तुम्हारा चेहरा साथ चला,
हर बार मिले, हर बार बिछड़े,
हर बार दर्द वही रहा।
कभी तुमने कहा —
"शायद अगले जन्म में मिलेंगे",
और मैंने हर जन्म
तुम्हें ढूंढने की प्रतिज्ञा की।
पर इस बार थक गई हूँ मैं,
समय की सीढ़ियाँ चढ़ते चढ़ते,
भाग्य की लकीरों में
तुम्हारा नाम खोजते खोजते।
अब नहीं चाहती वो पुनर्जन्म,
जहाँ फिर तुम्हें खोना पड़े,
जहाँ फिर वही आँखें नम हों,
वही दिल टूट कर रो पड़े।
इस बार का वियोग आख़िरी है, प्रिय —
अब कोई जन्म नहीं होगा जहाँ तुम मिलो,
क्योंकि इस बार मैं तुम्हें
स्मृतियों में अमर कर चुकी हूँ।
अब तुम मेरी रूह का हिस्सा हो,
ना मिलने का ग़म भी तुम्हीं में घुल गया,
अब ना वादा, ना प्रतीक्षा,
बस एक शांत प्रेम रह गया।
अगर कोई अगला जन्म हुआ भी,
तो वहाँ मैं सिर्फ़ "मैं" रहूँगी,
ना तुम्हारी प्रतीक्षा में,
ना किसी कहानी के अधूरे पन्ने में।
इस बार का वियोग आख़िरी है, प्रिय —
अब प्रेम को मुक्त करती हूँ,
और तुम्हें भी,
कि शायद इस मुक्ति में ही
मिलने का असली अर्थ छिपा हो।
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