शुक्रवार, 16 जुलाई 2021

तुमसे ही जीवन था

कई दफ़ा बिछड़ना, कुछ इस कदर भी होता है
जाने वाला जाने से पहले ही, जा चुका होता है...
जाने वो कैसे मुकद्दर की, किताब लिख देता है
साॅंसे गिनती की हैं, ख्वाहिशें बेहिसाब लिख देता है...
जिनकी गलतीयों से भी, मैंने रिश्ता निभाया है
बार-बार मुझे फ़ालतू होने का, अहसास दिलाया है..
कौन हूॅं मैं ऐ-ज़िंदगी तू ही बता
थक गई हूॅं मैं, ख़ुद का पता ढूॅंढते-ढूॅंढते
अंदर से तो कब के, मर चुके हैं हम
ऐ-मौत तू ही आजा, लोग अब सबूत माॅंगते हैं.
किश्तों में, ख़ुदखुशी कर रही है ये ज़िंदगी अब तो

रविवार, 11 जुलाई 2021

कुमार विश्वास जी की कविता जो मुझे बेहद पसंद है

कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है !
मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है !!
मैं तुझसे दूर कैसा हूँ , तू मुझसे दूर कैसी है !
ये तेरा दिल समझता है या मेरा दिल समझता है !!

मोहब्बत एक अहसासों की पावन सी कहानी है !
कभी कबिरा दीवाना था कभी मीरा दीवानी है !!
यहाँ सब लोग कहते हैं, मेरी आंखों में आँसू हैं !
जो तू समझे तो मोती है, जो ना समझे तो पानी है !!

समंदर पीर का अन्दर है, लेकिन रो नही सकता !
यह आँसू प्यार का मोती है, इसको खो नही सकता !!
मेरी चाहत को दुल्हन तू बना लेना, मगर सुन ले !
जो मेरा हो नही पाया, वो तेरा हो नही सकता !!

भ्रमर कोई कुमुदुनी पर मचल बैठा तो हंगामा!
हमारे दिल में कोई ख्वाब पल बैठा तो हंगामा!!
अभी तक डूब कर सुनते थे सब किस्सा मोहब्बत का!
मैं किस्से को हकीक़त में बदल बैठा तो हंगामा!!

भ्रमर कोई कुमुदनी पर मचल बैठा तो हंगामा
हमारे दिल में कोई ख्वाब पल बैठा तो हंगामा
अभी तक डूबकर सुनते थे सब किस्सा मुहब्बत का
मैं किस्से को हकीकत में बदल बैठा तो हंगामा

कभी कोई जो खुलकर हंस लिया दो पल तो हंगामा
कोई ख़्वाबों में आकर बस लिया दो पल तो हंगामा
मैं उससे दूर था तो शोर था साजिश है , साजिश है
उसे बाहों में खुलकर कस लिया दो पल तो हंगामा

जब आता है जीवन में खयालातों का हंगामा
ये जज्बातों, मुलाकातों हंसी रातों का हंगामा
जवानी के क़यामत दौर में यह सोचते हैं सब
ये हंगामे की रातें हैं या है रातों का हंगामा

कलम को खून में खुद के डुबोता हूँ तो हंगामा 
गिरेबां अपना आंसू में भिगोता हूँ तो हंगामा 
नही मुझ पर भी जो खुद की खबर वो है जमाने पर 
मैं हंसता हूँ तो हंगामा, मैं रोता हूँ तो हंगामा

इबारत से गुनाहों तक की मंजिल में है हंगामा
ज़रा-सी पी के आये बस तो महफ़िल में है हंगामा
कभी बचपन, जवानी और बुढापे में है हंगामा
जेहन में है कभी तो फिर कभी दिल में है हंगामा

हुए पैदा तो धरती पर हुआ आबाद हंगामा
जवानी को हमारी कर गया बर्बाद हंगामा
हमारे भाल पर तकदीर ने ये लिख दिया जैसे
हमारे सामने है और हमारे बाद हंगामा

"ये जो है हुक़्म मेरे पास न आए कोई;
इसलिए रूठ रहे हैं कि मनाए कोई;

ये न पूछो कि ग़म-ए-हिज्र में कैसी गुज़री;
दिल दिखाने का हो तो दिखाए कोई;

हो चुका ऐश का जलसा तो मुझे ख़त पहुँचा;
आपकी तरह से मेहमान बुलाए कोई;

तर्क-ए-बेदाद की तुम दाद न पाओ मुझसे;
करके एहसान, न एहसान जताए कोई;

क्यों वो मय-दाख़िल-ए-दावत ही नहीं ऐ वाइज़;
मेहरबानी से बुलाकर जो पिलाए कोई;

सर्द -मेहरी से ज़माने के हुआ है दिल सर्द;
रखकर इस चीज़ को क्या आग लगाए कोई;

आपने दाग़ को मुँह भी न लगाया, अफ़सोस;
उसको रखता था कलेजे से लगाए कोई।

मेरे प्रिय कवि कुमार विसवास जी