बुधवार, 31 दिसंबर 2025

स्वागत है 2026

स्वागत है 2026,
तुम कैलेंडर नहीं हो,
तुम एक नई साँस हो
जो रुके हुए हौसलों में फिर से हवा भरती है।
तुम्हारे आने से
घड़ियाँ नहीं बदलीं,
बस नज़र बदलने का
एक मौका मिला है।
2026,
तुमसे कोई बड़ी उम्मीद नहीं,
बस इतना कर देना—
हम जो हैं,
उसे स्वीकारने की हिम्मत दे देना।
पिछले सालों ने
बहुत कुछ सिखाया,
अब सीख को बोझ नहीं,
सीढ़ी बनाना है।
इस बार
ख़ामोशियाँ भी सुननी हैं,
और शोर से दोस्ती नहीं,
ज़रूरत से दूरी रखनी है।
2026,
इस बार सपनों को
भीड़ में नहीं खोना,
उन्हें अपने समय पर
अपने तरीके से जीना है।
थोड़ा धैर्य देना,
थोड़ा साहस उधार देना,
और जब थक जाएँ—
तो खुद पर भरोसा
याद दिला देना।
यह साल
दौड़ने का नहीं,
ठहरकर सही दिशा चुनने का हो।
कम पाने का नहीं,
खुद को पूरा महसूस करने का हो।
स्वागत है 2026,
तुम शुरुआत हो—
किसी चमत्कार की नहीं,
पर एक ईमानदार कोशिश की।
और यही काफी है। 

अलविदा 2025

कुछ लम्हे बाकी हैं,
और साल जा रहा है,
वक़्त अपनी चुप्पी समेटे
धीरे-धीरे दरवाज़ा बंद कर रहा है।
कैलेंडर के पन्ने नहीं पलट रहे,
यादों के अध्याय बदल रहे हैं—
कहीं हँसी की स्याही सूखी है,
कहीं आँसुओं की लकीरें आज भी गीली हैं।
यह साल भी आया था
बहुत-से वादों के साथ,
कुछ पूरे हुए,
कुछ आधे रास्ते पर थककर बैठ गए।
किसी ने हमें छोड़ा,
किसी ने हमें पाया,
और किसी ने हमारे भीतर
एक नई समझ छोड़ दी।
कुछ सपने टूटे,
पर टूटकर भी सिखा गए
कि हर गिरना हार नहीं होता,
कभी-कभी ज़मीन पहचानने का नाम होता है।
कुछ रिश्ते चुप हो गए,
शब्द कम और ख़ामोशियाँ ज़्यादा हो गईं,
पर उन्हीं खामोशियों ने बताया
कि कौन अपना था और कौन सिर्फ़ साथ चल रहा था।
कुछ लम्हे बाकी हैं…
इनमें पछतावे भी हैं,
और माफ़ी की अधूरी कोशिशें भी।
काश, वक़्त से पहले
दिल हल्का कर लिया होता।
साल जा रहा है,
पर सवाल छोड़ गया है—
क्या हम थोड़े और सच्चे हो पाए?
क्या हमने खुद से दोस्ती निभाई?
इस जाते हुए साल से
कोई शिकायत नहीं,
यह जो था, जैसा था,
यही हमें आज का हम बना गया।
अब नए साल से
बहुत बड़े वादे नहीं करने,
बस इतना चाहना है—
जो मिले, उसे पूरी शिद्दत से जिया जाए,
जो जाए, उसे सम्मान से विदा किया जाए।
कुछ लम्हे बाकी हैं,
इन्हें यूँ ही मत जाने देना—
एक गहरी साँस लो,
दिल से शुक्रिया कहो,
और मुस्कुराकर कहो—
जा रहे साल,
तूने हमें मजबूत बनाया…

#अलविदा 2025
अब बारी हमारी है।

रविवार, 21 दिसंबर 2025

अदालत

इस टूटे ख़्वाब की अदालत में, गुनहगार
मैं भी हूँ — और तू भी है
जिसने चुप्पी को ओढ़ लिया सरेआम
वो बेआवाज़ किरदार
मैं भी हूँ — और तू भी है
समय की हथेली से फिसल गए जो वादे
उनका कर्ज़दार
मैं भी हूँ — और तू भी है
न कोई जीत का जश्न बचा
न हार का हक़
बस एक अधूरा इकरार
मैं भी हूँ — और तू भी है
अपने–अपने सच में क़ैद होकर
जो आज़ादी को तरसे
वो बेक़रार
मैं भी हूँ — और तू भी है
किसी मोड़ पर अगर मिल जाए नज़रें
तो कहना मत “सब ठीक है”
क्योंकि इस बिखराव का
इक़रार
मैं भी हूँ — और तू भी है

