मैं तुम्हें एक ऐसी दुनिया दिखाती हूँ
जहाँ सूरज की पहली किरण
धरती पर नहीं—
तुम्हारी पलकों पर उगती है।
जहाँ समय घड़ी से नहीं,
तुम्हारी साँसों के उतार–चढ़ाव से चलता है,
और हर धड़कन के बीच
एक नन्हा-सा ब्रह्मांड जन्म लेता है
जो सिर्फ़ तुम्हारी आँखों में दिखाई देता है।
मैं तुम्हें वो सागर दिखाती हूँ
जिसकी लहरें पानी से नहीं—
अधूरे सवालों से बनती हैं।
जहाँ हर लहर किनारे से टकराकर
एक सच बोल जाती है
जिसे दुनिया कभी सुन नहीं पाती।
मैं तुम्हें वो पेड़ दिखाती हूँ
जो हवा से नहीं,
दिल की चुप उम्मीदों से हिलता है—
जिसकी डालों पर पत्ते नहीं,
बल्कि बीते जन्मों की यादें लटकती हैं
और हर फल भविष्य का कोई संकेत होता है।
मैं तुम्हें वो रास्ता दिखाती हूँ
जो पैरों से नहीं,
इच्छाओं से तय होता है—
जहाँ मोड़ तुम्हारे मन के अनुसार
बनते और मिटते हैं,
और मंज़िल हर पल अपना रूप बदलती है
ताकि तुम कभी रुक न जाओ।
मैं तुम्हें वो अँधेरा दिखाती हूँ
जो डर का नहीं,
बल्कि गहराई का होता है—
जिसमें उतरकर आत्मा
अपने असली रंग सीखती है,
और रोशनी
तुम्हारे भीतर से बाहर जन्म लेती है।
और आखिर में—
मैं तुम्हें खुद तुम्हारा चेहरा दिखाती हूँ,
जो दर्पण में नहीं,
मेरी कल्पना की रोशनी में चमकता है।
वहाँ तुम वैसी नहीं जैसे दुनिया देखती है—
वहाँ तुम वैसी हो
जैसा किसी ने कभी नहीं दिखाया।
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