गुरुवार, 13 नवंबर 2025

तैयारी की तपस्या

रात के सन्नाटे में
जब शहर की आवाज़ें भी धीरे-धीरे थककर सो जाती हैं,
एक दीपक है…
जो अभी भी जलता रहता है—
तुम्हारे कमरे की मेज़ पर।

किताबें तुमसे क्या कहती होंगी, पता है?
"हम पन्ने नहीं, रास्ते हैं…
जो तुम्हें वहाँ ले जाएँगे
जहाँ तुमने कभी खुद को खड़े होते सपने में देखा था।"

तैयारी कोई पढ़ाई भर नहीं,
ये एक तपस्या है—
जहाँ आँखें नींद से लड़ती हैं
और हौसले हार से।
जहाँ थकान सिर रख देती है कंधे पर
और तुम धीरे से उसे समझाते हो—
"बस थोड़ा और…
बस आज नहीं रुकना।"

सुबह की चाय में उम्मीद की खुशबू घुलती है,
हर पड़ती रौशनी
तुम्हारे माथे पर लिखा संघर्ष पढ़ती है।
तुम्हारे हाथों पर स्याही के धब्बे
किसी कलाकार के रंग नहीं,
बल्कि उस योद्धा के घाव हैं
जो सपनों के लिए तलवार नहीं, कलम उठाता है।

एक-एक लाइन
जैसे ईंट बनकर जुड़ती जाती है,
और धीरे-धीरे
तुम अपने भविष्य की इमारत खड़ी कर रहे होते हो।

कभी लगता है
जैसे दिमाग कागज़ बन गया हो,
इतना लिखकर, इतना पढ़कर।
कभी दिल पूछता है—
“क्यों?”
तो तुम मुस्कुराकर कहते हो—
“क्योंकि एक दिन
मेहनत को पहचानने वाला आसमान
मेरे ही नाम का होगा।”

तैयारी का रास्ता लंबा होता है,
पर ठोकरें सौभाग्य की घंटियां हैं—
हर दर्द एक संकेत है
कि तुम आगे बढ़ रहे हो।

लोग कहते हैं—
सफलता किस्मत माँगती है।
तुम कहते हो—
किस्मत भी पसीने की भाषा समझती है।

जब परीक्षा का दिन आएगा
तुम्हारी आँखों में डर नहीं होगा,
क्योंकि
रातों की जागी रौशनियाँ
तुम्हारे पीछे खड़ी होंगी—
गवाह बनकर।

तब तुम समझोगे—
तैयारी ने सिर्फ जवाब नहीं सिखाए,
उसने तुम्हें तुमसे बेहतर बनाया है।

और जब तुम पर्चा खोलोगे,
कलम उठेगी
मानो उसी क्षण दुनिया कह उठे—
"अब ये जीत
सिर्फ तुम्हारी है।"

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