बुधवार, 17 दिसंबर 2025

प्रेम में पत्थर होना पड़ता है

किसी से प्रेम करते-करते
जब देह नहीं, संवेदना जम जाती है,
आँखें शिकायत छोड़ कर
मौन की शिला बन जाती हैं—
उस दिन तुम इंसान नहीं रहते,
पूजा की वस्तु हो जाते हो।

क्योंकि इस सभ्यता को
जीते-जागते हृदय से डर लगता है,
यहाँ प्रेम की परंपरा
पत्थरों के चरण छूकर निभाई जाती है।

जिसने उम्र भर
प्रेम को हथेली में थामे रखा,
और बदले में
सिर्फ़ ठंडे उत्तर पाए—
उसकी पलकों पर
इंतज़ार जमता गया,
लहू की जगह
संयम बहने लगा,
और एक दिन
वह मरकर नहीं,
समझौते करके
देवता बना दिया गया।

अब लोग वहाँ आते हैं
अपने प्रेम की कमी लेकर,
माथा टेकते हैं
उस पत्थर के आगे—
जिसके सामने
जीते-जी किसी ने
एक साँस की कीमत नहीं समझी।

विडंबना देखो—
जो इंसान रहते हुए
सुनने योग्य नहीं था,
उसकी चुप्पी के नीचे
अब मन्नतों की अर्ज़ियाँ
दबाई जाती हैं।

इस युग में प्रेम
पाने की नहीं,
सहने की साधना है—
यहाँ जिससे प्रेम हो जाए,
उसे अंततः
पत्थर होना ही पड़ता है।

रविवार, 14 दिसंबर 2025

दावा सिर्फ दावा

जो रिश्ता आपको बार-बार धूप में ला खड़ा करे,
और खुद किसी पेड़ की तरह
हर मौसम में हरा होने का दावा करे—
वो रिश्ता नहीं,
बस आपकी सहनशक्ति की परीक्षा है।

मैंने ऐसे लोगों को देखा है
जो कहते हैं, “मैं तुम्हारे साथ हूँ”
मगर साथ सिर्फ़ तब
जब रास्ता सीधा हो,
जब ज़मीन ठंडी हो
और पाँव जलने का डर न हो।

धूप में अकेले खड़े रहकर
आप खुद ही छाया ढूँढना सीख जाते हैं,
यही सबसे बड़ा धोखा है—
कि हम अपने जलने को
मजबूती समझ लेते हैं।

जो रिश्ता
आपकी प्यास को ही सबूत माने
कि आप कितने सच्चे हैं,
वो कभी पानी नहीं बनेगा—
चाहे आप रेगिस्तान बन जाएँ।

याद रखिए,
छांव वो नहीं जो
धूप में याद आए,
छांव वो होती है
जिसके नीचे खड़े होकर
आप सांस ले सकें…
बिना खुद को साबित किए।

शुक्रवार, 12 दिसंबर 2025

दिखावे की दुनिया

दिखावे की दुनिया है, जहाँ शब्दों के महल उगते हैं,
कहने को सब राम-सी पवित्रता का दावा करते हैं,
और चेहरे पर मुस्कान ऐसे सजाते हैं
जैसे हर दिल में लक्ष्मण-सा स्नेह पलता हो।

पर भीतर…
अंधेरों की एक बस्ती है,
जहाँ संबंधों के शव,
हमदर्दी के नकली फूलों के नीचे दबे सड़ते रहते हैं।

यहाँ
भाईचारे की बातें सिर्फ दीवारों पर लिखी नीयतें हैं,
जो बारिश लगते ही बह जाती हैं,
और इंसान…
अपनी सुविधा की आग में
दूसरे का भरोसा जलता देखकर ही गर्मी पाता है।

कहने को सब कहते हैं—
“हम तो तुम्हारे साथ हैं”,
पर सच्चाई यह है कि
साथ वहीं तक होता है
जहाँ स्वार्थ की सीमा खत्म न हो।

