क्योंकि मैंने जाना है
कि इंसान की सबसे गहरी भूख
किसी चीज़ की नहीं,
किसी अपने की होती है।
हम सब
थोड़ा-थोड़ा टूटते हैं रातों में,
और थोड़ा-थोड़ा सँभलते हैं
किसी एक आवाज़ से,
जो कह दे—“मैं हूँ।”
तुम मुझे कुछ मत देना,
न फूल, न कपड़े, न गहने…
मुझे बस ये एहसास देना
कि मेरी थकान पर
तुम्हारा नाम मरहम की तरह बैठ सकता है।
तुम तोहफ़ा भी वक़्त देना—
क्योंकि मेरा दिल
उपहारों से नहीं,
क़रीबियों से धड़कता है।
मैंने पूरे दिन की भीड़ में
अक्सर खुद को अकेला महसूस किया है।
पर तुम्हारा पाँच मिनट…
मेरे हज़ारों टूटे पलों को जोड़ सकता है।
तुम जानो…
मेरी हँसी के पीछे
कितनी रातों की नमी छिपी होती है।
और जब तुम पूछते हो—
“थकी हो?”
तो लगता है जैसे
किसी ने पहली बार
मेरी आत्मा को छू लिया हो।
तुम वक़्त दोगे न…
तो मैं शायद रोते-रोते भी मुस्कुरा दूँ,
क्योंकि जिसे हम सबसे ज़्यादा चाहते हैं
उसका साथ
दवा नहीं,
पूरी जिंदगी बन जाता है।
मैंने रिश्तों को
उपहारों में बिखरते देखा है…
पर वक़्त में सँवरते भी।
तुम एक शाम मेरे साथ बैठकर
खामोश रहोगे
तो वो खामोशी भी
मेरे लिए सबसे बड़ा गीत होगी।
दिल थकता है,
पर किसी का साथ
उसे फिर से सांस देता है।
और मैं…
सांसों की नहीं,
तुम्हारी कमी से घुटती हूँ कभी-कभी।
इसलिए—
अगर कभी देना चाहो,
तो मुझे वो देना
जिसकी कीमत नहीं लगती,
पर जिसकी कमी
दिल को उजाड़ सकती है।
तुम तोहफ़ा भी वक़्त देना…
क्योंकि तुम्हारा वक़्त—
मेरे आँसुओं की दुनिया में
एकमात्र रोशनी है।
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