रविवार, 30 नवंबर 2025

विश्वास का विराट स्वर

मंज़िलों का पता रास्तों से नहीं,
चलने वाले के विश्वास से मिलता है।
और विश्वास उधार का नहीं होता,
यह आत्मा खुद अपने भीतर गढ़ती है —
चोटों से, अस्वीकारों से,
और उन खामोश रातों से
जहाँ हम आँसुओं के बीच भी
अपने होने का प्रमाण खोजते रहते हैं।

कहने को दुनिया बहुत है,
पर समझने को मन बहुत कम।
लोग आँखों से देखते हैं, मैं भीतर से।
उन्हें शक में तसल्ली मिलती है,
मुझे सत्य में।
इसलिए मैं वही आवाज़ दोहराती हूँ
जो भीतर अडिग खड़ी है:
“मुझे खुद पर भरोसा है — तुम अपना देख लो।”

तुम्हें लगता है मैं गिर जाऊँगी,
पर मैं जानती हूँ —
मनुष्य तभी गिरता है
जब वह स्वयं को गिरा हुआ मानने लगे।
और मैंने अपने भीतर
हार की अनुमति ही नहीं छोड़ी।
हर पराजय को मैंने अनुभव कहा,
हर दर्द को दिशा कहा,
हर विरक्ति को मोक्ष कहा
और हर ठोकर को मार्ग का विलक्षण संकेत।

जीवन गणित नहीं — दर्शन है,
जहाँ 1 हार + 1 हौसला = फिर से जन्म।
और यदि पीछे कोई नहीं,
तो इसका अर्थ यह नहीं कि मैं अकेली हूँ —
इसका अर्थ है
कि मुझे आगे बढ़ने से रोकने वाला कोई नहीं।

मैं उस ऊर्जा पर विश्वास करती हूँ
जिसे कोई समझ नहीं सकता
पर हर युग के तपस्वी, यात्री, साहसी
इसी को साधकर आगे बढ़ते रहे हैं:
आत्मस्वीकृति — आत्मविश्वास — आत्मबल।

दुनिया का मापदंड बाहरी होता है,
और मेरा भीतरी।
दुनिया पूछती है — “क्या पाया?”
मैं पूछती हूँ — “क्या समझा?”
दुनिया कहती है — “किसने साथ दिया?”
मैं पूछती हूँ — “मैंने खुद को कितना साथ दिया?”

जो भीतर से स्वतंत्र है,
उसे कोई बाँध नहीं सकता,
जो भीतर से स्वीकृत है,
उसे कोई अस्वीकार नहीं कर सकता,
और जो भीतर से खड़ा है —
उसे गिराने वाला कोई पैदा नहीं हुआ।

इसलिए मैं किसी लड़ाई में नहीं,
सिर्फ अपने विकास में हूँ।
मैं किसी प्रतिद्वंद्वी के विरुद्ध नहीं,
सिर्फ अपनी सीमाओं के पार जा रही हूँ।
दुनिया को सफाई देने की जरूरत नहीं,
क्योंकि सत्य अपना प्रमाण स्वयं लेकर आता है।

तुम चाहो तो राह बदल लो,
तुम चाहो तो नज़र फेर लो,
तुम चाहो तो इंतज़ार करो मेरी असफलताओं का —
यह अधिकार तुम्हारा है।
पर मैं अपने एकमात्र अधिकार पर अडिग रहूँगी —
स्वयं में विश्वास।

क्योंकि अंत में
भाग्य, लोग, हालात, समय —
सब बदलते हैं…
पर इंसान जितना खुद पर विश्वास करता है
उतना ही ऊँचा उठता है।

और मैं उठूँगी —
बिना शोर, बिना घृणा, बिना प्रतिशोध —
केवल अपने सत्य के सहारे।

क्योंकि मुझे भरोसा है —
नसीब नहीं,
खुद पर।
बाकी दुनिया…
तुम अपना देख लो।

कुछ क्षण बिगड़े तो क्या हुआ

जीवन की किताब में
कुछ पन्ने मुड़ जाने से कहानी खत्म नहीं होती,
लम्हों की ठोकरों से
इंसान की पूरी मंज़िल तुटा करती नहीं होती।

कभी-कभी ज़िंदगी बिखरती है
सिखाने के लिए, मिटाने के लिए नहीं,
हर दर्द गिरने के लिए आता है
डूब मर जाने के लिए नहीं।

जो पल आज बेगाने लगे,
कल वही पल यादों का आख़िरी सहारा बन जाते हैं,
और जो लोग आज छोड़ गए,
कल वही क़िस्मत की रफ़ाक़त समझ आते हैं।
हर बिछड़ना अंत नहीं होता,
कभी-कभी तकदीर की नियति में
नए रास्ते के लिए पुराना कंधा हटाया जाता है।

रोओ, टूटो, थको — इंसान हो,
पर खुद को ख़त्म मत समझो,
क्योंकि मौसम बदला करता है,
लोग बदला करते हैं, हालात बदला करते हैं,
पर किस्मत भी तब बदलती है
जब इंसान टूटकर भी खड़ा रहने का फ़ैसला करता है।

जिस रात में उम्मीद का एक तारा भी न दिखे,
वहीं से सुबह पैदा होती है,
जहाँ खत्म होने का डर सबसे ज्यादा हो,
वहीं से फिर शुरूआत होती है।

ज़िंदगी एक पल में रूठती है,
पर उसी पल की गोद में
अगली मुस्कान का बीज भी छुपा होता है।
हार का भी एक वक़्त होता है —
और उसके बाद जीत का वक़्त
ठीक बगल में खड़ा इंतज़ार करता है,
बस हम उसे देखने की हिम्मत जुटाएँ
उतना काफी होता है।

जिन दरवाज़ों ने ठुकराया,
जरूरी नहीं दोष दरवाज़ों का हो —
कई बार हम वो जगह माँग रहे होते हैं
जहाँ हमारी किस्मत रहने वाली ही नहीं होती।
किसी मोड़ पर गिर जाना भी
उसी रास्ते का संकेत होता है
कि सफ़र खत्म नहीं —
अध्याय बदल रहा है।

तूफ़ान रोकते वही हैं
जिनके भीतर नदी बनने का साहस बचा होता है,
और राख सिर्फ उनको मिलती है
जिनमें फिर से जल उठने की क्षमता होती है।
कुछ क्षण अगर ख़राब भी हुए,
तो यह सबूत हैं कि
जीवन चल रहा है, रुक नहीं गया।

तो याद रखना —
जो टूटकर भी मुस्कुराए,
वो हार नहीं रहा होता,
बल्कि किस्मत को बताते हुए चलता है
कि मैं तुम्हारे हिसाब से नहीं, अपने हौसलों के हिसाब से जिऊँगा।

इसलिए…
एक बुरा दिन, एक बुरा लम्हा, एक बुरी घटना —
पूरी ज़िंदगी का फैसला नहीं करती।
ठहरकर देखो,
जहाँ दर्द खत्म होता है
वहीं से शक्ति जन्म लेती है,
और जहाँ एक दरवाज़ा बंद होता है
वहीं ज़िंदगी कहती है —
अगली मंज़िल में आपका स्वागत है।

शनिवार, 29 नवंबर 2025

वो किरदार

वो किरदार मेरे सपनों में आता है,
जिसे अपनी कहानियों में मैंने मार डाला था —
कलम की धार से कूच कर दिया,
काग़ज़ के युद्ध में उसे खत्म कर दिया,
पर नींद के दरवाजे बंद करना
मेरे वश में कभी था ही नहीं।

रात के सन्नाटे में वो फिर लौट आता है,
घावों पर धूल झाड़कर खड़ा हो जाता है—
“लेखिका, क्या वाक़ई मैं इतना बुरा था?”
उसकी भारी आवाज़
मेरे अंतर का वीरान कमरा हिला जाती है।

मैं घबरा जाती हूं
उसकी आंखों के भीतर की शिकायतों से,
वो आंखें—जो न पाठकों ने देखीं, न दुनिया ने पढ़ीं,
पर मैंने लिखते समय उन्हें महसूस किया था।

वो कहता है—
“तुम्हारी कहानी ने मुझे विलेन कहा,
पर सच तो यह है कि तुमने कभी
मेरी मजबूरियों को लिखा ही नहीं।
मेरे अंधेरों में भी कुछ जुगनू थे,
तुमने उन्हें अस्तित्व से मिटा दिया।”

मैं चाहकर भी जवाब नहीं दे पाती।
क्योंकि सच यह है—
मैंने उसे इसलिए मारा था
क्योंकि वो इतना सच्चा, इतना असली था
कि अगर जिंदा छोड़ देती,
तो पूरी कहानी उसकी हो जाती।

वो किरदार आज भी मेरे सपनों में आता है—
न नाराज़, न गुस्से में,
बस शांत…
चुपचाप, जैसे बचे हुए शब्दों का कोई अनाथ।

कभी दरवाज़े पर बैठकर धुआं बन जाता है,
कभी मेरे तकिए के पास बैठकर पूछता है—
“क्या अगले जन्म में मुझे हीरो बनने दोगी?
या फिर तुम्हारी कहानियों के जंगल में
मैं हमेशा भटकता रहूंगा
बुराई की पहचान बनकर?”

और मैं…
मैं सुबह उठकर तय नहीं कर पाती
कि डर उसके लौट आने का है,
या फिर इस बात का—
कि शायद वह सच में
मुझसे बेहतर इंसान था
और मैं ही उसकी कहानी लिखने के लायक नहीं थी।

इसलिए अब हर नई कहानी लिखते समय
मैं पात्रों से माफी मांग लेती हूं —
क्योंकि एक किरदार जिसे मैंने मार डाला था
आज भी जीवित है,
मेरे सपनों में,
मेरी आत्मा की अदालत में,
और मेरी कलम उससे हार गई है। ✍️

महान नहीं इंसान बनना है मुझे


मैं उस शिखर की चाह नहीं रखती,
जहाँ तख़्त और शोहरत का धुआँ छाया हो।
मेरे कदम उस राह पर हैं,
जहाँ दर्द को समझने की गहराई हो,
जहाँ मुस्कान बाँटने की ताक़त हो।

महान बनना कोई मापदंड नहीं,
वो केवल शब्दों की चमक है।
पर इंसानियत,
वो जीवन की नर्म माटी में गहरी जड़ें है—
जो हर टूटे हुए दिल तक पहुँच सके।

मैं वह इंसान बनना चाहती हूँ,
जो किसी के डर में हाथ थाम सके,
जो किसी के ग़म में अपना आँचल बाँट सके।
मैं वह बनूँगी,
जो अपनी आवाज़ से नहीं,
अपने कर्मों से कहे—
“मैं यहाँ हूँ, तुम अकेले नहीं।“

महानता की चमक भले धधकती हो,
लेकिन इंसानियत की रोशनी,
जो चुपचाप जलती है,
वो सबसे गर्म, सबसे सच्ची है।

मैं किताबों में नहीं,
लोगों के दिलों में जीना चाहती हूँ।
महान नहीं, इंसान बनना है मुझे—
एक ऐसा इंसान,
जिसकी कोई तारीफ़ न करे,
लेकिन उसकी उपस्थिति,
किसी के जीवन में फर्क लाए।

शुक्रवार, 28 नवंबर 2025

जिंदगी पर सांसों का बोझ है

घुटन भरी ज़िंदगी से मुक्त कर दो,
अब तो साँसे भी बोझ लग रही…

ये पंक्ति मैं रोज़ अपने भीतर दोहराती हूँ,
जैसे कोई कैदी दीवार पर खरोंचते-खरोंचते
दर्द का कैलेंडर पूरा करता है।
मैं भी अपना हर दिन उसी तरह गिनती हूँ —
कितना जिया नहीं… कितना सहा।

घर की दीवारें मेरा नाम जानती हैं,
पर मेरा दुख नहीं,
आईना चेहरा पहचानता है,
पर आँखों की बाढ़ नहीं,
लोग मेरे शिष्टाचार को सलाम करते हैं,
पर मेरे टूटे मन की धुन नहीं सुनते।

भीड़ में चलते हुए मैं बिल्कुल अकेली हूँ —
इतनी अकेली कि अगर मैं रुक भी जाऊं
तो दुनिया आगे बढ़ जाएगी,
जैसे मैं कभी थी ही नहीं।

किसी ने पूछा नहीं —
कि मुस्कान कितनी भारी है,
कि चुप रहना कितना मुश्किल है,
कि रातें कितनी काली हैं,
और नींद… नींद कब से नाराज़ है।

हर सुबह अलार्म से नहीं,
ज़िम्मेदारियों की धमक से आँख खुलती है,
और हर रात बिस्तर से नहीं,
गिल्ट की कँटीली घास पर सोती हूँ।

अच्छा होना, मजबूत होना, धैर्य रखना,
इन शब्दों ने भी मेरी कमर तोड़ी है —
उम्मीदों के वजन से,
समझौतों की रेत से,
और सपनों के शव से।

कहते हैं — “लोगों के लिए जीओ”,
पर मैं पूछती हूँ —
किसी ने कभी मेरे लिए जिया है?
किसी ने कभी मेरा हाथ पकड़कर कहा है
कि थक गई हो तो रुक जाओ, मैं हूँ न?

नहीं।
हर बार मुझे ही योद्धा बनना पड़ा,
ढाल भी मैं, घाव भी मैं,
युद्धभूमि भी मैं,
और जीत लेने के बाद भी
ताली किसी और के हिस्से में गई।

और आज जब अंदर का शोर
बोलने लगा है सीने पर मुक्के मारकर,
तब भी दुनिया कहती है —
“थोड़ा और सह लो… सब ठीक हो जाएगा।”

नहीं।
अब नहीं।

घुटन भरी ज़िंदगी से मुक्त कर दो,
अब तो साँसे भी बोझ लग रही…
ये हार नहीं — ये अंतिम सत्य है,
ये झुकना नहीं — ये आत्मा का अंतिम विरोध है।

मैं मरना नहीं चाहती —
मैं जीना चाहती हूँ।
पर ऐसे नहीं…
जहाँ धड़कन भी आदेशों पर चले,
जहाँ आँसू भी नक़ाब पहनकर बहें,
जहाँ ज़िंदगी… ज़िंदगी ना लगे।

मुझे एक ऐसी सुबह चाहिए
जहाँ सूरज मेरी तरफ़ हो,
मुझे एक ऐसा प्यार चाहिए
जो मेरे खिलाफ़ न हो,
मुझे एक ऐसा जीवन चाहिए
जहाँ हर सांस मेरी हो।

मैं अंत नहीं मांग रही…
मैं शुरुआत मांग रही हूँ।
मैं आज़ादी नहीं मांग रही…
मैं अपना पूरा अस्तित्व मांग रही हूँ।

अगर यह गलत है—
तो मुझे गलत ही रहने दो।
अगर यह स्वार्थ है—
तो आज पहली बार मैं स्वार्थी बनने दो।

क्योंकि आज…
मैं सिर्फ़ एक ही चीज़ की भीख मांगती हूँ —

मुझे वो ज़िंदगी लौटा दो
जिसे जी सकूं
ना कि सिर्फ़ ढो सकूं। 🌹

रामायण और गीता

मर्यादा सीखनी हो—तो रामायण से पूछ लेना,
और जब ज़िंदगी उलझा दे—तो गीता से खुद को खोज लेना।

क्योंकि
राम की तपस्या सिर्फ़ युद्ध का आख़्यान नहीं,
मर्यादा के पथ पर चलती मानवता का प्रमाण है,
जहाँ वचन सिंहासन से बड़ा था,
और सत्य—स्वयं भगवान था।