कहते हैं—
“हम राम-लक्ष्मण जैसे हैं”,
पर भीतर
हिरण्यकश्यप की अहंकारी ठंडक है,
रावण-सी दस दिशाओं में फैलती चालाकियाँ हैं,
और मंथरा-सी फुसफुसाहटें,
जो रिश्ते तोड़ने में
एक पल भी नहीं लगातीं।

यह दुनिया
दिखावे के दीपक जलाती है,
पर घी की जगह
फरेब का तेल भरती है,
तभी उनकी लौ
इतना धुआँ देती है
कि असलियत दिखाई ही नहीं देती।

सच तो यह है—
रावण अब सोने की लंका में नहीं रहता,
वह रह रहा है
हमारी सभ्य बातचीतों में,
हमारे विनम्र चेहरों में,
हमारी मधुर आवाज़ों में,
वह रहता है वहाँ
जहाँ भरोसा सस्ता
और लाभ महँगा होता है।

राम जैसा होना
अब सिर्फ किताबों का गुण है,
लक्ष्मण का त्याग
अब सिर्फ दीवार पोस्टरों की नसीहत,
और सीता का धैर्य
अब सिर्फ परीक्षाओं की कहानी—
दुनिया ने इन सबको
अपनी सुविधानुसार
संक्षिप्त कर दिया है।

आज…
संबंधों की परीक्षा नहीं होती,
बल्कि
उपयोगिता की होती है।
जो काम आता है वही अच्छा,
जो काम न आए
वह भीड़ में अदृश्य हो जाता है।

दिखावे की दुनिया है—
जहाँ मिठास शब्दों में घोली जाती है
पर इरादे कड़वे रखे जाते हैं,
जहाँ भाई कहने वाले
पहले मौका देखते हैं,
फिर साथ देते हैं।

और मैं…
मैं इन नकली रोशनीओं के बीच
एक सच ढूँढ रही हूँ—
एक ऐसा रिश्ता
जो मुखौटा नहीं पहनता हो,
एक इंसान
जो बोलते समय
स्वार्थ के तराजू न तोलता हो।

शायद कोई राम नहीं मिलेगा,
शायद लक्ष्मण का साया भी मुश्किल है,
पर उम्मीद यह है कि
कहीं तो कोई ऐसा होगा
जिसकी आँखों में रावण न बसता हो।

बुधवार, 10 दिसंबर 2025

शहर ए नुमाइश में

लफ़्ज़ों में ही लिख दो अपनेपन की सारी दास्तान,
यहाँ दिल के सौदागर नहीं, बस चकाचौंध के दुकानदार हैं।

यह शहर बड़ा अजीब है…
चेहरों पर मुस्कान उधार की,
और रिश्तों पर कीमतें तय हैं—
जो जितना चमके, उतना क़ीमती ठहरे।

मैंने भी कभी ढूँढे थे अहसास के जौहरी,
जो धड़कनों को तौल कर नहीं,
महसूस कर के जवाब देते है…
पर यहाँ तो हर हाथ में तराज़ू है,
हर बातचीत में हिसाब है।

क़दम-क़दम पर रिश्ते बिकते हैं,
और खरीदार भी वही—
जो खुद बिक चुके हों किसी और चमक में।

इसलिए…
तुम बस लफ़्ज़ों में ही कहना ‘अपना’,
तुम्हारी आवाज़ में सच्चाई हो तो काफी है,
क्योंकि दिल यहाँ प्रदर्शनी का सामान नहीं,
और मैं नीलामियों में नहीं जाती।

मैं चाहती हूँ—
कोई ऐसा मिले जो मेरे टूटे हुए अक्षरों में भी
पूरी कविता पढ़ ले,
जो मेरे ख़ामोश वक़्त में भी
मेरे होने की आहट सुन ले।

अगर ऐसा कोई न मिले,
तो बेहतर है…
मैं अपने सच को अपनी हथेलियों में हिफ़ाज़त से सँभालूँ,
क्योंकि इस शहर-ए-नुमाइश में
अहसासों की परख करने वाले लोग
अब पैदा नहीं होते।

