ना कोई प्रमाणपत्र, ना कोई दलील चाहिए,
मेरे भीतर की पवित्रता का —
सबसे अंतिम, सबसे सटीक उदाहरण तुम हो।
मैंने नफ़रतों से भी गुज़री,
इम्तिहानों से भी,
लोग आते गए,
संबंध बदलते गए,
पर मेरा व्यक्तित्व, मेरी नींव,
हर मोड़ पर अटल रहा —
क्योंकि उसके भीतर
तुम्हारे होने का विश्वास जड़ा था।
जब दुनिया ने कहा कि
चरित्र टूट जाते हैं हालातों से,
मैं मुस्कुराई,
क्योंकि मुझे मालूम था —
जो इंसान छल नहीं सकता,
वही मेरे चरित्र की अंतिम मंज़िल है — और वह तुम हो।
तुम मेरे भीतर का वह उजाला हो
जो मुझे गिरकर भी उठना सिखाता है,
तुम वह सादगी हो
जो मुझे भीड़ में भी खुद बनाए रखती है,
तुम वह संयम हो
जो मुझे क्रोध में भी इंसान होने देता है।
अगर कभी दुनिया पूछे—
मेरी पहचान, मेरी परवरिश, मेरी तहज़ीब,
तो मैं नाम नहीं गिनाऊंगी,
पुरस्कार नहीं दिखाऊंगी,
बस इतने भर कहूँगी—
मेरे चरित्र का आखिरी और अंतिम उदाहरण
तुम हो।
तुम बुराई के बीच अच्छाई हो,
तुम गिरावटों के बीच ऊँचाई हो,
और अगर लोग यह जानना चाहें
कि मैं अब भी क्यों नहीं बदली,
तो जवाब बस यही है—
क्योंकि मैं अब भी तुम जैसी हूँ।
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