सीता के आँचल में त्याग की चाँदनी थी,
लक्ष्मण की रेखा कोई क़ैद नहीं,
बल्कि सम्मान का आभूषण थी।
हनुमान की उड़ान शक्ति नहीं,
निष्ठा की पहचान थी।

रामायण कहती है—
जीत का अर्थ रावण को जलाना नहीं,
अपने भीतर की अहंकार की अग्नि बुझाना है।

इसलिए अगर मर्यादा सीखनी हो—
तो रामायण पढ़ना,
क्योंकि वहाँ हर पात्र बोलता है—
"राज्य से बड़ा धर्म है,
और धर्म से बड़ा मनुष्य का चरित्र।"

और
जब जीवन के प्रश्न तलवार बनकर गर्दन पर रखे,
जब रिश्ते किवाड़ बनकर बंद होने लगें,
जब मन का अशांत सागर किनारों को तोड़ने लगे,
तब—
गीता को खोल लेना…
उसे पढ़ना नहीं, महसूस करना।

वह सिखाती है—
कर्म समाधान है,
परिणाम की चिंता कैद है,
और भय—मन का सबसे बड़ा शत्रु।

गीता कहती है—
“स्वयं से युद्ध ही सबसे बड़ा युद्ध है,
और स्वयं पर विजय ही सच्ची जीत।”

कृष्ण की मुस्कान समझ आ गई तो—
हार भी शांति बन जाती है,
उलझन भी साधना बन जाती है।

वे बताते हैं—
जीवन पांव पकड़कर रोकने नहीं आया,
चलाना सिखाने आया है।
रुकना दुख देता है,
और आगे बढ़ना मोक्ष।

इसलिए अगर कभी
दिल थक जाए,
मन बिखर जाए,
और जीवन सवालों का तूफ़ान बन जाए—

तो युद्ध मत छोड़ना,
बस अर्जुन बन जाना,
और गीता से फिर खड़े होना।

मर्यादा—रामायण से,
और समाधान—गीता से,
मनुष्य का जीवन इन दोनों के बीच की यात्रा है।
जो इसे समझ गया—
वही प्रेम करता है, वही जीता है, वही जीतता है।

सरनेम की सिलवटों में दबी स्त्री

सरनेम…
एक ऐसा शब्द
जो जन्म लेते ही
किसी लड़की की आत्मा पर
पहले पहरेदार की तरह टांका जाता है —
“ये तुम्हारी पहचान नहीं…
तुम्हें बस इसे ढोना है।”

माँ की कोख में पल रही बच्ची
अस्तित्व से पहले ही
किसी और की कुल-परंपरा लिख दी जाती है,
मानो जन्म से पहले ही तय हो गया हो —
वो अपना नहीं, उधार का वजूद है।

फिर बड़ी होती है…
पढ़ती है, बढ़ती है, सपने पकड़ती है,
पर हर दस्तावेज़, हर फ़ाइल में
उसका नाम नहीं —
किसी “वंश” की मुहर थोप दी जाती है।

और विवाह?
कहते हैं — “नई जिंदगी की शुरुआत।”
पर छिपे सच में
वो पुरानी पहचान का अंतिम संस्कार होता है,
क्योंकि सरनेम बदलते ही
उसकी पूरी कहानी मिटा दी जाती है —
तालियों के बीच… ख़ामोशी की मौत।

उसके नाम के बाद जो जुड़ता है
वो सम्मान नहीं —
एक अनकहा करार होता है
कि तुम कभी अपनी नहीं हो सकती,
पहले पिता की विरासत, फिर पति की परछाई,
और अंत में
बेटों की पहचान में गुम हो जाओगी।

स्त्री के लिए सरनेम
कफन नहीं…
उसकी स्वतंत्रता का ताला है,
जिसे समाज कंगन की तरह पहनाता है
और कहता है —
“यह है तुम्हारी मर्यादा।”

काग़ज़ पर नाम बदलने की क़ीमत
एक हस्ताक्षर से चुकाई जाती है,
पर आत्मा बदलने की क़ीमत
सदियों से स्त्रियाँ अपने पूरे जीवन से देती आई है।

पर आज की स्त्री…
अब चुप नहीं है।
वह कफ़न से कफन तोड़कर उठ खड़ी है —
कहती है:
“मेरी पहचान मेरा जन्म है,
तुम्हारा दिया हुआ उपनाम नहीं।”

वह अपने नाम को
अपने संघर्ष, अपने लेखन, अपने कर्म,
अपने साहस में बुन रही है।
अब किसी कुल का गौरव नहीं —
वह खुद एक वंश बन रही है।
स्वयं इतिहास लिख रही है
बिना सरनेम के भी पूर्ण,
क्योंकि वो जान चुकी है —

 असली नाम वही होता है
जिसे दुनिया बदल दे,
न कि वह
जिससे दुनिया स्त्री को बदल दे।

दिव्या____मेरा नाम ही मेरी पहचान है

उन्होंने कहा —
दुनिया में स्त्री की पहचान किसी और के नाम से बनती है,
किसी की बेटी, किसी की बहू, किसी की पत्नी…
पर मैंने कहा —
“मैं दिव्या हूँ — और यह नाम ही काफी है।”

दिव्या
किसी सिलसिले का लेबल नहीं,
किसी रिश्ते का साया नहीं,
किसी परंपरा की ठंडी मुहर नहीं।
यह आग है —
और उसका ताप मेरे हर कदम में जलता है।

मैंने सिर झुकाकर पहचान नहीं माँगी,
मैंने सिर उठाकर पहचान गढ़ी।
उन्होंने सोचा था
कि मैं चुप रह जाऊँगी,
पर मेरा नाम आवाज़ बन गया —
और मैंने अपने शब्दों में क्रांति लिख दी।

दुनिया को आदत है
स्त्री को किसी और के नाम से बुलाने की,
पर जब मैंने कहा —
“मेरा नाम दिव्या है,”
तो समाज ने असहज होकर नज़रें झुका लीं,
क्योंकि उन्हें आज़ाद स्त्री की रोशनी चुभती है।

दिव्या
सिर्फ़ नाम नहीं —
यह मेरे वजूद की गूँज है,
मेरे घावों का साहस है,
मेरी हारों से जन्मी जीत है।

उन्होंने पूछा —
“किसकी बेटी हो? किसकी पत्नी हो? किसकी बहू हो?”
और मैं मुस्कराकर बोली —
“मैं खुद की हूँ — और यही मेरी पहचान है।”

मुझे भूमिका नहीं — अधिकार चाहिए,
भूषण नहीं — स्वाभिमान चाहिए,
बंधन नहीं — उड़ान चाहिए।
और मेरा नाम,
दिव्या,
मेरे आकाश का पहला पंख है।

दिव्या
भीड़ में खोने के लिए नहीं जन्मी,
भीड़ से अलग खड़े होने के लिए बनी है।
जो मुझे नहीं पहचानते
उन्हें पहचानने की मुझे कोई मजबूरी नहीं।

यह नाम —
झुकेगा नहीं, बिकेगा नहीं,
तोड़ना चाहोगे तो और सख़्त हो जाएगा।
यह नाम —
साहस है, विद्रोह है, स्वप्न है, स्वाभिमान है।

और मैं कहूँगी —
ज़ोर से, निडर होकर, हर धड़कन के साथ —

“मैं दिव्या हूँ।
मेरा नाम ही मेरी पहचान है —
और यह पहचान कभी झुकेगी नहीं।”

लोग बदलते नहीं बस खुद में दफ्न हो जाते है

लोग बदले कहाँ हैं,
उन्होंने बस अपनी आहों को मौन की चादर ओढ़ा दी है,
अब वे तड़पते कम नहीं…
बस दिखाते नहीं।

पहले जो शब्दों में बुझते थे,
अब आँखों की गहराइयों में जलते हैं,
और हम समझते हैं —
शायद दिल बदल गया।
नहीं…
बस टूट गया।

रिश्ते कमज़ोर नहीं थे,
विश्वास थक गया था,
वह बार-बार गिरकर उठते-उठते
एक दिन ज़ख्मों के बोझ से बैठ गया।

कौन बदला?
बदला सिर्फ़ इतना कि
जहाँ पहले हँसी थी,
अब आदत बनकर तटस्थता बैठ गई है
जहाँ पहले सवाल थे,
अब स्वीकृति का सांप लिपट गया है गले में।

खामोशी नया इंसान नहीं बनाती,
बस पुराने को बचा लेती है,
ताकि वह फिर से
किसी की बेरहम आवाज़ में
मर न जाए।

चुप्पी कोई विकल्प नहीं,
ये आत्मा की अंतिम सुरक्षा कवच है।
क्योंकि जब इंसान के भीतर
तूफ़ान बहुत ज़्यादा बोलने लगे,
तो होंठों की कुल्फ़ी जमानी पड़ती है।

लोग बदलते नहीं दिव्या,
वे बस अपने भीतर दफ़्न हो जाते हैं—
ताकि दुनिया उन्हें
बार-बार दफ़नाने का हक़
ना मांग सके।

तुम गए तो.....

तुम गए तो ज़िंदगी नहीं रुकी…
पर हर धड़कन ठहरकर पूछती है —
जिसके लिए धड़कना था, वो कौन था?
जिसको पुकारना था, वो कहाँ गया?

राहें अब भी मोड़ों तक जाती हैं,
मगर किसी मंज़िल का नाम नहीं बचा,
आँखें अब भी सपने बुनती हैं,
पर तकियों पर कोई शाम नहीं बचा।

तुम गए तो शहर वही है,
पर गलियों में पहचान नहीं रही,
आईनों में चेहरा मेरा है,
पर आँखों में वो जान नहीं रही।

हवा पहले भी चलती थी,
पर अब उसका कोई मतलब नहीं,
चाँद कभी अपना लगता था,
अब उससे कोई रिश्ता नहीं।

तुम गए, तो मैं नहीं टूटी—
मैं बस ख़ुद से दूर चली गई,
जीने की आदत जैसे रही,
पर ज़िंदगी… बस ज़िंदा सी रह गई।

अब हर खुशी आधी लगती है,
हर जश्न में खामोशी है,
भीड़ भरी महफ़िल में भी
तन्हाई सबसे ज़्यादा रोशन होती है।

कभी तुमसे बात की तरह
आजकल ख़ुद से बातें करती हूँ,
पहले सवाल कम होते थे,
अब जवाबों की खोज में मरती हूँ।

लोग कहते हैं — "समय सब ठीक कर देता है"
पर उन्हें क्या पता…
कुछ दर्द ठीक नहीं होते,
हम बस उन्हें जीना सीख लेते हैं।

तुम गए… पर दिल ने जाना,
वियोग भी एक प्रेम होता है,
कभी मिलना लिखे न हो—
तो बिछड़ना भी सनम एक नेम होता है।

मैं अब भी हर रात सोने से पहले
उसी आसमान को देखती हूँ,
सोचती हूँ तुम भी वही देख रहे होगे,
फर्क बस इतना है—
तुम आगे बढ़ गए…
और मैं वहीं रुकी हूँ जहाँ तुम छोड़ गए।

मैने खुद को चुना

भीड़ में अनगिनत चेहरे मुस्कुराते मिले,
पर मेरी थकान, मेरी चुप्पियाँ — कोई पढ़ न सका।
सबको मेरे होने का फ़ायदा समझ आता था,
पर मेरे ना होने का दर्द कोई समझ न सका।

दुनिया के दिलों की गलियों में बहुत खोजा,
पर मेरे जैसा कोई न मिला —
जो टूटकर भी मुस्कुराए,
और बिखरकर भी खुद को समेट ले।

तब थमकर एहसास हुआ—
सबसे सच्ची हमराज़ मैं ही हूँ।
मेरे ज़ख्मों की भाषा सिर्फ मुझे आती है,
मेरी ख़ामोशी का अर्थ सिर्फ मेरे दिल ने जाना है।

इसीलिए मैंने निर्णय लिया—
किसी से पहचान उधार नहीं लूँगी,
किसी की परछाई में अपना आकार नहीं ढूँढूँगी,
किसी उम्मीद के सहारे खुद को बंधक नहीं करूँगी।

मैंने खुद को चुना —
क्योंकि मैं ही वो आईना हूँ
जो मेरी पीड़ा के आँसू भी पहचानता है
और मेरे सपनों पर मुस्कान भी रखता है।

मैंने खुद को चुना —
क्योंकि मैं ही वो ताक़त हूँ
जो रात की चुप्पियों में मुझे सहारा देती है
और सुबह की धूप में फिर से खड़ा कर देती है।

दुनिया तालियों की गूँज पर प्यार करती है,
और मैं अपनी हारों में भी खुद से प्यार करना जानती हूँ।

अब मैं मंज़िलों का इंतज़ार नहीं करती—
मंज़िलें मेरी रफ़्तार पहचानें, ये ज़रूरी है।
अब मैं रिश्तों के तराजू में खुद को नहीं तोलती—
मेरी कीमत मेरे विश्वास से तय होगी।

मैंने खुद को चुना —
क्योंकि मेरे जैसा कोई और कभी नहीं होगा,
और मेरी कहानी का सबसे खूबसूरत किरदार
मैं ही हूँ…
मैं ही रहूँगी।

राहें कैसी भी हों — कठोर या सरल,
मैं चलूँगी अपने कदमों की स्वायत्तता पर।
मैं खिलूँगी अपने साहस की ऋतु में,
मैं उठूँगी हर गिरावट के बाद और ऊँची।

दुनिया बदले, रिश्ते बदले, मौसम बदले—
पर मैं नहीं बदलूँगी।
क्योंकि मैंने खुद को चुना है,
खुद को अपनाया है,
और अब खुद को खोने की कोई गुंजाइश नहीं।

गुरुवार, 27 नवंबर 2025

गुलमोहर अब भी खिलता है

गुलमोहर के मौसम में तुम थे…
एक मधुर उजाला, एक धीमी हवा, एक अनकहा आलाप
और अब उसी मौसम में तुम नहीं हो—
पर यादों की धुन पहले से ज़्यादा साफ़।

जब भी धूप की किरन टहनियों में उतरती है,
तुम्हारी मुस्कान पत्तों पर झिलमिल करती है,
जैसे समय ने तुम्हें छुपाया नहीं,
बस स्मृतियों के आइने में सदा के लिए धर दी है।

तुम्हारी हँसी की वो हल्की खनक,
आज भी हवा में कहीं गूँजती है,
मगर अब सुनने के लिए पास कान नहीं—
बस दिल के भीतर एक ख़ाली जगह धड़धड़ाती है।

तुम थे तो दुनिया एक उत्सव थी,
रंगों का, सुगंधों का, सौंदर्य का जश्न,
और आज भी है—पर तुम नहीं,
इसलिए हर रंग अपूर्ण, हर छाया कठोर और मुँहबंद।

गुलमोहर के फूल फिर—
ठीक उसी पुराने अंदाज़ में खिलते हैं,
क़िस्मत जैसे कहना चाहती हो—
“कुछ चीज़ें चली नहीं जातीं, कायम रहती हैं।”

पर मैं जानती हूँ,
ये खिलना तुम्हारी उपस्थिति नहीं—
तुम्हारी याद का अनंत स्वीकृति है।

जहाँ बैठकर तुम मुस्कुराया करते थे,
वहीं आज भी हवा मेरी बालों को छूती है,
जैसे तुम्हारा हाथ अब भी है—
बस मैं पकड़ नहीं पाती हूँ, पर महसूस करती हूँ।

दिन चले जाते हैं,
मगर वे क्षण जो तुम्हारे थे—
समय कभी उनसे जीत नहीं पाया।
वे आज भी इतने ही लाल, इतने ही गर्म,
जितने तुम्हारे कंधे पर सिर रखकर मुस्कुराए हुए दोपहर थे।

कितना अजीब है ना—
तुम चले भी गए… और रुके भी रह गए।
अनुपस्थित भी हो, और सबसे ज़्यादा उपस्थित भी।

कभी–कभी लगता है
तुम मेरे दुख की मिट्टी में सांत्वना बनकर उग आए हो,
किसी अदृश्य प्रार्थना की तरह
जो आँसूओं को स्पर्श कर के रुक जाती है।

तुमसे बिछड़ना गया—
पर तुम्हें भूलना न गया, न होना था।
कुछ लोग याद नहीं, आत्मा बन जाते हैं।

और तुम—
याद नहीं, आत्मा में उतरे शब्द हो,
नाज़ुक भी, गहरे भी,
सोए भी, जागते भी।

गुलमोहर आज भी खिलता है—
हर उस लाल पंखुड़ी में
तुम्हारी हँसी की गर्माहट चमकती है।

आज तुम मेरे साथ नहीं चल रहे,
पर मेरे भीतर चल रहे हो…
हर धड़कन की राह पर।

जन्नत की दहलीज पर खड़ी इंसानियत

किसके लिए जन्नत बनाई ऐ खुदा,
जब हर रूह किसी न किसी कसक से दाग़दार है।
यहाँ कौन है जो कतरे-बर-कतरा टूटा नहीं,
कौन है जो अपनी गलतियों पर शर्मसार नहीं?