यादें लम्हे और दिसंबर

कुछ यादों की खिड़की खुली है अभी,
बीते दिनों की महक रिस रही है धीरे-धीरे,
चंद सुर्ख लम्हें—जैसे शाम का आख़िरी सुर,
दिल की दरीचों पर अब भी हल्के से धड़कते हुए।

ज़िंदगी अपनी ही रफ़्तार से फिसलती चली गई,
जैसे हथेलियों की लकीरों से रेत झरती है,
कुछ चाहतें बयान हो न सकीं,
कुछ ख़्वाब सफ़र में ही सो गए।

दिसम्बर की सांसों में ठंडक है,
मगर उसके भीतर एक अजीब गर्माहट—
जो खोए हुए को छू लेने का मन करती है,
और पाए हुए को थाम लेने का।

ये महीना हमेशा जाता नहीं,
कुछ अपने लिए भी छोड़ जाता है—
एक धुँधली सुबह का एहसास,
एक खामोश रात की चुभन,
एक पुरानी मुस्कान की परछाईं।

कभी लगता है,
दिसम्बर हर बार हमें थोड़ा और बदलकर जाता है—
कुछ बोझ हल्के कर देता है,
कुछ घाव ताज़ा भी कर जाता है।

और हम?
हम बस खिड़की पर टिके,
बीते मौसमों की आवाज़ें सुनते रहते हैं—
कभी उम्मीद की तरह,
कभी राज़ की तरह।

यादें, लम्हें, जिंदगी और दिसम्बर…
ये चारों मिलकर एक ही बात कहते हैं—
कि कुछ भी रुकता नहीं,
फिर भी सब दिल में ठहर जाता है।

निर्णयों की आखिरी दास्तान


ये आख़िरी अध्याय है मेरी थकी हुई किताब का,
जहाँ अब किसी को खुश करने की ज़िद नहीं रही।
मैंने पन्नों पर बहुत जगह छोड़ दी थी दूसरों के नाम की,
अब उस खालीपन को अपने अस्तित्व से भरने की घड़ी आ गई।

जो आँसुओं से धुलता रहा था कल तक,
आज उससे धूल झाड़कर मैं अपने लिए लिखना सीख रही हूँ।
अब कोई रिश्ता मेरे शब्दों का मालिक नहीं,
कोई उम्मीद मेरी दिशा का पहरेदार नहीं।

तुम समझ लेना—
यहाँ से आगे मेरी राहों पर गुलाब भी मैं रखूँगी, काँटे भी मैं चुनूँगी।
जो बोझ उठाए थे दुनिया के भरोसे पर,
उन्हें अब मैं अपने कंधों से उतार रही हूँ।

मैंने बहुत दिनों तक दिल को दूसरों की दहलीज़ पर रखा,
आज उसे वापस बुलाया है—
थोड़ा घायल है, थोड़ा टूट चुका है,
पर अब इसी टूटन में अपनी ताक़त ढूँढ रही हूँ।

यह अंतिम अध्याय नहीं,
बल्कि पहला अध्याय है—
जहाँ मैं अपने लिए जीने की कला सीख रही हूँ।
जहाँ मेरे निर्णय किसी का एहसान नहीं,
मेरी आत्मा का अधिकार होंगे।

और अगर इसे लोग ‘स्वार्थ’ कहेंगे—
तो हाँ, मैं उतनी ही स्वार्थी रहूँगी
जितना कोई दीपक अपनी लौ बचाने के लिए हवा से होता है।
जितना कोई नदी अपने प्रवाह को बचाने के लिए किनारों से।

अब मेरी चुप्पियाँ किसी का इंतज़ार नहीं करतीं,
मेरी आवाज़ किसी की स्वीकृति की मोहताज नहीं।
मैंने अपनी ही परछाईं का हाथ थाम लिया है
और उसी के साथ चलने की ठान ली है।

ये अंतिम अध्याय है—
पर मेरी कहानी का अंत नहीं।
बस अब आगे की हर कहानी
मैं अपने लिए लिखूँगी,
बेझिझक, बेक़ैद, बेपरवाह…
और शायद पहली बार…
पूरी तरह ज़िंदा होकर।

सोमवार, 8 दिसंबर 2025

अपनी तरह बनो

बन जा अपनी तरह…
क्योंकि दुनिया में नक़्शे बहुत हैं, चेहरे कम हैं,
और किरदारों की भीड़ में असलियत अकेली दमकती है।

