लोग
यहाँ जिन्दगी शर्तो
पर नही चलती चलो
ना एक बार अपनी शर्तो
पर दुनियां को घुमाया जाये।
आओ कुछ पागलपन
दुनियाँ को दिखाया जाये।
क्या होगा क्या नहीं
होगा।
ये तो कोई जवाब नही।
क्यों मान ले आसानी
से जिन्दगी का कोई
हिसाब नही।
जिसका कोई उत्तर न हो
ऐसा कोई सवाल नही।
अपनी ही बातो को
खुद पर आजमाया जाये।
कुछ पागलपन दुनियाँ
को दिखाया जाये।
आओ ना एक बार
पत्थर पर फूल उगाया जाए।।

शब्दों से पहचान बना लूँ

शब्दों से पहचान बना लू।
आरजू पूरी हो जाए।।
कुछ सपने आँखों में सजा लूँ।
आरजू पूरी हो जाए।।
गीत बना के खुद को गुनगुना लूँ।
आरजू पूरी हो जाए।।
एक हसरत दिल में जगा लूँ।
आरजू पूरी हो जाए।।
ग़मों को दूर भगा लूँ।
आरजू पूरी हो जाए।
चाहत का शमां दिल में जला लूँ।
आरजू पूरी हो जाए।।

जिंदगी और कितने हिसाब दूँ

जिन्दगी कितने सवाल
है तेरे मुझको लेकर
किन किन सवालों का
जवाब दू।
कितने जख्म सहे है दिल
पर कितने जख्मों का
हिसाब दूँ।
कभी धुप तो कभी
छाँव हर हाल में
चलती रही।जिन्दगी
सबक सिखाती रही
मै आगे बढती रही
मैंने देखा रंग बदलते
मौसम को भी...
खुद को ना बदल सकी
बहुत ढंग थे जमाने में
पर खुद को ना रंग सकी।
और क्या जवाब दूँ
और कितने हिसाब दूँ।

बिटिया मेरे मन को छू ले

बिटिया घर में तेरा बसेरा
महक उठा है आंगन मेरा।
तेरा आना कितना प्यारा
बहे उमंगो की जल धारा।।
स्नेह से पूरित तेरी आँखे।
कोयल की जैसे भीगी पांखे।।
मधुर मधुर आवाज तुम्हारी।
सबसे मीठी सबसे प्यारी।।
मेरी बाहों में झुला झूले।
बिटिया मेरे मन को छुले।।

कैसा रिश्ता है

कैसा रिश्ता है उससे हमारा
ना वो गैर है ना अपना है।।
महसूस करती हु हर पल उसको
खुली आखो में बसा कैसा सपना है।।
उसे पाने का कोई इरादा नही बेशक।
पर उसके बिन कैसे रहना है।।
सवर लिया है उसके खातिर।
वो रूप का मेरे सुंदर गहना है।।
चाहत ऐसी मिली है मुझको उससे।
आसूँ बन खुद आँखों से बहना है।।

बस तेरी ही आरजू है

तुम पर ही शुरू करुँगी मै
प्रेम का समर्पण।
तुमपर ही ख़त्म होगी
बेमोल अब ये जीवन।
तुम एहसासों में बध गये हो
साँसों में घुल गये हो
मन में समा के देखो
धड़कन ही बन गये हो
जिस राह पर चलोगे
वो राह मेरी होगी
थक के कही रुके तो
वो बाह मेरी होगी....
तुमसे ही जल उठा है
आशाओं का ये दीपक।
तुम पर ही ख़त्म होगी....
तुम सुर बन गये हो
मै गीत की हु लड़िया
तुझे गुनगुनाऊ मै अब
न बिते अब ये घड़िया।
मेरा समर्पण तुझको
उस राह पर ले आये
जहाँ से तेरी मंजिल मेरा
प्यार ही बन जाए।
तू रूह बनके उतर जा
तेरी ही आरजू है।
बस तेरी ही आरजू है..