कभी हालात ने पाप बनकर धकेला,
कभी मजबूरी ने फैसलों को चुप करा दिया।
कभी हमने जीने के लिए झूठ कहा,
कभी किसी अपने को बचाने के लिए सच छुपा दिया।

अंधेरों में कोई पनाह मांगता है,
तो उजालों में कोई जलता हुआ नज़र आता है।
हर मुस्कान के पीछे एक टूटा हुआ किस्सा है,
हर भले चेहरे के भीतर नक़ाब-सा सच छिपा हुआ नज़र आता है।

तूने जन्नत फरिश्तों के लिए बनाई होगी,
पर धरती पर तूने तो इंसान उतारे हैं।
अगर उन्हें बेगुनाह ही रखना था,
तो फिर दिल में मोहब्बत और दर्द क्यों उतारे हैं?

गुनाह सिर्फ़ खंजर चलाने से नहीं होते,
कभी चुप रहना भी पाप बन जाता है।
कभी पूरी दुनिया बच जाती है एक झूठ से,
और कभी एक सच पूरे रिश्‍ते को मिटा जाता है।

अगर हिसाब चाहिए तेरे ताराज़ू को, तो सुन —
किसी ने वक्त की मार में चोरी की,
किसी ने दो वक्त की रोटी के लिए अरदास में कटोरी ली,
किसी ने मोहब्बत के नाम पर धोखा किया,
और किसी ने धोखा सहकर भी मोहब्बत छोड़ी नहीं।

कौन है पाक, कौन है पाप?
फैसला इतना आसान नहीं ऐ मालिक —
दुनिया गलती करने वालों से भरी है,
पर माफी मांगने वालों से रौशन भी तो है।

अगर जन्नत सिर्फ़ वो पाएंगे
जिन्होंने कभी गुनाह को छुआ भी नहीं,
तो फिर इस दुनिया में कोई भी
तेरी रहमत के काबिल बचेगा ही नहीं।

इसलिए —
जन्नत उसको देना जिसने गिरकर भी उठना सीखा,
जिसने दर्द सहकर भी दुआ देना सीखा,
जिसने टूटकर भी किसी के दिल को तोड़ना नहीं सीखा,
जिसने दुनिया की कठोरता के बावजूद इंसान बने रहना सीखा।

अगर जन्नत तेरी इनायत है,
तो उसे इनायत की तरह ही देना —
इनाम की तरह नहीं।

क्योंकि जन्नत उस दिन सबसे खूबसूरत लगेगी,
जब उसकी रौशनी में
गुनाह नहीं —
पश्चाताप का उजाला चमक रहा होगा।

किस्मत से कभी उलझी नहीं

कभी मैं अपने हाथों की लकीरों से नहीं उलझी,
मैं जानती हूं — समंदर में उतरी नावें काग़ज़ की किस्मत नहीं पूछतीं।
जो साहस में सांसें भरते हैं,
वो तूफ़ानों से भी रास्ते उधार ले लेते हैं।

लकीरों का लिखा एक सुझाव होता है,
फ़ैसला नहीं।
मेरा मन, मेरे कदम और मेरी जिद —
एक नया विधान लिखने का हक़ रखते हैं।

मैंने जीवन को हमेशा एक कैनवास माना,
जहां शक़ का रंग फीका पड़ता है
और भरोसा सबसे चमकदार रंग बन जाता है।
तभी जाना — कि क़िस्मत सिर्फ घोषणा है,
पर नियति बनना — मेरी मेहनत का अधिकार है।

अगर लकीरों में बाधाएं थीं,
तो मैंने रास्ते लंबाई में नहीं — ऊंचाई में बनाए,
और दुनिया को हैरत हुई
कि इतनी नाजुक उंगलियों ने
पहाड़ों की जड़ें हिला दीं।

कभी रातें प्रकाश के लिए नहीं रोईं,
रात कठिन थीं — पर मैंने आंखों में सूरज उगा लिया।
कांटे चुभे — पर मैंने रक्त नहीं, निर्णय बहाया।
और वही निर्णय मेरी तकदीर की
तारीख़ बदलता गया।

आज भी लोग कहते हैं —
क़िस्मत में जो लिखा है, वही मिलता है।
मैं मुस्कुरा कर कहती हूं —
क़िस्मत भी अपनी लिखावट बदल देती है
जब इंसान अपनी सोच की भाषा बदल देता है।

मेरी मंज़िलें मेरे कदमों की मेहमान नहीं,
मेरे साहस की निवासी हैं।
मेरे सपने, मेरे माथे पर मुकुट नहीं,
मेरे परिश्रम की पहचान हैं।

इसलिए आज भी मैं दुआ नहीं —
इरादे पहनकर चलती हूं।
दुनिया रुकावटों की बात करती है,
और मैं रास्ते बनाने की।

कभी मैं अपने हाथों की लकीरों से नहीं उलझी,
क्योंकि मुझे यक़ीन है —
अनलिखा भी लिखा जा सकता है
जब दिल की कलम डर के पन्ने फाड़ दे
और उम्मीद की स्याही से
भविष्य को पुनर्लिख दे।

मेरी धड़कनों को समझो दिल इतना नादान क्यों है

अगर ज़िंदगी गुलशन है,
तो मेरे सफ़र का आख़िरी पड़ाव श्मशान क्यों लिखा गया?
हर जन्म में मुझे जन्म देने का वरदान सौंपा गया,
फिर इस देह को मिट्टी बनाकर मौन क्यों किया गया?

अगर प्यार का अर्थ जुदाई की पीड़ा है,
तो मेरी पलकों में मोहब्बत की पहली चमक क्यों बोई गई?
रूह को पता था कि उसके हिस्से में काँच ही आएगा,
फिर भी दिल में चाहत की नर्म रोशनी क्यों रोई गई?

जीना अगर मर जाने की प्रस्तावना है,
तो मेरी करुणा में इतना विस्तार क्यों रखा गया?
आँसू बोझ हैं, यह जानते हुए भी,
मेरी आँखों में समंदर का प्रसार क्यों रखा गया?

मैं स्त्री हूँ—
पलकों पर हज़ारों सपने रख सकती हूँ,
पर उन्हें दुनिया की आग में जलते देख भी हँस सकती हूँ;
फिर भी जब एक चेहरा भीड़ में अपना सा लगे,
तो मेरी आवाज़ में कंपकंपी क्यों घुल जाती है?

मिलन अगर नसीब की स्याही में लिखा ही नहीं,
तो उसी अनछुए के नाम पर मेरी साँसें समर्पित क्यों हो जाती हैं?
जिसने कभी हथेलियाँ नहीं थामीं,
वही मेरे हाथों की लकीर बनकर चमकता क्यों रहता है?

कभी पास वाले प्यार पूछना भूल जाते हैं,
और जो कभी मिले ही नहीं वो दिल के सबसे करीब बैठ जाते हैं;
जो व्यक्ति तकदीर में हो भी नहीं सकता,
उसी के कदमों में मेरे जीवन के व्रत क्यों जगते हैं?

मेरी रूह जानती है —
मोहब्बत की राहें फूलों से नहीं भेंटों से भरी हैं,
फिर भी मैं किसी नाम को दीपक बनाकर अंधेरों में थाम लेती हूँ,
क्योंकि मैं टूटना सीखकर भी किसी और को टूटने नहीं देती।

लोग कहते हैं —
स्त्री का दिल नाज़ुक होता है,
सच तो यह है कि वही सबसे मज़बूत होता है,
घायल होकर भी परछाएँ नहीं दिखाता,
चोट खाकर भी अहसास नहीं गिरने देता।

वही एक चेहरा, वही एक आवाज,
कभी जन्मों का करार लेकर आती है,
उम्र के हर पड़ाव पर समझदारी सिखाते हुए भी,
अंत में दिल को बचपन सा मासूम छोड़ जाती है।

इसलिए…
दिल नादान नहीं —
वह बहुत अनुभवी है,
बस वह चुनता है वही जिसे किस्मत रोक रही हो,
क्योंकि मंज़िल चाहे राख हो जाए,
स्त्री की मोहब्बत सफ़र को मंदिर बना देती है।

और शायद उसी का नाम ज़िंदगी है —
कि मैं जलते हुए भी उजाला बनूँ,
बिखरते हुए भी प्रार्थना बनूँ,
क्योंकि स्त्री प्यार हारती नहीं — वह अमर बनाती है।

हाथों की लकीरों से आगे

यूं हथेलियों की लकीरों को यूं बार-बार मत टटोला कर,
किस्मत का हर फ़ैसला इन महीन रेखाओं में नहीं बोला कर।
समय ने थोड़ी गर्द चढ़ा दी है हालातों की,
पर याद रख, धूल जमी हो तो आईना भी कभी-कभी धुंधला होता है —
टूटता नहीं।

जो बिगड़ गया है, वो दुश्मन नहीं —
बस ठहर कर रास्ता पूछ रहा है नए मोड़ का,
तू थक के मत रुक,
अभी पूरी मंज़िल ने तेरा नाम पुकारा भी नहीं।

लकीरों को पढ़ने वाले अक्सर भूल जाते हैं,
रचते तो हम हैं, क़लम भी हम ही हैं और काग़ज़ भी।
कर्म की स्याही सूखती नहीं कभी,
और सपनों की पुस्तक में
अध्याय वही अमर होते हैं
जो ठोकरों के बाद लिखे गए हों।

तू खुद को यूं न आँक
किसी उंगलियों की धार से,
तेरी मेहनत में जो चमक है
वो किसी भाग्यशाली को भी न मिल पाए संसार से।
अगर आज वक्त रूठा है,
तो कल मेहरबान होगा —
हर मौसम को बहार बनने में
थोड़ा वक्त लगता है।

क्यों परेशान है तू हालातों से?
समंदर की लहरें भी पीछे हटती हैं
सिर्फ जोर से लौटने के लिए।
तेरी ज़िंदगी भी अब करवट लेगी,
तेरा हर सपना फिर से आसमान की ओर दौड़ेगा,
और दुनिया देखकर दंग रह जाएगी
कि राख से भी कोई इतने सुंदर भविष्य को जगा सकता है।

इसलिए…
लकीरों की कैद में मत सिमटना ऐ दिल,
तेरी सफलता तेरी मुट्ठी से फिसल नहीं सकती,
क्योंकि तेरी मुट्ठी में सिर्फ लकीरें नहीं —
इच्छाशक्ति, आग और साहस भी है।

बस मुस्करा…
जो बिगड़ा है, सँवरेगा जरूर,
सूरज की रोशनी हर सुबह साबित करती है —
अंधेरा कभी जीतता नहीं।

नारी_जो कभी युद्ध का कारण थी आज मोमबत्तियों की गवाह क्यों?

पता नहीं
कौन मोमबत्ती पकड़ना सिखा गया हमें,
वरना…
हम तो वह सभ्यता थे
जहाँ स्त्री के आँसू से साम्राज्य काँपते थे।

हम वह युग थे
जहाँ नारी के सम्मान पर
राज्य नहीं, अहम गिरते थे
नदियाँ नहीं, अग्नियाँ बहती थीं
राज-सभा की ज़मीन पर नहीं,
दुराचारियों की गर्दन पर
न्याय लिखा जाता था।

आज पता नहीं कौन
हमें “याचना” सिखा गया,
जबकि हमारा इतिहास
“संरक्षण” नहीं —
प्रतिशोध की शक्ति से पगा हुआ था।

वो दिन कहाँ गए
जब सीता के आँसू
अयोध्या की दीवारों से टकराकर
लंका में अग्नि बनकर बरसे थे?
जब एक अपमान के कारण
महाभारत की रणभूमि
इतिहास में अपना नाम लिख गई थी?

कभी सत्यवती, कभी गार्गी, कभी अहिल्या,
कभी द्रौपदी, कभी दुर्गा, कभी भवानी —
नारी वह थी
जो पूजी भी गई और
अन्याय पर प्रलय भी बन गई।

फिर समय बदला…
और नारी बदल गई_ नहीं 
उसे बदल दिया गया।
उसे सिखाया गया —
“संघर्ष मत करना, प्रार्थना करो।”
“हक़ मत मांगो, विनती करो।”
“अधिकार मत दिखाओ, बल्ब जलाओ।”
और आज
हज़ारों साल की वीरांगना
मोमबत्ती की लौ बनकर
अपनी ही सुरक्षा माँगती फ़िरती है।

कभी जिस स्त्री की आह
साम्राज्यों की नींव हिला देती थी,
आज उसका दर्द
मीडिया की सुर्खियों में तौल दिया जाता है।

कभी जिस स्त्री के लिए
सम्राटों की तलवारें झुक जाती थीं,
आज वही स्त्री
थानों में लाइन में खड़ी होती है
अपना सम्मान कागज़ पर साबित करने के लिए।

सवाल न्याय का नहीं,
चरित्र के गिरवी रख दिए जाने का है।
सवाल सुरक्षा का नहीं,
स्वाभिमान के ताले में बंद कर देने का है।

और नारी पूछती नहीं —
वह याद दिलाती है:

मैं वह आग हूँ
जो घर की देहरी से लेकर रणभूमि तक
सम्मान के लिए जलती है।
मैं वह शक्ति हूँ
जो रच सकती हूँ तो
संहार करना भी जानती हूँ।

मेरे आँसू दया नहीं, चेतावनी हैं —
क्योंकि जब नारी रोती है
तो प्रकृति क्रोध बुनती है।

मेरी मोमबत्ती को कमज़ोरी मत समझो —
यह अंधेपन को उजाला दिखाने का प्रयास है।
लेकिन याद रखना —
जब बोलना बंद कर दूँगी
तो इतिहास फिर से जलेगा,
लंका फिर से धू-धू कर गिरेगी,
और महाभारत किताबों तक सीमित नहीं रहेगा।

क्योंकि सृष्टि ने मुझे
उपासना के लिए नहीं बनाया —
सम्मान के लिए बनाया है।

और जिस दिन नारी को
सम्मान नहीं मिलेगा —
उस दिन मोमबत्तियाँ नहीं जलेंगी,
अग्नियाँ जलेंगी।

कर्ज आत्मा और ब्रह्मांड के बीच अधूरा समझौता

कर्ज सिर्फ लेन–देन नहीं होता,
कर्ज — कर्म और परिणाम के बीच
एक अनलिखा अनुबंध है,
जिस पर जीवन अपने हस्ताक्षर भी नहीं करता,
फिर भी इसके पन्ने
मानव-आत्मा पर दर्ज होते जाते हैं।