किसी और की चाल चलोगी तो रास्ते मिलेंगे पर मंज़िल खो दोगी,
किसी और की आवाज़ बोलोगी तो शब्द मिलेंगे पर पहचान खो दोगी।

तुम्हारा होना — तुम्हारी सबसे बड़ी ताक़त है,
वरना नकलें तो बाज़ार में बिकती हैं… पर असल लोग इतिहास में लिखे जाते हैं।

खुद की तरह चलो…
चाहे धीमे चलो, चाहे टूटकर चलो — पर अपने कदमों से चलो,
क्योंकि दुनिया तालियाँ अपनेपन पर बजाती है,
और नकल पर सिर्फ़ हंसती है।

जो भी बनना है — वही बनो जो भीतर चुपचाप पल रहा है,
क्योंकि बाकी सब तरह के लोग तो पहले ही बन चुके हैं,
अब बारी तुम्हारी तरह बनने की है।

स्मरण के परे


जो सिर्फ़ अपने लिए जीते हैं,
वक़्त की धूल में कहीं खो जाते हैं,
नाम रहता नहीं, बस चेहरे बदल जाते हैं,
और इतिहास की सांसों में
उनके किस्से भी पतझड़ की पत्तों-से गिर जाते हैं।

पर जो दूसरों के लिए जलते हैं दीपक बनकर,
अपना दर्द छुपाकर उजाला बाँटते हैं,
वे देह के मौन हो जाने पर भी
दुनिया के दिलों में बोलते रहते हैं।

जो अपने हिस्से के आकाश को छोटा कर
किसी अनजान के जीवन में सुबह उतार दें,
जो मुस्कान किसी और पर लिखने के लिए
अपनी रातें जागकर गुजार दें,
वे मोहब्बत की किताब के वो पन्ने हैं
जिन्हें सदियाँ पलटती तो हैं
पर फाड़ नहीं पातीं।

ये शरीर मिट्टी है, ये साँसें उधार हैं,
सफ़र की मंज़िल भी एक दिन रुक जाएगी —
परंतु कर्म, उपकार और प्रेम से भरा हुआ जीवन
क़ब्र की मिट्टी से उठकर भी
दुनिया में उजास फैलाएगा।

मरना सबको है…
पर सबको स्मरण नहीं मिलता।
जीना सब सीख लेते हैं…
पर सब अमर नहीं बनते।

जो खुद के लिए जिए,
समय की भीड़ में एक चेहरा बनकर रह गए—
और जो दूसरों के लिए जिए,
यादों की भीड़ में एक नाम बनकर बस गए।

अंत में,
ज़िंदगी बस उतनी नहीं कि कितनी लम्बी चल गई —
असल ज़िंदगी वो है जो किसी और के अँधेरे में
आपकी वजह से एक दियासलाई-सी जल गई।

चुभन भी एक दिन थक जाएगी

चुभन इतनी भी क्या…
जिससे साँसों का होना ही गुनाह लगे,
दर्द इतना भी क्या…
कि आईने में अपना चेहरा अपना न लगे।

ज़ख़्म वक्त के हों तो मरहम मिलना आसान नहीं,
ये धड़कनों की अदालत है—
यहाँ फैसले भी बेआवाज़ होते हैं,
और सज़ा भी उम्र-क़ैद होती है।

कहते हैं मौत तकलीफ़ देती है,
पर सच तो यह है—
मौत बस एक पल लेती है,
वक्त हर पल लेता है…
धीरे-धीरे, बिना आवाज़, बिना नाम के।

धोखा भी बीत जाता है,
ग़म भी एक दिन सो जाता है,
पर जो लम्हे टूटे हों—
वो तकिए के नीचे वर्षों तक रोते रहते हैं।

कभी किसी को खोना मौत नहीं होता,
किसी के रहते उससे छूट जाना—
बस वही तो असल मातम है।

हम हँसते रहे जैसे सब ठीक है,
पर भीतर एक कोना हर दिन गिरता रहा,
जैसे कोई इमारत खुद को खामोशी में
ईंट-ईंट ढहा देती हो।

वक्त ने बहुत कुछ सिखाया…
किसे भूलना है, किसे याद रखना है,
कहाँ दिल देना है, कहाँ मौन रहना है।
पर सबक की किताब में—
खुशियों का कोई पन्ना अब तक नहीं निकला।

