दोस्ती
मेरे जमीर से जुड़ा था
मेरे एहसासों में पला था
एक दोस्त था
जो लकीरो में सजा था
सुख दुख हँसी खुशी
सब सजती थी
दोस्ती की दीवार
बड़ी पक्की थी
बचपन से लेकर
जवानी तक
नादानियों से लेकर
रवानी तक
वो रूह में बसा था
तकदीर में सजा था
उम्र बढ़ी दोस्ती और बढ़ी
दोस्त दोस्त ना रहा
अब प्यार हो गया
मेरी हर आदत में वो
शुमार हो गया
खबर जमाने को हुई
एक कोहराम सी मची
सजा ये मिली कि दोस्त मेरा
अनजान हो गया
समय धीरे धीरे बीतता रहा
वो खुद में रम गया
और मैं जूझती रही
कभी खुद से कभी तकदीर से
मुझे जो मिला वक्त के हाथों खो गया
नसीब था दोस्तो कुछ दिन बाद
खुद ही सो गया..
ना जाने कितने मौसम बीते
राते बीती दिन बीते
लोग मिले लोग बिछड़े
वो अब याद भी नही है
कुछ याद है तो बस
वो दोस्त मेरा
जो बचपन मे मिला
और जवानी की दहलीज
में झांकने से पहले
गुम हो गया...
धन्यवाद
दिव्या पाण्डेय
गोरखपुर