परवाना

कभी तन्हाइयो में कोई
बिखरा तो होगा।
कभी टूट के संभला
तो होगा।
जिन्दगी दर्द की कहानी
ही सही।
मेरे आलावा भी इस
राह पर कोई
चला तो होगा।
सूना है इश्क में खुमारी
है ।
बेशक कोई चिराग
जला तो होगा।
बहुत उड़ते है
पतिंगे चिरागों के
आस पास
क्या आज फिर कोई
परवाना फना तो
होगा।।।।

ये कैसा अंजाम है

कही उलझ गयी जिन्दगी
की डोर कुछ हुवा तो नही
कैसी खामोशी है
क्यों थम गया है शोर
क्यों भीड़ में तनहा सी
जिन्दगी है
क्यों बोझिल सी साँसे
क्यों उखड़ा सा मन है
क्यों धुंधला सा दर्पण
कहो ना कुछ हुवा तो नही।
समझाओ ना एक बार
बतलाओ ना एक बार
क्यों टूटने लगे है तार
क्यों रुठा है प्यार
क्या उजड़ गया संसार।
आने वाले जीवन का
कैसा आगाज है
बीते लम्हों का ये
कैसा अंजाम है
ये कैसा अंजाम है???

मुझे खुद से बिदाई दे दो!!

दिल टूटने की फिर गवाही दे दो।
आके फिर एक और तबाही दे दो।।
अश्क बहकर युही बेकार हो रहे है।
सहेज लू मुझे एक सुराही दे दो।।
कैसे चलू सरे राह सफर लंबा है।
आज मुझे साथ एक राही दे दो।।
मै परेशान रही आज तक तेरे खातिर।
दो पल के लिए गम से जुदाई दे दो।।
बहुत घुटता है दम तेरी खामोशी से।
जिन्दगी अब मुझे खुदसे बिदाई दे दो।।

वजूद को दर्पण मिला

चलो जिन्दगी का कुछ
तजुर्बा तो मिला
राह चले तो कुछ सिला
तो मिला....
कुछ हार मिला तो
कुछ जीत तो मिला
कुछ पने मिले
कोई बेगाना भी मिला
समर्पित है जीवन
समर्पित है तन मन
मुझे मेरे वजूद का
एक दर्पण तो मिला।।

मुट्ठी में आसमान भर लूँ

टूटते बिखरते सपनो को
जोड़ने की कोशिश करती
मै काश खुद की
पहचान कर लूँ....
चल आज फिर अपनी
मुट्ठी में सारा आसमान
भर लू..
खोज लू खुद के लिए
राह अगर साथ दे दो
तुझमे खो के मै
जिन्दगी आसान कर लू
चल एक बार फिर
अपनी बंद मुट्ठी में
सारा आसमान
भर लूँ...
तू अगर साथ दे दे
चुन लू कुछ सपने
नये
तू अगर साथ दे दे
बुन लू कुछ अरमां
नये..
खुद अपने ही लिए
कुछ अहसान कर लूँ
आओ ना एक बार
फिर
अपनी मुठ्ठी में सारा
आसमां भर लूँ...
संभव है तेरे साथ से
सब कुछ हासिल हो
मिल जाए वह राह
जो मेरे काबिल हो
आओ ना तेरे साथ
एक राह चुन लूँ
एक बार खुद की बंद
मुट्ठी में सारा आसमान
भर लूँ...आओ
तुझसे जुड़ के
खुद की पहचान कर लूँ
आओ ना.....

मंगलवार, 29 सितंबर 2015

चुप हूँ

हम अगर चुप है तो इसको भी गनीमत समझो।
हम अगर सब्र ना करे तो कयामत होगी।।

शोर करने से भी क्या हासिल होता जहाँ में।
हाशिये पर मेरे अपनों की ही इज्जत होगी।।

तुझसे मिलना भी नसीब का लिखा था मेरा।
तेरी रुसवाई मगर जान की कीमत होगी।।

तुझपर मै क्या अपने जज्बात लिखूँ अबतो।।
लिख दे गर कलम तो ये उसकी ही नैमत होगी।।

भूल गया वो मै भी भूला दूँ उसको मगर।
फिर रुसवा उससे मेरी ही मुहब्बत होगी।।