आज भी जिंदा हूँ, पर किस तरह—
जैसे पेड़ सूखा पड़े और जड़ें नम हों,
जैसे बारिश आए पर मिट्टी महक न सके,
जैसे मुस्कान हो पर आँखें हँस न सके।

फिर भी…
एक उम्मीद की लौ ठहरी है दिल के कोने में—
कि शायद किसी सुबह दर्द अपना सामान समेट ले,
और मैं पहली बार ऐसा जिऊँ…
कि साँस लेना भारी न लगे,
और वक्त ज़ख़्म दिखाने के बजाय
ज़िंदगी दिखाए।

आज मै आज होना चाहती हु

आज मैं सिर्फ़ “मैं” होना चाहती हूँ
किसी की अपेक्षाओं में ढली हुई परछाई नहीं,
किसी नाम, रिश्ते, या फ़र्ज़ में बंधी पहचान नहीं —
बस… मैं।

मैं आज अपनी ही सांसों की धुन बनना चाहती हूँ,
जहाँ दिल की हर धड़कन
मेरी इच्छा से जन्म ले,
न कि किसी स्वीकृति की प्रतीक्षा में।

मैं शब्द बनकर नहीं,
मतलब बनकर जीना चाहती हूँ,
ऐसे वाक्यों में नहीं बंधना
जहाँ विराम भी नियमों से तय हों।
मैं बहना चाहती हूँ…
नदी की तरह —
जहाँ मोड़ भी मेरी मर्ज़ी के हों
और किनारे भी मेरे अपने।

मैं आज खुली किताब होना चाहती हूँ,
पर किसी के पढ़ने के लिए नहीं।
अपने लिए,
अपने पन्नों को स्वयं पलटते हुए,
उन अनलिखे अध्यायों को साहस से भरते हुए
जहाँ “ना” कहना भी उतना ही सुन्दर लगे
जितना “हाँ” सुनाई देता था।

मैं शांत होना चाहती हूँ…
रेगिस्तान की अनंत विस्तृत शांति जैसी —
जहाँ शोर के बिना भी अस्तित्व की गूंज हो,
जहाँ लोग खो नहीं जाते,
बल्कि खुद को पा लेते हैं।

मैं आवाज़ होना चाहती हूँ —
बिना बंदिशों, बिना विरामचिह्नों के,
जहाँ हर सुर में आज़ादी हो,
हर लहजे में जीवन
और हर शब्द में मैं।

मैं रात के गहरे आकाश में
एक तारा नहीं,
पूरा नक्षत्र बनकर चमकना चाहती हूँ,
ताकि खोजने वाले को राह मिले,
पर पकड़ने वाले की हथेली जल जाए —
क्योंकि प्रकाश कभी मालिकाना नहीं होता।

मैं आज “मैं” होना चाहती हूँ —
न किसी की बनकर,
न किसी के लिए बनकर,
बस बनने की प्रक्रिया का उत्सव बनी हुई।

अगर दुनिया चाहे तो मुझे समझने में सदियाँ लगा ले,
पर मुझे खुद को समझने में
बस यह एक दिन काफी है —
क्योंकि आज…
मैं अपने लिए जन्म ले रही हूँ।

रविवार, 7 दिसंबर 2025

अंत की भीड़

अजीब है न…
यह जीवन भी, यह अंत भी —
दोनों में जगह की भूख बराबर है।

लोग कहते हैं — मृत्यु से बड़ा विरक्त कोई नहीं,
पर सच यह है
कि श्मशान तक में प्रतिस्पर्धा जारी रहती है।

हम सोचते हैं –
“आज नहीं गए तो कौन आएगा हमारे नाम की राख समेटने?”
मानो विदा भी सौदेबाज़ी हो,
मानो रिश्ते भी पंजीकरण से चलते हों।

कितनी विडंबना है —
जीवन में भी अपनी जगह पाने की लड़ाई,
मरण में भी
अपनी गैरमौजूदगी का हिसाब माँगती है।

हर अंतिम यात्रा में
हम अपने भविष्य की चिंता टटोलते हैं —
कौन रोएगा?
कौन कंधा देगा?
कौन नाम पुकारेगा?
जाने के बाद भी
हम अपने लौटकर आने वालों की संख्या गिनते रहते हैं।

