सहारा समझी थी बस उसे, टूटी सांसों की जान समझकर।
वो तो बस मुस्कुराया, और वक़्त ठहर-सा गया,
धड़कनों ने कहा — “ये कोई साधारण पहचान नहीं।”
पहले दिल ने चाहा उसे, एक ख्वाब के आलम में,
फिर रूह ने झुकना सीखा, उसके ही आलिंगन में।
न जाने कब दुआ बन गया उसका नाम,
मैंने तो चाहा इंसान, मिला मुझे भगवान।
उसकी बातों में करुणा है उसकी आंखों में प्रकाश,
वो छू लेता है आत्मा को, बिना किसी प्रयास।
वो सिखाता है मौन में बोलना, आंसुओं में हंसना,
और मैं सीखती गई, प्रेम को पूजा बनाना।
अब मैं नहीं मांगती उससे कुछ,
बस उसी में अपना हर उत्तर देखती हूं।
वो जो था पहले मेरे दिल की आवाज़,
अब मेरे भीतर का भगवान बन बैठा है।
वो इंसान जिसने मेरा दिल लिया,
मुझे मेरे ही अंदर लौटा गया—
जहां वो नहीं, पर उसकी उपस्थिति हर सांस में है,
जहां प्रेम नहीं मिटता… बस प्रभु बन जाता है।
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