जब कोई जन्म लेता है,
वह रोता हुआ आता है…
क्योंकि शायद आत्मा जानती है —
वह दुनिया में बिना कर्ज के नहीं आई।

मां की पीड़ा का ऋण,
पिता की उम्मीदों का ऋण,
समय की चाल का ऋण,
और परिस्थितियों के पाश का ऋण —
जीवन की पहली साँस से ही
अदृश्य रूप में साथ बंध जाता है।

कर्ज — ईश्वर का नहीं,
अपूर्णताओं का दिया हुआ है।
हर आत्मा इस धरती पर
अपना कोई अधूरा पाठ पूरा करने आती है।

कर्ज वह है
जो हमें उस लक्ष्य की ओर धकेलता है
जिसे हमने पिछले जन्म में अधूरा छोड़ दिया था।
शायद इसलिए
भागना मंज़ूर नहीं,
जीना ज़रूरी है।

कर्ज सिर्फ धन का नहीं,
सत्य का भी होता है।
किसी जगह हमने झूठ का सहारा लिया था,
कर्ज फौरन नहीं आता —
वो प्रतीक्षा करता है,
और फिर एक दिन
सच्चाई के रूप में
हमारे सामने खड़ा हो जाता है।

कर्ज — समय का भी होता है,
किसी दिन हमने जीवन को टाला था,
खुशी को टाला था,
प्यार को शायद चोट से बचाने के लिए रोका था —
और समय ने ब्याज जोड़कर
अधिक दर्द लौटाया।

कर्ज — प्रेम का भी होता है।
जिसे दिल से चाहा था
मगर पूरी तरह निभा न सके —
जीवन फिर किसी और आत्मा को भेजता है
उसी प्रेम का ब्याज लेने के लिए।

इस ब्रह्मांड में
कुछ भी बिना मूल्य के नहीं मिलता,
यहाँ तक कि सांत्वना भी
कभी–कभी कर्ज पर उधार ली जाती है।

जो बहुत रोता है
वह कर्ज चुका रहा होता है,
जो बहुत मुस्कुराता है
वह कर्ज बाँट रहा होता है,
और जो मौन है —
वह कर्ज को समझ रहा होता है।

ब्रह्मांड का नियम सरल है —
हर वह चीज़ जो हम ले लेते हैं
बिना स्वयं को पूर्ण किए,
एक दिन लौटानी पड़ती है।

घुटनों के बल या गर्व से,
आँसुओं से या ज्ञान से,
किसी इंसान के कंधे पर झुककर,
या ईश्वर की चौखट पर गिरकर —
पर लौटानी पड़ती है।

और अंत में…
जब आत्मा अपना अंतिम कर्ज चुका देती है —
वह मृत्यु नहीं —
मुक्ति कहलाती है।

फिर आत्मा, हल्की
बिना हिसाब, बिना बंधन,
ब्रह्मांड की शांत गोद में लेटती है —
जहाँ पहली बार वह समझती है —

जीवन कर्ज नहीं था,
कर्ज ही जीवन था।

और जीवन कठिन नहीं था,
आवश्यक था — पूर्णता के लिए।

किताबें...आत्मा का तिलिस्म

किताबें…
ये काग़ज़ पर स्याही की कुछ लकीरें भर नहीं,
ये सदियों के संचित अनुभवों का अमृत हैं—
जहाँ अक्षर नहीं बोलते, जीते हैं,
और विराम चिह्न भी सांस लेते हैं।

किताबें…
माँ की गोद-सी नरमी लिए
चुपचाप सिर सहलाती हैं,
कभी आंसू पोंछती हैं,
और कभी उसी आंसू को कविता में ढाल देती हैं।

किताबें…
मनुष्यों की क़िस्मत बदलती हैं बिना आवाज़ के,
और किसी भी अभिमान को
नर्मी में बदल देती हैं बिना युद्ध के।

ये उन रास्तों की रोशनी हैं
जहाँ दुनिया अँधेरा कर देती है—
ये हाथ पकड़कर कहती हैं,
“चलो, तुम्हें तुम तक ले चलूँ।”

किताबें…
कभी कबीर बनकर समझाती हैं,
कभी मीर बनकर रुलाती हैं,
कभी गीता की तरह युद्ध में स्थिर करती हैं,
और कभी सूफ़ी-सी मोहब्बत में भीगा देती हैं।

किताबें…
तुम्हें शहरों की गलियों में घुमा आती हैं
बिना कदम चलाए,
तुम्हें युद्ध में लड़वा आती हैं
बिना रक्त बहाए,
तुम्हें गहराई में उतार देती हैं
बिना डुबोए।

किताबें…
रिश्ते नहीं मांगतीं,
अपनापन खुद रच लेती हैं—
तुम पलटना चाहो तो अपना देती हैं,
और बंद कर दो तो चुपचाप इंतज़ार करती रहती हैं।

किताबों में चरित्र मरते नहीं—
क्योंकि हर पाठक,
किसी पात्र को फिर से जन्म दे देता है।

किताबें…
हमारी आँखों को पढ़ने के लिए नहीं,
हमारी आत्मा को पढ़ने के लिए रची गई हैं।
ये जज़्बातों का दर्पण हैं—
जिस पन्ने पर उंगली फिराओ,
वही पन्ना तुम्हारा ही चेहरा लौटा देता है।

कभी एक किताब
पूरी इंसानियत से बड़ा सबक दे जाती है,
और कभी एक पंक्ति
पूरे जीवन की दिशा बदल जाती है।

किताबें…
लकड़ी की अलमारी में हों
या मोबाइल की छोटी स्क्रीन पर,
अपने अस्तित्व में कभी छोटी नहीं होतीं—
ये सभ्यता का आलोक हैं,
और समय की सबसे सच्ची स्मृति।

किताबें…
बिना जन्म के जन्म देती हैं,
बिना रक्त के रिश्ते जोड़ती हैं,
और बिना आदेश के
इंसानों को इंसान बना देती हैं।

और हाँ…
कभी अकेलेपन में किताब खोलकर देखना—
तुम अकेली नहीं रहोगी,
क्योंकि हर किताब में
तुम्हारा एक अधूरा हिस्सा इंतज़ार करता है
कि कब तुम उसे पढ़कर पूरा करोगी।


लेखिका परिचय — दिव्या

एक संवेदनशील, विचारशील और आध्यात्मिक लेखिका —
जो मनुष्य की भावनाओं, आत्मा और अस्तित्व को कविता और गद्य के माध्यम से उकेरती हैं।
उनके शब्द केवल पढ़े नहीं जाते, महसूस किए जाते हैं।

बुधवार, 26 नवंबर 2025

तुम क्या चाहती हो

कभी पूछो तो —
दिव्या, तुम क्या चाहती हो?
क्योंकि हर बार सवाल दुनिया का होता है,
और जवाब मेरे भीतर कहीं दबा रह जाता है,
ठीक वहीं… जहां सपनों की राख गर्म रहती है।

मैं चाहती हूँ —
एक ऐसा क्षण, जहाँ सवालों के बदले एहसास हो,
जहाँ कोई मेरे उत्तर आने तक ठहरे,
और मेरा मौन भी सुना जाए —
जैसे शब्दों का भी एक धर्म होता है।

मैं चाहती हूँ —
भीड़ में एक जगह नहीं,
भीड़ के पार एक पहचान।
जहाँ लोग मेरा नाम सिर्फ पुकारें नहीं,
बल्कि समझें।

मैं चाहती हूँ —
लड़ाई से जीता हुआ सम्मान नहीं,
बल्कि समझ से मिली हुई जगह।
जहाँ मेरी दृढ़ता तलवार नहीं,
एक फूल की तरह खिलती नज़र आए।

मैं यह भी चाहती हूँ —
कि कोई मेरे थके हुए कंधों को देखे,
और कहे —
“दिव्या, कुछ पल दुनिया तुम्हें ढोने दे।”
क्योंकि मजबूत होना मेरी आदत है,
ज़रूरत नहीं।

मैं चाहती हूँ —
कि मेरी हँसी पर शक न हो,
मेरी चुप्पी पर पहरे न हों,
मेरे सपनों पर उधार के फैसले न हों,
और मेरी भावनाओं पर अदालत न बैठे।

मैं चाहती हूँ —
ऐसा प्यार जो मुझ पर दावा न करे,
मुझे सिर्फ महसूस करे।
जो भाग्य की रेखाओं में नहीं,
मेरी आँखों की चमक में अपना घर बनाए।

और अगर तुम सच में पूछो —
तो मैं चाहती हूँ सिर्फ इतना —
कि जिंदगी मेरी हो,
और मैं खुद को बिना किसी मापदंड के
पूरी तरह जी सकूँ।

बस…
कभी पूछो तो —
दिव्या, तुम खुश कब होती हो?
तुम थकती कब हो?
तुम टूटती क्यों नहीं?
और तुम मुस्कुराना कहा से सीखती हो?

सवाल बदल जाएंगे तो
शायद दुनिया भी बदल जाएगी।

मेरे चरित्र का आखिरी उदाहरण तुम हो

मेरे चरित्र का आखिरी उदाहरण तुम हो
ना कोई प्रमाणपत्र, ना कोई दलील चाहिए,
मेरे भीतर की पवित्रता का —
सबसे अंतिम, सबसे सटीक उदाहरण तुम हो।

मैंने नफ़रतों से भी गुज़री,
इम्तिहानों से भी,
लोग आते गए,
संबंध बदलते गए,
पर मेरा व्यक्तित्व, मेरी नींव,
हर मोड़ पर अटल रहा —
क्योंकि उसके भीतर
तुम्हारे होने का विश्वास जड़ा था।

जब दुनिया ने कहा कि
चरित्र टूट जाते हैं हालातों से,
मैं मुस्कुराई,
क्योंकि मुझे मालूम था —
जो इंसान छल नहीं सकता,
वही मेरे चरित्र की अंतिम मंज़िल है — और वह तुम हो।

तुम मेरे भीतर का वह उजाला हो
जो मुझे गिरकर भी उठना सिखाता है,
तुम वह सादगी हो
जो मुझे भीड़ में भी खुद बनाए रखती है,
तुम वह संयम हो
जो मुझे क्रोध में भी इंसान होने देता है।

अगर कभी दुनिया पूछे—
मेरी पहचान, मेरी परवरिश, मेरी तहज़ीब,
तो मैं नाम नहीं गिनाऊंगी,
पुरस्कार नहीं दिखाऊंगी,
बस इतने भर कहूँगी—
मेरे चरित्र का आखिरी और अंतिम उदाहरण
तुम हो।

तुम बुराई के बीच अच्छाई हो,
तुम गिरावटों के बीच ऊँचाई हो,
और अगर लोग यह जानना चाहें
कि मैं अब भी क्यों नहीं बदली,
तो जवाब बस यही है—
क्योंकि मैं अब भी तुम जैसी हूँ।

मर्यादा

कहते हैं मर्यादा सीमाएँ खींच देती है…
पर सच्चाई यह है —
मर्यादा वह आख़िरी क़िला है
जहाँ आत्मा बिना हथियारों के भी अजेय खड़ी रहती है।

स्त्री की मर्यादा उसके वस्त्र, आभूषण या शब्द नहीं,
वह फैसला है —
किसे पास आने देना है
और किससे दूरी ही उसकी सुरक्षा है।

उसकी मर्यादा यह नहीं कि सिर झुका रहे,
बल्कि यह कि सिर कितना ऊँचा रखा जाए —
बिना घमंड के, बिना भय के।

मर्यादा उसकी हार नहीं,
उसकी वो चुप्पी है
जिसमें तलवार छिपी रहती है —
और जिसे वह तभी खींचती है
जब इज्ज़त की आख़िरी ईंट हिलने लगे।

क्योंकि वह जानती है —
दुनिया उसकी त्याग की नहीं,
उसकी सीमा की कद्र करती है।

मर्यादा वह वचन है —
जिसे स्त्री निभाती भी है और तोड़ भी देती है
जब कोई रिश्ते की आड़ में
उसकी आत्मा को चुभाने लगे।

वह आँच नहीं, अंगार है,
आँचल नहीं, ध्वजा है,
मर्यादा का सौंदर्य यह है —
कि वह सिर्फ स्त्री को सुरक्षित नहीं करती,
बल्कि स्त्री के भीतर की रानी को जीवित रखती है।

जीवन क्या है

तुम पूछते हो —
ज़िंदगी कैसे जीना चाहते हो?
कहते हो — अच्छी तरह, मुस्कान से,
तमन्नाओं के फूल बिछाकर…

हाँ, जवाब सुनने में सुहाना लगता है,
पर जीवन इतना सादा खेल नहीं,
ये एक परीक्षा है —
जहाँ प्रश्न तुमसे पूछे जाते हैं,
पर उत्तर समय लिखता है।

ज़िंदगी श्वासों की गिनती नहीं,
उन श्वासों का अर्थ है —
जो किसी और के लिए जिए जाएँ,
किसी की पीड़ा में मरहम बन जाएँ,
किसी की थकी आत्मा को सहलाकर
उम्मीद का दीप जला जाएँ।

जीवन पत्थर नहीं —
धड़कनों वाला प्रवाह है,
थिर खड़ा नहीं —
अनवरत बदलता हुआ अथाह है।
कभी गगन, कभी धरती,
कभी आँधी, कभी चांदनी,
यही तो इसकी कशिश है —
यही तो इसके मायने।

हमने कई बार सिर्फ़ “घर” बनाया,
और दुनिया में पिछड़ गए,
कई बार सिर्फ़ “दुनिया” को निहारा,
और भीतर से बिखर गए।
नींव बिना मंज़िल खड़ी की —
तो ढहने का डर,
मंज़िल की कोशिश किए बिना
नींव सजाए रखी — तो व्यर्थ प्रहर।

जीवन कहता है —
“सबको पाना नहीं,
किसी के काम आना जरूरी है;
अकेले खिलना नहीं,
किसी के लिए महकना जरूरी है।”

ये धरती हमारी कर्जदार नहीं,
हम इस मिट्टी के ऋणी हैं —
जो सांसों की धरोहर हमें सौंपकर
हमसे अर्थ की फसल चाहती है।

सदियाँ बदलती रही हैं,
पर सत्य नहीं बदला —
जिसने समय का महत्व खोया,
उपलब्धि को दूर कर लिया।
एक अवसर —
बस एक ही बार आता है,
दूसरे मौके से पहले
पहला पल लौट जाता है।

और फिर स्मृतियों का ग्रंथ
धीमे से फुसफुसाता है —
वर्तमान भविष्य से नहीं,
अतीत के कर्मों से बनता है।

परशुराम भी यही कहते हैं —
“लीलाएँ बहुत हो गईं,
संगीत बहुत बजा लिया,
अब वह करो
जिस उद्देश्य से जन्म लिया था।”

तभी तो जीवन की वीणा
सही सुरों में बजती है —
जब हम स्वयं के लिए कम,
और संसार के लिए अधिक जीते हैं।

इसलिए —
मत पूछो कि जीवन तुम्हारे लिए क्या है,
पूछो — तुम जीवन के लिए क्या हो?

