जिसके बारे में वो दुनिया से नहीं,
सिर्फ खुद से बात करता है।
दिव्या का भी एक ऐसा ही सपना था—
जो उसने कभी शब्दों में ज़ाहिर नहीं किया।
क्योंकि उसे डर था—
कहीं कोई उसका सपना
छोटा न साबित कर दे।
दिव्या का सपना था—
लोगों की ज़िंदगी में अच्छाई बनकर रह जाना।
बिना नाम, बिना पहचान,
सिर्फ एहसास बनकर।
वो चाहती थी कि
उसके लिखे शब्द
किसी की थकी आँखों को आराम दें।
किसी के टूटते साहस को थाम लें।
किसी के अकेलेपन को समझ लें।
उसने कभी सोचा भी नहीं था
कि उसका लिखा
कभी किताब बनेगा,
कभी लोगों के होंठों पर ज़िक्र होगा—
उसे तो बस इतना चाहिए था
कि उसके शब्द
किसी की सांस को आसान कर दें।
कभी-कभी…
वो आईने के सामने खड़ी होकर
अपने आप से पूछती—
“क्या मैं सच में कुछ बदल सकती हूँ?”
और अंदर से एक आवाज़ आती—
“हाँ, क्योंकि तुम्हारे इरादे सच्चे हैं।”
दिव्या के भीतर
एक आग थी—
पर वो जलाने की नहीं,
आशा जलाए रखने की आग थी।
वो चाहती थी—
अगर कोई कहे “मैं हार गया”
तो उसके शब्द जवाब दें—
“नहीं… तुम अभी भी लड़ सकते हो।”
उस सपने को किसी ने देखा नहीं,
पर वही सपना
दिव्या की धड़कनों का
सबसे खूबसूरत सच था।
वह जानती थी—
हो सकता है दुनिया उसे
आज समझ न पाए,
पर किसी दिन
जब उसके शब्द किसी दिल को बचाएँगे,
तो दुनिया कहेगी—
“दिव्या थी…
जो रोशनी बनकर गुज़री थी।”
उसने आँखें बंद कीं और महसूस किया—
स्वयं में विश्वास ही
उसका सबसे मजबूत पंख है।
और अब…
दिव्या उड़ान के लिए तैयार है।
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