गुरुवार, 13 नवंबर 2025

संवाद के घटते धागे

अक्सर संवाद के घटते धागे,
रिश्तों में उगती नयी गाँठों का संकेत होते हैं,
जहाँ पहले शब्द फूलों-से गिरते थे,
अब चुप्पियाँ काँटों की तरह चुभने लगी हैं।

कभी हँसी का आलाप था,
अब सन्नाटे की सरगम बजती है,
कभी एक नज़र समझा देती थी सब कुछ,
अब हजार बातें भी कुछ नहीं कह पातीं।

वो जो "कैसे हो?" की कोमलता थी,
अब "ठीक हूँ" की मजबूरी में बदल गयी है,
जहाँ स्नेह का मौसम था,
वहाँ अब औपचारिकता की धूप तपी हुई है।

संवाद...
वो तो रिश्तों की साँस है,
जब वो रुकती है—
रिश्ते जीते हुए भी मरने लगते हैं।

कभी-कभी,
एक छोटी-सी खामोशी,
इतनी गहरी दीवार बन जाती है
कि दोनों ओर खड़े लोग
एक-दूसरे की आवाज़ भूल जाते हैं।

गाँठें —
ये रिश्तों के भीतर की अनकही शिकायतें हैं,
जो सुलझाने की जगह
हम झोले में डालते जाते हैं,
सोचते हैं “बाद में देखेंगे…”
पर एक दिन वही झोला भारी हो जाता है।

फिर न शब्द बचते हैं,
न सुनने की चाह,
बस एक बोझ रह जाता है —
"काश उस दिन मैंने बात कर ली होती।"

संवाद के धागे गिरते हैं धीरे-धीरे,
पर गाँठें अचानक कस जाती हैं,
और जब हम उन्हें खोलने लौटते हैं,
तो धागा टूट चुका होता है।

कभी सोचना...
किसी रिश्ते की सबसे बड़ी मृत्यु
विच्छेद नहीं होती,
बल्कि वह पल होता है
जब दो लोग बोलते हुए भी
सुनना छोड़ देते हैं।

इसलिए,
जब भी संवाद का कोई सिरा गिरने लगे,
उठा लेना उसे —
क्योंकि शायद उसी सिरे से
रिश्ते की आख़िरी साँस बँधी हो।

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