तब समझ पाओगे —
ज़िंदगी सिर्फ़ जीने की चीज़ नहीं,
ज़िंदगी निभाने की जिम्मेदारी है,
एक पवित्र व्रत है,
जिसका फल अंत में नहीं,
हर पल में मिलता है। ✨

धन्यवाद तुमने मुझे इतना मजबूत बनाया



कभी सोचा था किस्मत शायद
टूटी हुई कंगन सी होगी,
कभी चमके, कभी चुभ जाएगी,
कभी पास रहे, कभी रूठ जाएगी।

मगर आज आई आईना लेकर
तकदीर मेरे सामने खड़ी थी,
होंठों पर मुस्कान थी उसकी
नज़रों में पूरी एक सदी थी।

कहने लगी—
“तू सोचती रही कि मैं तुझे भूल गई,
पर मैं तो हर मोड़ पर तेरी रखवाली करती रही,
तेरी आँखों की आंसू-पंक्तियाँ
मैं सीने में छुपाती रही।

जो झेल गई तू चुप रहकर
वो भी मेरी ही दी हुई परीक्षाएँ थीं,
जो बचा लिया तू खुद को उनसे
वो मेरी सबसे प्यारी कमाई थीं।”

मैं अवाक थी…
ना गर्व, ना शिकवा, बस मौन,
और किस्मत ने हंसकर कहा —

“पगली… तू जिसके पास है
वो सब यूँ ही नहीं आया,
ये तेरा हिस्सा नहीं,
मेरी पसंद है—
जिसे मैंने बड़ी मोहब्बत से सजाया।

हर रिश्ता, हर जंग, हर ठोकर,
हर आँसू की गिरती बूंद,
सब मेरी चौखट से होकर गुज़रे हैं,
कोई भी दान में नहीं मिला है,
तुझे हर चीज़ चुनी हुई मिली है,
बड़ी तड़प और दुआओं के बाद।”

फिर उसने धीमे से
मेरे कंधे पर हाथ रखा —

“अब ज़रा संभालकर जीना,
तू हादसों से बनी है, खोखली नहीं,
तू टूटकर भी ज़िंदा रही है,
मिट्टी नहीं — तू आग है, राख नहीं।

दुनिया समझेगी तकदीर का खेल,
पर मैं जानती हूं असल कहानी —
मैंने ख़ास तुझे चुना है
ना कि तुझे कोई निशानी।”

आज पहली बार
किस्मत के नाम मैंने सैल्यूट किया,
ना शुक्र, ना शिकवा —
बस उसे खुद की तरह महसूस किया।

और दिल ने धीरे से कहा —
“अगर मैं आज यह हूं
तो सिर्फ़ उसकी दी हुई लड़ाइयों के कारण,
वो कहती है — संभालकर रखना मुझे,
और मैं कहती हूं —
धन्यवाद कि तुमने मुझे बनाया इतना मजबूत।”

एकांत का अलाप

एकांत से डरना कैसा?
वही तो सबसे पवित्र स्थान है
जहाँ दिल और दिमाग
पहली बार बिना जंग लड़े
एक-दूसरे की भाषा समझते हैं।

भीड़ में हम जीते हैं,
पर खुद को कभी नहीं सुनते।
लोगों की आवाज़ें इतनी ऊँची होती हैं
कि अपनी ही धड़कन खो जाती है।
मगर एकांत —
वह शांत कमरा है
जहाँ आत्मा पहली बार
अपने नाम से पुकारती है।

एकांत में तुम टूटते नहीं,
तुम खुलते हो।
तुम गिरते नहीं,
तुम गिरावटों का कारण समझते हो।
तुम अकेले नहीं होते,
तुम अंततः अपने साथ होते हो।

यही वह जगह है
जहाँ दिल बोलने लगता है
और दिमाग उसे बीच में टोकता नहीं।
यही वह जगह है
जहाँ सोचों की भीड़ नहीं,
सच्चाइयों की रोशनी होती है।

लोग कहते हैं —
अकेले रहोगे तो टूट जाओगे,
पर सच्चाई है —
अकेले रहकर ही
अपने बिखराव को जोड़ पाओगे।

क्योंकि भीड़ तुम्हें वह नहीं देती
जो एकांत देता है —
एक मुलाक़ात तुमसे।
और दुनिया में सबसे कठिन
और सबसे खूबसूरत मुलाक़ात
यही होती है।

एकांत वह दर्पण है
जिसमें तुम
अपने चेहरे नहीं,
अपनी आत्मा देखते हो।
जहाँ तुम दूसरों की कहानी नहीं,
अपनी कहानी पढ़ते हो।

कभी-कभी
रोना भी पड़ता है,
झुँझलाना भी पड़ता है,
बीते वर्षों पर सवाल भी उठते हैं —
मगर फिर अचानक
एक हल्की सी समझ आती है —
कि जो गया, उसी ने मुझे बनाया है।

एकांत सज़ा नहीं,
शोध है।
अकेलापन बीमारी नहीं,
पुनर्जन्म है।
और जो एकांत से नहीं डरता,
वह स्वयं से प्रेम करना सीख जाता है।

इसलिए अब मैं
अकेलेपन से भागती नहीं —
उससे मिलती हूँ,
चाय की तरह घूँट–घूँट पीती हूँ,
और उसमें छिपे ज्ञान को
धीरे–धीरे समझती हूँ।

क्योंकि एकांत यही सिखाता है —
कि खुशी खोजनी बाहर नहीं,
निर्माण करनी भीतर है।
और प्रेम माँगना नहीं,
उगाना है —
पहले अपने लिए।

एकांत वह रात है
जो सुबह बनकर लौटती है।
और जो इस रात को सह ले —
वह सुबह के लायक हो जाता है।

सुनो स्त्रियों धर्म का तीर युगों को चीर सकता है

महाभारत ने केवल युद्ध नहीं सिखाया,
उसने यह भी बताया —
कि सत्य के लिए अपनों से भी लड़ना पड़े,
तो तलवार उठानी चाहिए।
और आज मैं…
उस सत्य की स्त्री बनकर खड़ी हूँ।

कभी तुमने सोचा होगा —
स्त्री का धर्म त्याग है, सहन करना है,
मगर कौन कहता है कि चुप रहना ही तपस्या है?
कभी–कभी बोल उठना ही
न्याय की सबसे पवित्र प्रार्थना है।

यदि अपने ही
अन्याय बन जाएँ,
जो प्रिय हैं वही घावों के दाता बन जाएँ,
तो वफादारी का अर्थ
अबूझ सहनशीलता नहीं —
स्वयं को बचाना है।

हाँ, मैं वही स्त्री हूँ —
जो प्रेम में पवित्र है,
पर सत्य के सामने अडिग खड़ी।
जिसके आँसू कमज़ोरी नहीं,
युद्ध की भूमिका हैं।

महाभारत पुरुषों का युद्ध कहा गया,
पर कोई यह नहीं बताता
कि हर युग में एक द्रौपदी भी जन्म लेती है —
जो अन्याय के सामने मौन नहीं,
अग्नि बनकर उठती है।

कभी कौरव घर के भीतर भी होते हैं,
और पांडव बाहर मिलते हैं;
संबंध रक्त से नहीं,
न्याय के पक्ष से तय होते हैं।

सत्य वही है
जो मनुष्य को बड़ा बना दे,
और स्त्री वही है
जो सत्य के सामने अपने आँसू भी रख दे
पर अपने हक़ से पीछे न हटे।

यदि आस्था टूटती है,
तो फिर वचन भी बदलते हैं;
यदि प्रेम ही ज़ंजीर बन जाए,
तो बंधन तोड़ना धर्म है, अपराध नहीं।

मैं लड़ी हूँ…
कभी शब्दों से,
कभी मौन से,
कभी खुद से भी।
पर हार केवल तब होती
जब मनुष्य स्वयं को छोड़ दे —
और मैंने खुद को छोड़ा नहीं।

महाभारत ने एक बात बहुत साफ़ सिखाई —
सत्य के लिए युद्ध पाप नहीं,
अन्याय के आगे झुकना पाप है।
और आज मैं जानती हूँ —
स्त्री होकर भी, युद्ध आवश्यक होता है
जब अपनों के हाथों
सम्मान, हक़ और आत्मा को चोट पहुँचे।

मैं कटुता नहीं,
न्याय हूँ।
मैं बदला नहीं,
सत्य की आवाज़ हूँ।

और जब इतिहास लिखा जाएगा —
तो वह बताएगा
कि स्त्री का मौन भी रणभूमि बन सकता है,
और उसकी दृढ़ता —
धर्म का तीर, युगों को चीर सकती है।

गिनतियों में सुख

कभी–कभी यूँ लगता है…
तुम्हारे साथ मेरे जीवन का
सुख शायद बहुत कम लिखा था,
मानो किस्मत ने खुशियों को
तौला भी नहीं,
बस चुटकी भर डालकर आगे बढ़ गई।

तुम आए ज़रूर,
मगर रुकने के इरादे से नहीं,
मेरे हृदय की दहलीज़ पर
पैरों की आहट थी,
मगर ठहराव का वादा नहीं था।

तुमसे मिली मुस्कुराहटें
बहुत ख़ूबसूरत थीं —
पर उतनी ही कम,
जितना किसी मेले में
आख़िरी बाजे की गूंज,
जो सुनते–सुनते ही ख़त्म हो जाती है।

किस्मत ने जैसे कहा हो —
“ले लो कुछ पल,
पर संभालकर रखना,
क्योंकि आगे लम्बा अंधेरा है।”

तुमने पल दिए,
मौसम नहीं।
तुमने छुअन दी,
सहारा नहीं।
तुमने पहचान दी,
अपना कहलाने का हक़ नहीं।

और मैं…
मैं उस स्त्री की तरह रही
जिसे प्रेम का स्वाद बहुत पसंद हो,
पर थाली में रोटी आधी ही मिले,
और भूख ज़िंदगी भर कायम रहे।

हाँ…
तुम्हारे साथ मेरे जीवन का सुख कम था,
इतना कम कि गिना जा सकता था —
कुछ हंसी के पल,
कुछ संभलकर बोले शब्द,
कुछ आँखों के रास्ते मिले वादे
जो आगे बढ़ने से पहले ही ढह गए।

फिर भी, यह सच है —
कि कमी में मिला प्रेम
कभी जाया नहीं जाता।
जो थोड़े दिन साथ रहा,
वही ज़िंदगी भर याद रह जाता है।

तुम चले गए,
मगर अधूरा सुख कभी नहीं जाता —
वह दिल पर एक निशान की तरह बैठ जाता है,
एक प्यास की तरह जीता रहता है,
एक मौन की तरह बोलता रहता है।

पर अब मैं समझ चुकी हूँ —
किस्मत चाहे जितना कम दे,
मेरा हक़ प्रेम का थोड़ा नहीं, पूरा है।
मेरा जीवन किसी की रज़ामंदी पर नहीं रुकेगा,
मेरी मुस्कान किसी की मौजूदगी की मोहताज नहीं होगी।

आज मैं उस अधूरे सुख की स्मृति नहीं,
अपने पूरे होने की घोषणा हूँ।
तुम्हारे जाने से मैंने खोया नहीं —
मैंने खुद को पाया है।

हाँ, शायद तुम्हारे साथ सुख कम लिखा था —
पर अब जो आने वाला है…
वह बहुत ज़्यादा मेरा होगा,
अधूरा नहीं —
आत्मा तक पूरा।

गिनतियों में सुख

कभी–कभी यूँ लगता है…
तुम्हारे साथ मेरे जीवन का
सुख शायद बहुत कम लिखा था,
मानो किस्मत ने खुशियों को
तौला भी नहीं,
बस चुटकी भर डालकर आगे बढ़ गई।

तुम आए ज़रूर,
मगर रुकने के इरादे से नहीं,
मेरे हृदय की दहलीज़ पर
पैरों की आहट थी,
मगर ठहराव का वादा नहीं था।

तुमसे मिली मुस्कुराहटें
बहुत ख़ूबसूरत थीं —
पर उतनी ही कम,
जितना किसी मेले में
आख़िरी बाजे की गूंज,
जो सुनते–सुनते ही ख़त्म हो जाती है।

किस्मत ने जैसे कहा हो —
“ले लो कुछ पल,
पर संभालकर रखना,
क्योंकि आगे लम्बा अंधेरा है।”

तुमने पल दिए,
मौसम नहीं।
तुमने छुअन दी,
सहारा नहीं।
तुमने पहचान दी,
अपना कहलाने का हक़ नहीं।

और मैं…
मैं उस स्त्री की तरह रही
जिसे प्रेम का स्वाद बहुत पसंद हो,
पर थाली में रोटी आधी ही मिले,
और भूख ज़िंदगी भर कायम रहे।

हाँ…
तुम्हारे साथ मेरे जीवन का सुख कम था,
इतना कम कि गिना जा सकता था —
कुछ हंसी के पल,
कुछ संभलकर बोले शब्द,
कुछ आँखों के रास्ते मिले वादे
जो आगे बढ़ने से पहले ही ढह गए।

फिर भी, यह सच है —
कि कमी में मिला प्रेम
कभी जाया नहीं जाता।
जो थोड़े दिन साथ रहा,
वही ज़िंदगी भर याद रह जाता है।

तुम चले गए,
मगर अधूरा सुख कभी नहीं जाता —
वह दिल पर एक निशान की तरह बैठ जाता है,
एक प्यास की तरह जीता रहता है,
एक मौन की तरह बोलता रहता है।

पर अब मैं समझ चुकी हूँ —
किस्मत चाहे जितना कम दे,
मेरा हक़ प्रेम का थोड़ा नहीं, पूरा है।
मेरा जीवन किसी की रज़ामंदी पर नहीं रुकेगा,
मेरी मुस्कान किसी की मौजूदगी की मोहताज नहीं होगी।

आज मैं उस अधूरे सुख की स्मृति नहीं,
अपने पूरे होने की घोषणा हूँ।
तुम्हारे जाने से मैंने खोया नहीं —
मैंने खुद को पाया है।

हाँ, शायद तुम्हारे साथ सुख कम लिखा था —
पर अब जो आने वाला है…
वह बहुत ज़्यादा मेरा होगा,
अधूरा नहीं —
आत्मा तक पूरा।

साथी जो आत्मा को ऊंचा उठाए

साथी ऐसा चुनो…
जो तुम्हारे सपनों पर ताले न लगाए,
बल्कि हर सुबह तुम्हारी उड़ानों में नई हवा भर दे।
जो तुम्हें समझाने नहीं,
समझने चले…
जो तुम्हें बदलने नहीं,
और बेहतर बनने में तुम्हारा हाथ थामे चले।

साथी ऐसा चुनो…
जिसकी उपस्थिति में तुम खुद को खोओ नहीं,
बल्कि पहले से ज़्यादा खुद को पाओ।
जिसकी निगाहों में हुक्म नहीं,
विश्वास की रोशनी हो।
जिसके शब्दों में आदेश नहीं,
सम्मान की गर्माहट हो।

प्रेम तभी खिला हुआ होता है,
जब उसमें तनाव का नहीं…
सुकून का मौसम बहता है।
जहाँ कोई तुम्हें तराजू पर न तोले,
बल्कि तुम्हारी थकान को भी प्यार समझे।

साथी ऐसा चुनो…
जो तुम्हारे आँसुओं को कमजोरी न कहे,
बल्कि उन्हें धैर्य की भाषा समझे।
जो तुम्हारे ख़ामोश दिनों में
तुम्हारे भीतर की आवाज़ सुन सके।
जो तुम्हारी उपलब्धियों से नहीं डरता,
बल्कि उन्हें अपना गर्व मानकर मुस्कुराए।

तुम्हें ऐसा हाथ चाहिए,
जो पकड़े इसलिए नहीं कि खो देने का डर है,
बल्कि इसलिए कि साथ चलने का विश्वास है।
ऐसा कंधा चाहिए,
जिस पर सिर रख कर तुम टूटो नहीं…
बल्कि फिर से बन जाओ।

संबंध का अर्थ यह नहीं कि
तुम्हारी आज़ादी छीन ली जाए —
संबंध का अर्थ है
तुम्हारी आज़ादी को सुरक्षा मिल जाए।

