मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017

दिल बंजारा सा

दिल बंजारा सा
घूमता आवारा सा
गलियाँ गलियाँ शहर शहर
कभी इस पहर कभी उस पहर
कभी इधर ठहर कभी उधर ठहर
दिल बंजारा सा...
जाने क्या ढूंढे जाने क्या चाहे
जाने किस तरह जाती है ये
अनजान सी गुमसुम सी राहे
ये अजनबी राहे
खड़ी है फैलाये बाहें
फिर भी दिल बंजारा सा...
हर बस्ती का एक चौराहा
चार दिशाएं ले जाए
खुशियों की दस्तक दे मुझको
वो मंजिल कैसे हम पाये
कभी रुकी रुकी कभी
भागमभाग ये दिल बंजारा सा...
नादान है दिल ना समझ है मन
बेसुध सा है जीवन का प्रण
कभी समझ के समझे
कभी उलझ गए
जाने कब संवरे
कब बिखर गए
कभी बहक बहक
कभी संभल सम्भल
ये बंजारा सा दिल
घूमता आवारा सा...

दिल की बातें

ना होठो पर शिकायत होगी
ना आँखों से शिकवे गिरेंगे।
कुछ इस तरह से तेरे हर एक
अहसान अब अदा हम करेंगे।।

तुम्हे मिला के सबसे एकदिन
दूर हम खुद से हो जाएंगे।।
ख़ुशी लाकर तुम्हारे जहाँ में
खुद दुनियां को छोड़ जाएंगे।।

कुछ इस तरह से तेरे एहसान
देख लेना तुम हम चुकाएंगे।
रश्मो कसमो से बांधो मुझको
हम रवायतों को छोड़ जाएंगे।।

मुझे किसी से भी गिला नही
सकून की बात मत कर यारो
यही वो चीज है जहाँ में जो
हर एक शख्श को मिला नही।।

#शुभसंध्या

आखिर क्यूँ

कभी चहकती चिड़िया
आज लाचार सी है
हा समाज का सच ही तो है
जो आज की नारी बीमार सी है...
कभी उसके चहचहाने से
बगियाँ गूंज जाती थी
आज खामोशियो में ही
सदियां बीत जाती है...
कभी रातें छोटी लगती थी
और दिन बड़ी सी लगती थी
अब रातें है सदियों जैसा
और दिन है तिनका तिनका सा
जीना भी अब क्या जीना है
जीवन तो है मरना सा...
जब जब उभरी शक्ति बनकर
तब तब उसका प्रतिकार हुवा
पर सच है जब जब देवी माना
तब तब समाज का उद्धार हुवा
मत भूलो की नारी माता है
जिसने नर की नीव रखी
फिर भी नर के ही कारण क्यों
आज हर नारी है बहुत दुःखी
कभी सीता बनकर हरी गयी
कभी दामिनी सी ठगी गयी
ये रूप बदलता नर ही क्यूँ
क्यूँ काली बनती नारी ना
क्यूँ आखिर क्यों?????

उम्मीद

मुझसे जलाया ना गया उम्मीदों
के पुरजे सारे।
वफ़ा के नाम पर जिसमे बेवफाई
थी लिखी।।

आसुवो को मिली सजा गिरने की
दरिया में।
खुशियों को मेरे दर्द की दवाई  थी
लिखी।।

रहनुमा जीत गया मुझसे मुझे हार
मिली।
सब्र को कब नही यहाँ जगहँसाई थी
मिली।।

खत का लिखना उसे गवारा तो नही था
शायद।
खुदा का शुक्र है की पुरजो की गवाही है
मिली।।

गजल

बोझील जिंदगी का वज़न बेवज़ह उठाते चले गए।
हर एक से रिश्ता तहे दिल से निभाते चले गए।।

मुशाफिर तो बहुत थे जिंदगी के सफर में लेकिन।
काफिर दिल को अकेले ही हम घुमाते चले गए।।

एक उम्मीद से जुड़ा था दिल मरहम तो मिलेगा।
सभीके हाथ में खंजर था और चुभाते चले गए।।

मैं अपने घाव को किसी को दिखाती भी तो कैसे।
मेरे रहनुमा भी घावो पर नमक लगाते चले गए।।

मैंने अरमानो को जलाया  फ़क़त रौशनी के लिए।
उजाले ख़ाक मिले मेहरबाँ दिए बुझाते चले गए।।

माँ बहन बेटी बहु बनकर जिंदगी कैसे गुजारती।
रिश्ते  बेमोल के थे सब पल्ला छुड़ाते चले गए।।

हर हाथ में था पत्थर और मुजरिम बनी थी मै।
अपनी मर्जी से मुझपर पत्थर बहाते चले गए।।

ऐ खुदा खुशियों से भर सकता था दामन भी मेरा।
तेरे करम से हम दामन में कंकड़ उठाते चले गए।।