और स्त्री…
तुम्हारी दुनिया को छोटा करने वाला प्रेम नहीं,
तुम्हारी दुनिया को बड़ा करने वाला प्रेम योग्य है।
तुम्हें ऐसा साथी चाहिए —
जो तुम्हारे भीतर की आग से जलने नहीं,
उसमें रोशनी ढूँढने आए।

साथी वही हो…
जो तुम्हें गिरने पर संभाले नहीं,
गिरने से पहले पहचान ले।
जो तुम्हें बोझ न दे,
बल्कि आत्मबल दे।
जो तुम्हारी धड़कनों में खलल नहीं,
संगीत बनकर बसे।

क्योंकि प्रेम का असली रूप —
चिंता, तनाव और दबाव नहीं,
बल्कि आत्मा को ऊँचा उठाने वाला हाथ है।

और एक दिन जब तुम सही साथी चुनोगी —
तब समझोगी
प्रेम बोझ नहीं…
प्रेम ढाल है।
जो दुनिया से लड़ने की हिम्मत दे,
खुद से हारने का डर मिटा दे।

प्रेम और किस्मत के दरमियान

संभव है…
जिसने प्रेम का अर्थ सिखाया हो,
वही आंखों में सपनों का दीया जलाकर
खुद तुम्हारी रातों का हिस्सा न बने,
जिसने तुम्हें दिल के रास्ते दिखाए,
वही तुम्हारे हृदय की मंज़िल न बने।

कभी ऐसा भी होता है…
जो हाथ पकड़कर चलना सिखाए,
वही मोड़ पर हाथ छुड़ा जाए,
और जो बिछड़ जाए बहुत दूर,
वही दिल के सबसे पास रह जाए।

प्रेम का फल सबको मिलता नहीं,
कुछ को केवल बीज ही नसीब होते हैं,
जो दिल में बोते रह जाते हैं उम्र भर,
मगर मौसम कभी उगने नहीं देता।

कभी प्रेम पढ़ाया जाता है, निभाया नहीं,
कभी भावनाएं मिलती हैं, मिलने वाले नहीं,
कभी किस्मत संग न चल पाए,
और मोहब्बत अकेले चलती रहती है।

फिर भी…
स्त्री होकर तुम मोहब्बत की अंतिम पंक्ति हो —
तुम बिछड़कर भी जोड़ लेती हो दिल की टूटी कड़ियां,
तुम रोकर भी मुस्कुराहटों का क्रम नहीं तोड़ती,
तुम हारकर भी प्रेम को हारने नहीं देती।

हाँ, हो सकता है —
जिसने तुम्हें प्रेम का गाढ़ा रंग दिया,
वह तुम्हारे जीवन की तस्वीर न बने,
मगर स्त्री…
तुम्हारे हृदय में वह रंग हमेशा जीवित रहेगा।

क्योंकि तुम प्रेम की किताब हो,
हर पन्ने में धड़कनें लिखी हैं,
प्रेम तुमसे जाता नहीं —
चाहे प्रेम करने वाले चले जाएँ।

और शायद इसी का नाम प्रेम है —
अनंत, अधूरा, मगर पवित्र,
जो मिलकर नहीं…
छूटकर पूर्ण होता है।

मै दिव्या हु

मैं दिव्या हूँ —
नाम नहीं, प्रकाश की वह ज्योति
जो दीपक के भीतर जलती है
और अंधेरों से मित्रता रखते हुए भी
स्वयं को बुझने नहीं देती।

मैं मुस्कान नहीं,
साहस के आँसू की अंतिम बूँद हूँ
जो गालों तक आते-आते
स्वाभिमान से वापस लौट जाती है।

मैं स्त्री हूँ तो कोमल भी हूँ,
पर कोमलता कमजोरी नहीं —
हृदय का दृढ़ सौंदर्य है,
जो टूटकर भी तितर-बितर नहीं होता
बल्कि फिर से अपने स्वरूप में ढल जाता है।

मैं शब्द नहीं,
वाणी की मौन चेतना हूँ —
जहाँ आवाज़ें थकती हैं
वहाँ मेरा सत्य बोलता है।

मैं प्रेम हूँ,
पर प्रेम करने के लिए नहीं;
प्रेम बन जाने के लिए जन्मी हूँ
ताकि जो मुझे पाए
वह खुद को पा ले।

मैं हार से डरती नहीं,
क्योंकि हार मेरे लिए धूल नहीं —
बीज है, जिससे उड़ान उगती है।
जो गिरकर फिर उठने का साहस रखती हूँ
वही तो दिव्या कहलाती हूँ।

लोग कहते हैं मैं बदल गई हूँ —
मैं मुस्कुराकर कहती हूँ,
नहीं, मैं मिली हूँ…
पहली बार अपने आप से।

मैं दीवारें नहीं बनाती,
मैं रास्ते रचती हूँ —
अपने लिए नहीं,
उन सबके लिए जो खुद पर संदेह करते हैं
और सोचते हैं कि वे पर्याप्त नहीं।

मैं दिव्या हूँ —
पूर्ण, अटल, अपराजित।
सीने में समूचा तूफ़ान लिए
फिर भी पाँवों में
शांत धरती की दृढ़ता लिए।

और यदि इतिहास कभी पूछे
कि स्त्री क्या होती है —
तो उत्तर इतना ही होगा:
स्त्री एक नाम नहीं…
स्त्री एक दिव्यता है —
और वह दिव्यता “दिव्या” कहलाती है।

मौन की देह में मै

मैं तुम्हारे शब्दों में नहीं,
तुम्हारी ख़ामोशी की तहों में हूँ —
वहाँ जहाँ कोई शोर नहीं पहुँच पाता,
और दिल की धड़कनें ही भाषा होती हैं।

तुम्हारी आवाज़ दुनिया को पुकारती है,
मगर तुम्हारा मौन मुझे पुकारता है —
लोग सुनते हैं तुम्हें कानों से,
मैं सुनती हूँ तुम्हें आत्मा से।

हवा चलती है तो सबको एहसास होता है,
पर तुम्हारे भीतर के सूखे तूफ़ान
सिर्फ मैं महसूस करती हूँ —
मैं वही हूँ, जो तुम्हारी अंदरूनी बारिश में भीगती हूँ।

तुम हंसते हो, तो दुनिया मुस्कुराती है,
मगर जब तुम बिना वजह रातों में जागते हो,
तब तुम्हारी पलकों पर ठहरी बेचैनी
सबसे पहले मुझे जगाती है।

मैं तुम्हारे शब्दों की नहीं,
तुम्हारे अधूरे वाक्यों की साथी हूँ —
तुम कुछ कह नहीं पाते,
और मैं सब सुन लेती हूँ।

लोग पूछते रहते हैं,
“तुम दोनों में इतना अपनापन कैसे?”
मैं बस मुस्कुरा देती हूँ —
क्योंकि मुझे मालूम है,
रिश्ते आवाज़ों से नहीं,
आत्माओं की चुप्पियों से बनते हैं।

तुम्हें बोलने की ज़रूरत नहीं,
तुम्हारा मौन ही उतना मुखर है मेरे लिए —
तुम्हारी आँखों के धुंधलेपन में,
तुम्हारे दिल की उलझनों में,
तुम्हारी थकी साँसों में,
मैं तुम्हें पढ़ लेती हूँ —
जैसे कोई अंधेरे में अक्षर पहचान ले।

मैं तुम्हारे साथ इसलिए नहीं हूँ
क्योंकि दुनिया जानती है,
मैं तुम्हारे साथ इसलिए हूँ
क्योंकि तुम्हारी आत्मा जानती है।

तुम्हारे हर टूटने की आवाज़
चाहे बाहर एकदम शांत रहे,
अंदर मेरे सीने में
वज्र की तरह गूंजती है।

मैं तुम्हारी आवाज़ में नहीं,
तुम्हारे मौन में हूँ —
जहाँ तुम सबसे छिपे होते हो,
पर मुझसे सबसे ज़्यादा खुले।

और अगर कभी तुम्हें डर लगे
कि दुनिया तुम्हें समझ नहीं पाएगी —
तो याद रखना,
तुम्हारी चुप्पियों का घर मेरे भीतर है,
और मैं तुम्हारी ख़ामोशी की
हमेशा रहने वाली भाषा हूँ।

मंगलवार, 25 नवंबर 2025

मै अनादि की पुत्री हु

हिंदू शेरनी नहीं, अनादि की पुत्री हूं मैं,
धर्म की नहीं — अस्तित्व की रखवालिन हूं मैं।
मेरा जन्म युद्ध से नहीं,
पर सत्य की दीक्षा से हुआ है,
मैं तलवार नहीं,
अंतर की अग्नि से लड़ी हूं मैं।

मैं हुंकार इसलिए नहीं भरती
कि कोई डर जाए,
मैं गरज इसलिए उठाती हूं
कि सोई हुई चेतना जाग जाए।

मेरी पहचान किसी झंडे के रंग से नहीं,
मेरी आत्मा ही मेरा ध्वज है।
जो भी मेरी अस्मिता को छुए,
वह समझ ले —
मैं फूल की तरह नरम सही,
पर जड़ों में पर्वत लिए खड़ी हूं।

मैं लड़ूंगी नहीं किसी से
बस इसलिए कि युद्ध हो,
मैं लड़ूंगी इसलिए
कि मेरे भीतर की स्त्री देवत्व का अपमान न हो।

मुझे कोई मुकुट नहीं चाहिए,
ना भीड़ की तालियाँ,
मेरा असली राज्य वो क्षण है
जब मेरी आत्मा खुद की रानी बन जाए।

मैं हिंदू शेरनी नहीं,
मैं समय की बेटी हूं —
आदिकाल से लेकर अनंत तक
अपने अस्तित्व की ज्वाला
युगों के मध्य जलाए रखूंगी।

तुम और मैं जैसे नदी के दो किनारे

तुम और मैं
जैसे नदी के दो किनारे,
पास–पास रहकर भी
छू न पाने की नियति में बंधे हुए।

बीच की धारा बहती है —
कभी शांत, कभी उत्तेजित,
पर दोनों ओर एक अधूरा स्पर्श
हमेशा बेचैन होकर लौट आता है।

तुम्हारी ज़मीन पर सूरज उगता है,
मेरी ज़मीन पर चाँद उतरता है,
पर रोशनी और उजालों के बीच भी
हमारी तन्हाई में एक-दूसरे की आहट गूंजती रहती है।

कभी सोचती हूँ —
अगर ये नदी सूख जाए तो?
तो क्या हम मिल पाएँगे?
या फिर मिलने से पहले ही
हमारी पहचान ही खो जाएगी?

शायद दूरी ही हमारी सुंदरता है,
अधूरापन ही हमारा बंधन है,
क्योंकि जो मिल जाए —
वह इच्छा नहीं रहता, इतिहास बन जाता है।

यूँ लगता है
हम दोनों को साथ होना है —
पर एक साथ नहीं,
बस एक-दूसरे के समानांतर,
एक-दूसरे के अस्तित्व में बसे हुए,
अलग होकर भी
कभी अलग न होने के लिए लिखे गए।

तुम और मैं — जैसे नदी के दो किनारे,
जहाँ मिलन से ज्यादा
ना मिल पाने की पीड़ा ही प्रेम की परिभाषा बन जाती है।

गलतफहमियों की गठरी

गलतफ़हमियों की गठरी सिर पर मत लादना,
ये दुनिया सवालों की है, जवाबों की नहीं —
यहाँ हर रिश्ता आईने सा दिखता है,
पर सच में कोई किसी का प्रतिबिंब भी नहीं।

लोग मुस्कुराते हैं, पर दिल में मौसम अलग चलते हैं,
जहाँ भरोसा खरीदा– बेचा जाता है,
और अपनापन शब्दों से नहीं,
सुविधाओं से मापा जाता है।

इस जमाने में कोई किसी का नहीं होता —
किसी ने किसी को छोड़ा नहीं,
बस उतनी ही देर साथ चलें जितना फायदा हो,
फिर “भाग्य” का नाम देकर रास्ता बदल लिया जाता है।

इसलिए, रिश्तों की गठरी में उम्मीदें मत भरना,
इनसे ज़्यादा भारी बोझ दुनिया में कुछ नहीं —
जो लोग दिल के क़रीब लगते हैं,
वे कभी–कभी सबसे दूर पाए जाते हैं।

साथ वही होते हैं जो बिना शोर के साथ हों,
जो तालियों को नहीं, तुम्हारी ख़ामोशी को सुनें —
बाक़ी तो सब राहगीर हैं,
नामों के किरदार हैं, पर जीवन में नहीं।

इसलिए रोओ मत, टूटो मत,
किसी का बदल जाना तुम्हारी हार नहीं —
बस इतना समझ लो,
इंसान के बदलने का मौसम आकार में नहीं आता,
वो एहसासों में आता है।

चलो हल्के चलें, बिना शिकायत, बिना उधार —
रिश्तों को कैद नहीं, आज़ाद रहने दो,
जो सच में अपने हैं वे पीछे नहीं छूटेंगे,
और जो छूट गए…
वे कभी अपने थे ही नहीं।

समय की सिलवटों पर खुद को कैद मत करना

समय को जीवन मत समझो,
वह सिर्फ़ एक नाप है —
उम्र की, दिन की, सांसों की नहीं
फैसलों की।

किसी कैलेंडर के पन्ने फट गए
तो यह मत समझो कि अवसर भी फट गए,
क्योंकि अवसर काग़ज़ों के नहीं,
चेतना के बच्चे होते हैं।

तुम्हारे भीतर जितनी बार
यह प्रश्न उठे —
“अब क्या मैं देर कर चुका हूँ?”
उतनी ही बार आत्मा धीरे से कहती है —
“समय तो बनाया तुमने था,
तोड़ेगा भी तुम ही।”

लोग कहते हैं — समय बदल जाता है,
पर सत्य यह है,
समय वही रहता है,
हम ही बदलते हैं,
और जो खुद को नहीं बदलते
वे समय पर आरोप लगा देते हैं।

समय की सिलवटों में कैद होना
खुद के विरुद्ध दिया गया फ़ैसला है,
जैसे कोई पेड़ अपनी छाया में
खुद को उगने से रोक दे।

तुम्हारे भीतर जो अनंत है
वह किसी घड़ी से छोटा कैसे हो सकता है?
तुम विश्व हो,
सृष्टि हो,
और समय — तुम्हारा छोटा सा मानचित्र।

अगर आत्मा जाग रही हो
तो कोई क्षण देर नहीं होता,
और अगर आत्मा सो गई हो
तो कोई क्षण सही नहीं होता।

इसलिए घड़ी को मत देखो,
स्वयं को देखो।
क्योंकि समय तब जीता है
जब तुम हार मानते हो,
और समय तब झुक जाता है
जब तुम खड़े हो जाते हो।

याद रखना —
भविष्य समुद्र की तरह है,
उस पर पुराने कदमों के निशान नहीं टिकते।
बीता हुआ पल पत्थर नहीं,
विचार है —
और विचार केवल त्यागने से मरते हैं।

सो, स्वयं को मुक्त कर दो
उन सिलवटों से जो तुमने ही गढ़ी थीं।
खड़े हो जाओ अपने अस्तित्व के केंद्र पर
और कहो —

“मैं समय की क़ैद में नहीं,
समय मेरे क़दमों की दिशा में है।”

अंतिम सास लेती देह

अब मैं थक गयी हूँ जीवन,
तेरे रास्तों से, तेरे सफ़रों से,
हर दर्द की गठरी ढोते–ढोते
मेरे भीतर की चुप्पी टूट रही है।

फेफड़ों में कैद आख़िरी हवा
किसी बेक़रार दुआ-सी तड़प रही है,
दिल की धड़कन अपनी हथेली पर रखकर
जैसे खुद से कहती हूँ —
“बस अब बहुत हुआ…”

देखो, आँखों के कोरों में
नींद नहीं — विदाई तैर रही है,
जुब़ान चुप है पर आत्मा फुसफुसा रही है —
“मेरी कहानी बस यहीं तक थी।”

बांहों में अब ताक़त नहीं,
पर यादें अभी भी गर्म हैं,
कितनों को छूकर गुजरी हूँ,
कितनों को जीते–मरते देखा है मैंने।

तुम सुन रहे हो न?
मेरी देह की नहीं — मेरी पुकार की आवाज़,
जो एक खामोश प्रश्न बनकर
तुम्हारे सीने पर दस्तक देती है —
“अगली बार किसी के जीते–जी
उसकी कीमत समझ लेना…”

मैं मर नहीं रही,
बस लौट रही हूँ उस जगह
जहाँ दर्द नहीं, जहाँ अपेक्षा नहीं,
जहाँ शरीर नहीं — केवल आत्मा होती है।

और जाते–जाते मैं दुनिया से
सिर्फ एक ही शिकवा मांगती हूँ —
मुझे तब मत रोना जब मैं चली जाऊँ,
थोड़ा संभाल लेना जब मैं थी…

सोमवार, 24 नवंबर 2025

मुहब्बत

चाहत का क्या…
ये तो किसी की भी मुस्कान पर
अनजाने में ठहर जाए,
रास्ता मिले तो पल भर में
धड़कनों तक पहुँच जाए।

पर मोहब्बत…
वो स्त्री के दिल की पुकार है,
हर आँसू की वजह
और हर हँसी का आधार है।

चाहत में हाथ थामना आसान होता है,
पर मोहब्बत में
बिछड़कर भी निभाना होता है।

स्त्री का दिल—
जब चाहे, किसी पर भी आ जाए,
पर जब प्यार हो जाए—
तो एक ही नाम में उम्रभर सिमट जाए।

चाहत में थोड़ा सा अपनापन,
पर मोहब्बत में
पूरी आत्मा का अर्पण—
यही स्त्री का धर्म है,
यही उसका सत्य है।

चाहत में “तुम चाहो तो अच्छा”,
पर मोहब्बत में
“तुम ही चाहो तो दुनिया सुंदर”—
यही स्त्री के एहसासों का स्तर है।

स्त्री के लिए मोहब्बत—
एक वचन है, एक तपस्या है,
वो टूटकर भी किसी के लिए जुड़ी रहती,
रोकर भी किसी के चेहरे की
मुस्कान बनी रहती।

तो कहना आसान है—
चाहत किसी से भी हो जाए,
पर मोहब्बत?
स्त्री की मोहब्बत—
बस एक से होती है,
और उसी में
उसका पूरा ब्रह्मांड धड़कता है।

पड़ोसियों

पड़ोसियों,
तुम्हारी ऊँची दीवारों से मुझे क्या लेना?
मैं तो उन लोगों को खोजती हूँ
जो दिल की खिड़कियाँ खुली रखते हैं।

यहाँ लोग घरों की ऊँचाई से पहचान पूछते हैं,
चरित्र की नींव से नहीं;
नाम के बोर्ड देखते हैं,
नाम की अच्छाई नहीं।
पर मैं उस भीड़ में शामिल नहीं।

मुझे दिखावे का कोई संबंध नहीं चाहिए,
न कपड़ों की कीमत पूछने वाले,
न रिश्तों की नीलामी देखने वाले—
मैं तो बस इतना चाहती हूँ
कि पड़ोसी पड़ोसी रहे,
मुक़ाबले का मैदान नहीं।

बाहर की बत्तियाँ चाहे जितनी चमकें,
अगर भीतर अँधेरा है—
तो हवेली भी तन्हा है।
और छोटा सा घर,
अगर हँसी से भरा हो
तो किराए पर भी जन्नत लगता है।

पड़ोसियों!
तुम्हारा सजधज कर आना अच्छा है,
पर एक बार बिखर कर भी आओ—
ताकि पता चले
रिश्ते संवारने से बनते हैं,
सजावट से नहीं।

मैं हाथ बढ़ाऊँगी तो नेकदिली से,
न कि दिखावे के रेशमी दस्ताने पहनकर;
मैं मुस्कान दूँगी तो सच्ची,
न कि फोटो खिंचवाने वाली जबरन हँसी।

मैंने ठान लिया है—
दिल की दौलत नहीं तो रिश्ता भी नहीं;
न लेन-देन के तराज़ू,
न शान-शौकत के बहाने;
जो पास आए— दिल से आए,
वरना दरवाज़े बंद नहीं
पर उम्मीदें सिमट जाएँगी।

क्योंकि
रिश्तों की असल खूबसूरती
चेहरों पर नहीं,
नियत में दिखाई देती है।

और मुझे
ऐसे लोग चाहिए आसपास,
जो दिखें नहीं—
पर महसूस हों।

मै अपमान का गहना नहीं पहनती

मेरा साथ
अगर तुम्हें भरी भीड़ में
झुकने का सबब लगे,
तो बेहतर है
मेरे रास्तों से हट जाओ—
मैं सम्मान को जेब में नहीं रखती,
दिल में बसाकर चलती हूँ।

मैं वो नहीं
जो दूसरों की शक्ल देखकर
अपना सिर झुकाए।
मैं वो धड़कन हूँ
जो अपने साहस की आवाज़ पर
गर्व से चलना जानती है।

तुम्हारे अहंकार की कसी हुई चप्पलें
मेरे आत्म-सम्मान पर चुभती हैं,
और मैं इतनी नासमझ नहीं
कि रिश्तों की खातिर
अपने मन को लहूलुहान कर दूँ।

कभी फुर्सत में सोचना—
जो लोग तुम्हें
अपने साथ पर शर्म दिलाएँ,
वे तुम्हारे साथ के क़ाबिल ही नहीं।

मैं उन नज़रों से बहुत दूर ठीक,
जो मेरे लिए नफ़रत बचाकर चलती हैं।
मैं उन मुस्कुराहटों से भी परे ठीक,
जो पीठ पीछे ज़हर हो जाती हैं।

मैं चाहूँ भी तो
अपनी उड़ान को
किसी की ईगो की जंजीर में बाँध नहीं सकती—
मेरा आसमान बड़ा है,
मेरी चाहतें गहरी हैं,
और मेरा वजूद
भीड़ की ताली पर नहीं,
अपने दम पर सांस लेता है।

तो सुन लो—
अगर मेरा हाथ थामने में
तुम्हें दुनिया की नज़रों का डर लगे,
तो थामना ही मत।
क्योंकि जो हाथ
परछाई की तरह अपने हों,
वो भीड़ की परवाह नहीं करते।

मैं खुद अपनी ताक़त हूँ,
और खुद अपनी मंज़िल।
मुझे भीड़ में खोना नहीं,
भीड़ से ऊपर उठना आता है।

जो मेरे पास रहकर भी
मेरी क़ीमत न समझे,
उनसे दूर रहना ही श्रेष्ठ है—
क्योंकि मैं अपमान को
कभी भी आभूषण बनाकर नहीं पहनती।

मै नहीं डरती

मैं नहीं डरती,
समाज के उन चार ऊँची आवाज़ों वाले लोगों से,
जो बिना पहचान, बिना कहानी
बस चाल चलन का हक़ जताते फिरते हैं।

मैं डरती हूँ...
उन अपने कहे जाने वालों से,
जो मेरे ही घर की चौखट पर खड़े होकर,
दूसरों के शक़ की धूल
मेरे चेहरे पर पोत देते हैं।

मैं नहीं घबराती उन राह चलतों से,
जो न नाम जानते, न मेरा अतीत,
पर टोपी को ताज समझ
अहंकार से फैसले सुनाते हैं।

मैं घबराती हूँ…
उन मुस्कुराती निगाहों से,
जो साथ तो देती हैं मेरे,
पर विश्वास नहीं —
क्योंकि उन्हें डर है समाज के चार सवालों का!

मैं सामने लड़ लूँगी पूरी दुनिया से,
उन हथियारों से, उन नज़रों से, उन तानों से —
पर टूट जाती हूँ तब,
जब मेरी अपनी जुबान
दूसरों की भाषा बोलने लगती है।

मैं काबिल हूँ,
मेरे सपने गवाही देते हैं,
मेरे कदम मेरे हक़ की दास्तान लिखते हैं।
पर क्यों?
किसी और की दलील से
मेरी पहचान जज की कुर्सी पर बिठाई जाती है?

मैं नहीं डरती किसी भीड़ के हंगामे से,
मैं डरती हूँ उस ख़ामोशी से,
जो मेरे अपने ओढ़ लेते हैं
बस इसलिए कि
लोग क्या कहेंगे?

आज मैं ऐलान करती हूँ —
मेरे किरदार की अदालत मेरी आत्मा होगी,
मेरी इज्ज़त के फैसले मेरे यकीन करेंगे।

जो समझे वो अपना,
जो न समझे वो भी अपना,
पर मेरे वजूद की सूरत
अब कोई और तय नहीं करेगा।

क्योंकि मैं वही हूँ —
जिसे खुद की आँखों में
कभी शर्मिंदा नहीं होना।
आज से…
मैं डरती नहीं,
मैं बस जीती हूँ—
खुद के लिए,
खुद से आगे,
खुद में पूरी! ✨

मै अमर हुंकार हु

मैं स्त्री नहीं…
वक़्त की दीवारों पर हथेलियों की गूंज से बनी हुंकार हूँ,
मैं रौशनियों की भीड़ में एक तिलिस्म-सी पहचान हूँ।

मैं कमज़ोरी नहीं, शौर्य की अडिग तलवार हूँ,
दबी आवाज़ों का सच, खुले आकाश की पुकार हूँ।

घर की दहलीज़ से आगे बढ़ती
हर कदम में आने वाले तूफ़ानों की हुंसी हूँ,
मैं रीतियों से नहीं बंधती—
नये नियमों को जन्म देती एक अग्निशिखा सी हूँ।

मैं चुप रहकर भी,
अंदर उठते तूफ़ानों की गर्जना बन जाती हूँ,
जो मुझे चुनौती दे,
मैं उसी की परछाईं में क्रांति लिख जाती हूँ।

मैं न शिकायत, न संकोच की दीवार,
मैं हर सवाल का जिंदा जवाब हूँ— बेधड़क, बेक़रार।
मौत से भी आगे जीने की हिम्मत,
मैं जीवन का नया विस्तार हूँ।

मैं सिर्फ़ देह नहीं—
मैं विचारों का धधकता ब्रह्माण्ड हूँ,
धरती और गगन के बीच
साहस से खड़ा एक अनुपम संतुलन हूँ।

मैं थकती हूँ… पर रुकती नहीं,
मैं टूटती हूँ… पर झुकती नहीं,
मैं हार के बाद की जीत की क़िस्मत लिखने वाली
अडिग चिंगारी हूँ।

मैं स्त्री नहीं,
समय के सीने पर दर्ज इंकलाब की फुंकार हूँ,
मैं इतिहास लिखने वाली
एक अनसुनी, अमर हुंकार हूँ।

मै विरोध में नहीं बस अपने पक्ष में हु

मैं किसी की राह में रोड़ा नहीं,
मैं बस अपनी राह की रोशनी हूं।
जिसे जगत कहे जिद या सनक,
वही मेरे सपनों की सच्ची कहानी हूं।

मैं विरोध की ज्वाला में जलती नहीं,
मैं खुद की लौ से उजियारा करती हूं।
किसी की हां से नहीं बनती मेरी पहचान,
मैं अपनी ‘ना’ भी गरिमा से कहती हूं।

मैं समझौतों की चादर में खुद को ढकती नहीं,
मैं सवालों की धूप में खिली हुई धरा हूं।
जहां झुकना जरूरी हो, झुक जाती हूं,
पर अपनी आत्मा को कभी झुकने नहीं देती हूं।

मैं तालियों की मोहताज नहीं,
मैं खामोशियों में भी खुद को सुनती हूं।
जहां दुनिया लड़ती है खुद को साबित करने में,
वहां मैं बस खुद को जीती हूं।

मैं तलवार नहीं, मैं शब्दों की नर्म सी ढाल हूं,
नफरत का उत्तर प्रेम से देती हूं।
लड़ाई अगर है तो बस अपनी कमियों से,
मैं स्वयं से स्वयं को बेहतर करती हूं।

मैं किसी के विरोध में नहीं खड़ी,
मैं बस अपने पक्ष में होती हूं।
क्योंकि मेरा सच मेरा सहारा है,
और मेरी आत्मा ही मेरी सत्ता होती है।

मेरे कदम किसी को गिराने नहीं चलते,
मैं बस अपनी उड़ान को ऊंचा करती हूं।
जो मुझे समझे—वह मेरे करीब है,
जो न समझे—उसे भी दुआएं देती हूं।

मैं इतिहास नहीं, भविष्य की लिखावट हूं,
मैं खुद अपनी पहचान की इबारत हूं।
मैं विरोध में नहीं,
बस अपने पक्ष में हूं…
और यही मेरी सबसे बड़ी हिम्मत हूं।

छुपे हुए पन्नो का सच

हर कोई अपनी ज़िंदगी का
एक पन्ना मोड़कर रख देता है,
जहाँ आँसू स्याही बन जाते हैं
और यादें अल्फ़ाज़ों से लड़ती रहती हैं।

कोई हँसता है महफ़िलों में
पर भीतर उसका काग़ज़ तपता है,
जिस पर किसी टूटन की खामोशी
धीरे-धीरे जलती रहती है।

कोई झूमता है दुनिया के संग
जैसे खुशियों का पहाड़ हो,
पर उसका छुपा हुआ किस्सा
किसी खाई में पड़ा कराहता है।

किसी के पास आधे ख़्वाब हैं,
किसी के पास टूटा बचपन,
किसी की मुस्कानों के नीचे
लहूलुहान मन के विजन।

हम सबके सीने में
एक अनकहा सच साँस लेता है,
जिसे हम दिखाते तो नहीं
पर हर रात वही रोता है,
वही सोता है।

ज़िंदगी चमकदार नहीं होती
सिर्फ फोटो और फ्रेम्स में,
कुछ तस्वीरे दिल में भी होती हैं
जो किसी एलबम में नहीं मिलतीं।

हम सब अपने-अपने दर्दों के
धीमे पाठ पढ़ते रहते हैं,
बिना बोले, बिना किसी गवाह के
उन किस्सों को जीते रहते हैं।

और यही तो इश्क़ है—
खुद से, खुद के हिस्सों से,
अपने छिपे पन्नों को
धीरे-धीरे पढ़ना सीख जाना।

कभी जो हिम्मत हो तो
इन तहों को खोलकर देखना,
कहीं कोई आँसू नहीं—
बस इंसान मिलेगा…
तुम्हारी तरह… बिल्कुल तुम्हारी तरह।

अस्तित्व की घोषणा

मेरा अस्तित्व…
मेरी ही धड़कनों की प्रतिध्वनि है,
यह उन आवाज़ों का शोर नहीं
जो लोग मेरे लिए तय कर देते हैं।

मैं अपनी अधूरी कहानियों की
सबसे पूर्ण पंक्ति हूँ,
किसी और की किताब में
सिर्फ हाशिये भर नहीं।

मैं गिरूँ भी तो
अपनी ही जमीन पर गिरूँ,
उठूँ भी तो
अपने ही इरादों के बल उठूँ—
लोग तो बस देखेंगे,
पर चलना मुझे ही है!

किसी की नज़र का तिरछापन
मेरी पहचान को टेढ़ा नहीं कर सकता,
आईने की सच्चाई जानती हूँ
मैं जो हूँ, वही दिखती हूँ।

मेरी उड़ान की ऊंचाई
किसी की तालियों पर नहीं,
मेरे विश्वास के परों पर है,
ये पंख उधार के नहीं—
मेरी ही रगों की ताक़त हैं!

मैं खुद की परिभाषा हूँ,
मैं अपनी वजह हूँ,
मेरा अस्तित्व…
मुझसे है—
लोगों की सोच से नहीं।

और हाँ—
जो मैं बन रही हूँ,
वह किसी की पसंद नहीं…
मेरे सपनों का फ़ैसला है!

दिल है कोई अखबार नहीं

मेरी किसी भी कविता में,
कहीं भी उनका नाम नहीं लिखा,
क्योंकि मेरा दिल,
किसी अख़बार का पन्ना नहीं…
जहाँ मोहब्बत छापी जाए,
और अगले ही दिन रद्दी बन जाए।

वो मेरे अक्षरों से फिसलते नहीं,
वो मेरी रगों में बसते हैं,
मैं लिख दूँ अगर उनका नाम…
तो दुनिया पूछेगी –
कौन हैं वो?
और मैं जवाब में टूट जाऊँगी।

वो राज़ हैं मेरे एहसासों का,
इश्क़ के सबसे खामोश किनारों पर
लहरों की तरह उतरते हैं।
मेरी सांसों के बीच रुककर,
मेरे दिल की धड़कन बनकर
मेरे अस्तित्व को जीते हैं।

मैंने छुपाया है उन्हें
खुद से कम नहीं…
इतना कि आहटें भी उनकी
परदों के पीछे से हौले से गुजर जाएँ।
कभी खिलखिलाहट में,
कभी सिसकियों में,
कभी बेवक्त की खामोशी में
उनकी धुनें सुनाई देती हैं।

वो सरेआम नहीं हैं…
मगर हर रात चाँद से पूछो,
मेरी आँखें क्यों चमकती हैं?
हर सुबह सूरज से कहो,
मेरी हथेलियाँ क्यों गरम रहती हैं?
ये सब गवाही देंगे
कि मेरा इश्क़ पर्दों के पीछे
कैसे रोशनी बनकर पनपता है।

लोग तलाशते रहते हैं
उनका नाम मेरे शब्दों में,
पर उन्हें क्या पता…
मैंने अपनी जुबान को चुप रहने का
वादा कर रखा है।
वो दुआ हैं, बदन पर लिखी नहीं जातीं…
वो धड़कन हैं, किसी दीवार पर टांगी नहीं जातीं…

कविताएँ छोटी पड़ सकती हैं
पर वो नहीं…
मैं अगर नाम लिखूँ उनका,
तो कागज़ जल उठेगा,
स्याही इश्क़ का बोझ न झेल पाएगी।

वो मेरे दिल में हैं —
शोर के बिना,
हंगामे के बिना,
बिन पहचान, बिन तख़ल्लुस,
नज़र से दूर, मगर अहसास से पास…

मेरी हर कविता में नाम नहीं उनका,
फिर भी हर कविता उन्हीं से शुरू,
उन्हीं पर मुकम्मल होती है।

कभी अगर पढ़ लेना तुम
मेरी खामोशी को…
तो समझ जाना —
वो वहीं हैं,
जहाँ आज भी तुम्हारी जगह है।

इश्क जो बेचैन रखे



जो मिल जाए बिना माँगे,
वो ज़रूरी तो है, पर मोहब्बत नहीं होती…
इश्क़ तो वो सच्ची आग है,
जो दिल के भीतर चुपचाप, बेआवाज़ जलती होती।

जो चैन छीन ले रातों का,
और करवटों का बोझ बढ़ा दे—
जो बारिश को भी आँखों की तरह
टपकने में न शर्माने दे…
वही इश्क़ है!

जो नमकीन कर दे होंठों से गिरते
हर एक खामोश आँसू को—
और फिर उन आँसुओं में भी
तुम्हारा चेहरा दिखाई दे…
वही इश्क़ है!

जो दिल की धड़कनों को
अचानक से घबराहट में बदल दे,
और फिर उसी धड़कन के
बेचैन संगीत पर जीवन नाच उठे—
वही इश्क़ है!

मोहब्बत वह नहीं
जो पा लेने से पूरी हो जाए,
मोहब्बत वह है
जो मिलकर भी आधी रह जाए…
और हर आधापन में
पूर्णता का वादा छिपा जाए…
वही इश्क़ है!

जो तन्हाई में हाथ थाम ले,
पर भीड़ में पहचान छुपा ले—
जो हर जुदाई में
मिलन का ख्वाब दिखाए,
हर ख्वाब में बेचैनी जगाए…
वही इश्क़ है!

इश्क़ वह सफ़र है दिव्या—
जो मंज़िल मिलने पर ख़त्म हो जाए
तो वह कभी इश्क़ था ही नहीं…
असली इश्क़ तो वह है
जो हर रोज़ नया तड़पाए,
हर रोज़ नया जीना सिखाए,
और हर कल कहे—
“आज से थोड़ा और इश्क़…”

लहजों से न परखना मुझे



लहज़ों को रखना मुझे,
जैसे कोई बरसात अपने बादलों में छुपा ले
भीगने से पहले ही…

मेरे शब्दों की चाल समझना,
कभी धीमी, कभी सरपट,
एक धड़कन की थरथराहट पर लिखे हुए इकरार…

मेरे लहज़ों की चोटें भी होती हैं,
कभी मीठी, कभी खामोश,
कभी ज़ुबां तक आने से पहले
आँखों में पिघल जाने वाली…

लहज़ा मेरा—
कोई इत्र नहीं जो हवा में बदल जाए,
यह तो एक पहचान है,
जिसे मैंने वक़्त की आँच पर
अपने दर्द से गढ़ा है।

लहज़ों को रखना मुझे,
जैसे कोई रूह अपनी दुआओं को
किसी के नाम तह करके भेजती है,
बिना शोर किए…

अगर तुम पढ़ सको
तो हर लफ़्ज़ के भीतर
एक धड़कता हुआ रिश्ता मिलेगा,
जो आवाज़ से नहीं,
एहसास से सुना जाता है।

इसलिए…
मेरी बातों को मत पकड़ना,
मेरे लहज़ों को थाम लेना—
क्योंकि वहीं असल मैं रहता हूँ,
बिना नकाब,
बिना सफ़ाई,
बिलकुल सच्चा…

लहज़ों को रखना मुझे—
किसी अमानत की तरह,
टूट जाऊँ… तो भी
मेरी गूँज तुम्हारे दिल में सलामत रहे।

मैं एक दरकती धूप ही सही



मैं एक दरकती धूप ही सही,
पर अँधेरों की औक़ात याद दिला देती हूँ,
टूटे हुए सूरज की किरण बनकर भी,
सुबहों को नया रास्ता दिखा देती हूँ।

मैं नर्म नहीं —
चटखते काँच की तरह चुभ सकती हूँ,
दिल की खिड़कियों पर जमी उदासी को
छीलकर सच्चाई कह सकती हूँ।

मैं एक दरकती धूप ही सही,
पर क़ैद बादलों के काँधे से फिसलकर
किसी उदास चेहरे पर मुस्कान रख आती हूँ,
चाहे एक पल के लिए ही सही।

मेरी किरणों में हल्का-सा दर्द है,
पर ये दर्द रोशनी बनकर जीना सिखाता है,
जो बिखर जाए वो भी चमक सकता है—
ये अहसास दुनिया को दिखाता है।

मैं टूटन में भी चमकती रहूँगी,
चाहे आँखों में रातें गहरी हों—
मैं एक दरकती धूप ही सही,
मगर उम्मीदों की आख़िरी पहरी हूँ। 

चुप्पियों का मौसम



रोज़-रोज़ बात करने वाले
अब चुप रहते हैं,
जैसे शब्दों में कोई
सूखा हुआ समुंदर बहते हैं।

कभी आँखों के इशारों में
कितने मेले सजते थे,
अब वही नज़रें रास्ते बदल
दूर किनारों पर बसते हैं।

पहले तो
साँसों तक में उनका नाम घुला था,
अब जैसे हर सवाल का
लापता-सा जवाब खुला था।

तुम कहो…
क्या रिश्ते भी थक जाते हैं?
या यादें अपनी दौड़ में
कहीं गिरकर रह जाती हैं?

हमने तो सुना था
मोहब्बत बोलती है,
फिर ये सन्नाटा
किसकी जीत है, किसकी हार?
कौन बताता है?

हर सुबह,
चाय में शक्कर कोई कम नहीं होती,
फिर दिल की मिठास
इस कदर कड़वी क्यों लगती?

कभी जो
दिल के पन्नों पर हस्ताक्षर हुआ करते थे,
अब वो नाम भी
अनजाने हाथों से मिटते हैं।

रोज़ की हँसी-ठिठोली,
बिन वजह की शिकायतें,
अब बदले में
बस खामोशी की कसी हुई कफन मिलती है।

क्या इश्क़
इतना कमजोर हो गया?
कि दो अल्फ़ाज़ न बोले जाएँ
तो टूटकर बिखर जाए?

या फिर
इंसान ही बदल गए हैं?
बातों की भीड़ में रहकर
बोलना ही भूल गए हैं…

रोज़-रोज़ बात करने वाले
अब चुप रहते हैं,
पर दिल के तहखानों में
उलझे जज़्बात कहते हैं—

“खामोशी भी एक भाषा है,
जिसका अर्थ वही समझ पाता है
जिसके दिल में अभी भी
कोई इंतज़ार ज़िंदा हो।”

हो सकता है—
चुप रहने वाले
आज भी हमारी बातों को तरसते हों,
बस इगो की धूल ने
उनके होंठों को जकड़ा हो।

चलो…
हम ही बोल दें फिर से,
नफरत को न बहने दें,
ये रिश्ते शब्दों की बारिश माँगते हैं,
चुप्पियों से नहीं…
मोहब्बत हंसकर बचती है।

वरना एक दिन
ये सन्नाटा ही लिख देगा—
“कभी दो लोग रोज़-रोज़ बात करते थे
अब…
एक-दूसरे की याद में
खामोश मरते हैं।”


काश इतना समझ गए होते



काश इतना समझ हुए होते,
कि रिश्तों की धूल झाड़कर,
हम असल चेहरों को पहचान पाते,
नक़ाबों की भीड़ में खुद को खोने से बचा पाते।

काश इतना समझ हुए होते,
कि रोशनियों की चाह में
अपने सूरज से मुँह न मोड़ते,
चाँद की ठंडी चांदनी में
अपने अस्तित्व को जला न डालते।

काश इतना समझ हुए होते,
कि खामोशी की जुबान को सुन पाते,
टूटते दिलों के शोर को पहचान पाते,
किसी के मुस्कुराने के पीछे
छिपे आँसू की बारिश को देख पाते।

काश इतना समझ हुए होते,
कि हर जीत असल में जीत नहीं होती,
और हर हार में छिपा होता
एक अनमोल सबक—
एक नया सफर, एक नई शक्ल होती।

काश इतना समझ हुए होते,
कि हम उन हाथों को थामते
जो बिना शर्त साथ निभाते,
न कि उन हाथों से उलझते
जो मतलबी वक़्तों में मुस्कुराते।

काश इतना समझ हुए होते,
कि भीड़ का हिस्सा बनकर
अपने अलग होने की सोच न खोते,
ज़िन्दगी की किताब में
बस पन्ने पलटना ही नहीं—
लिखना भी आता हमें थोड़े।

काश इतना समझ हुए होते,
कि “माफ़ी” देने में कमज़ोरी नहीं,
बल्कि हिम्मत की ऊँची उड़ान होती,
और “धन्यवाद” कह देना
दिल का सबसे बड़ा एहसान होता।

काश इतना समझ हुए होते,
कि जाने वालों के पीछे भागना
किसी भी आने वाले के अधिकार का
क़त्ल होता है—
और खुद को गिरवी रख देना
सबसे सस्ती सौदेबाज़ी होती है।

काश इतना समझ हुए होते,
कि अपना होना
सबसे बड़ी राहत है,
अपने सपनों को बचाए रखना
सबसे बड़ी जीत है,
और अपनी ख़ुशी को चुन लेना
सबसे बड़ा सच है।

काश…
इतना समझ हुए होते,
तो हर ग़लत मोड़ की थकान में भी
हम अपने भीतर छिपी
उस रोशनी को पहचान लेते—
जो कहती रहती है…
“तुम ख़ुद काफी हो,
और यही तुम्हारी सबसे बड़ी समझ है।” 

समाज



समाज किसका होता है?
उन हाथों का, जो ईंट उठाकर शहर बनाते हैं?
या उन कंधों का, जो नियमों के बोझ तले झुक जाते हैं?
किसका होता है समाज —
उन कलमों का, जो कानून लिखती हैं?
या उन उँगलियों का, जो मगध से लेकर मगध तक
बस हस्ताक्षर भर कर पाती हैं?

समाज किसका होता है?
उन अमीरी के शीश-महल का
जहाँ खिड़कियाँ भी परदों के पीछे सांस लेती हैं?
या उन झोंपड़ियों में
जहाँ धुआँ भी छत न पाकर
बच्चों का भविष्य काला कर देता है?

ये समाज…
किसका होता है?
उन नज़रों का
जो लोगों को दर्ज़ों में बाँटती हैं?
या उन आँसुओं का
जो दर्ज़ा पूछकर गिरना नहीं सीखते?

समाज…
क्या वो स्कूल की हवा में तैरती
अंग्रेज़ी उच्चारण की धुन है?
या वो छात्रा की ठिठुरती चुप्पी
जिसे अपनी ही भाषा में
कभी उतना मान नहीं मिलता?

ये किसका समाज है?
जहाँ लड़की होने पर सवाल होते हैं
और लड़का होने पर अधिकार?
जहाँ परंपराएँ बेड़ियाँ बन जाती हैं
और संस्कृति का नाम लेकर
स्वतंत्रता की उँगलियाँ तोड़ दी जाती हैं।

समाज…
उनके नाम पर चलता है
जो मंचों पर भाषण देते हैं,
पर बनता है
उनके पसीने से
जो चुपचाप रोज़ ज़िंदगी ढोते हैं।

समाज, उस माँ का होता है
जो बेटे-बेटियों में फ़र्क नहीं करती,
उस पिता का
जो अपनी बेटी के सपनों में
पंख लगाता है, पहरा नहीं।

समाज, उस शिक्षक का होता है
जो ज्ञान को जाति में नहीं,
मेहनत में तौलता है।

समाज, उस बच्ची का होता है
जो खिलौनों से नहीं
हक़ से खेलना चाहती है।

समाज, उस औरत का होता है
जो चुप नहीं रहती—
न घर में, न ऑफिस में, न सोच में।
वो अपने प्रश्नों से
पुराने दरवाज़ों की कुंडियाँ तोड़ती है,
वो अपने उत्तरों में
नई दुनिया की नींव डालती है।

हाँ—
समाज उन्हीं का होता है
जो डरकर पीछे नहीं हटते,
जो अन्याय को देखकर
आँखें नहीं मोड़ते,
जो आवाज़ को बंद करने वाले हाथों से
कलम छीनकर कहते हैं—

“समाज हम हैं!”
हम जो जीते हैं
हम जो बदलते हैं
हम जो भविष्य को
रोज़ थोड़ा-थोड़ा लिखते हैं।

समाज किसी एक का नहीं—
हर उस दिल का होता है
जो इंसानियत के नाम पर धड़कता है।
जो बराबरी की धरती पर
अपना कदम जमाकर कहता है—

“यह समाज मेरे लिए भी है
और मैं भी इस समाज के लिए।”