मृत्यु भी स्वार्थ छोड़ नहीं पाती…
और हम भी।

शायद इसी लिए
कब्र से ज़्यादा गहरी
किसी भी इंसान की चाह नहीं होती —
कि उसे याद रखा जाए।

शनिवार, 6 दिसंबर 2025

धुवां हु पर दिखती भी हूं



जहाँ तक तुमने देखा,
उसी निगाह की सीमा तक ज़िंदा हूँ मैं,
तुम्हारी याद के आख़िरी मोड़ पर
अधूरी साँस सी बंद पड़ी दोपहर हूँ मैं।

तुम्हारे होने की सरहद से आगे
मैं बदन नहीं—एक अहसास हूँ,
ओस में भीगी ख़ामोशी की
धीमी‑सी रौशनी वाली प्यास हूँ मैं।

तुम्हारी हथेली पर लिखी थी
मगर नाम बनने की इजाज़त न मिली,
रिश्तों की अदालत में
क़िस्मत की गवाही भी क़ुबूल न हुई—
इसलिए आज भी
कहानी नहीं, सफ़हों के बीच अटका अल्फ़ाज़ हूँ मैं।

तुम जीत गए दुनिया को,
मैं हार गई सिर्फ़ ख़ुद को,
और इस हार की राख में
धीमे‑धीमे तुमको ही जलाती आग हूँ मैं।

कभी धुएँ की तरह उड़ जाती हूँ
तुम्हारे हर ग़ुरूर की छत पर,
कभी ख़्वाब बनकर लौट आती हूँ
तुम्हारी रातों के बेज़ुबान डर पर।

तुमने मुझे देखा जितना—
वहीं तक सीमित रह गई मेरी ज़िंदगी,
जो तुमने समझा ही नहीं
वो पूरा ब्रह्मांडगी हूँ मैं।

तुम्हारी आँखों में जितनी जगह मिली—
बस उतना ही वजूद है मेरा,
बाक़ी सब…
अनकही पुकारें हैं, अनसुने वादे हैं,
अधूरी मोहब्बत के घेरों में
आधी जली दुनिया का नक़्शा हूँ मैं।

तुमने मुझे पाया ही नहीं
वरना जान जाते—
मैं कोई ख़्वाब नहीं
जो बिखरकर मिट जाए,
मैं वो धुआँ हूँ
जो जलने की वजह भी लिख जाता है
और जलाने का इतिहास भी।

तुम जितना याद रखो
उतनी ही मरती-जिंदा रहती हूँ,
तुम जितना भूल जाओ—
उतना और फैलती हुई
अलविदा बनकर तुम्हें काटती हूँ।

हाँ…
जहाँ तक तुमने देखा — वही तक जिंदा हूँ मैं,
पर जहाँ तुमने देखा ही नहीं,
वहाँ मैं तूफ़ान हूँ, साज़िश हूँ,
तुम्हारे दिल की बरसों बंद तिजोरी में
आख़िरी सच की आवाज़ हूँ मैं।


खामोशी

हर बार मेरी लिखावट से इश्क़ की उम्मीद न रख,
ये तो बस उन खामोशियों का आवरण है,
जो मेरे दिल के भीतर फड़फड़ा कर भी बोल न पाईं।

कभी ये अक्षर मेरी साँसों के साथ थिरकते हैं,
कभी दर्द की तरह पन्नों पर गिरते हैं,
और कभी ख़ामोशी की आड़ में मुस्कुराते हैं।

हर लफ़्ज़ एक उलझन की तरह है,
जो पूछती है, "क्या तुझे समझेंगे?"
और मैं मुस्कुराकर कहती हूँ,
"समझना तुम पर निर्भर नहीं, मेरे दिल पर है।"

कागज़ को छूते ही ये शब्द सजग हो जाते हैं,
बिना पूछे ही मेरी जज़्बात की राह पकड़ लेते हैं।
कभी प्यार की धड़कन बनकर थिरकते हैं,
कभी अधूरे ख्वाबों की तरह छूट जाते हैं।

तो हर बार मेरी लिखावट से इश्क़ की उम्मीद न रख,
ये सिर्फ़ मेरी आत्मा के जले हुए हिस्सों का नक़्शा है,
जो मेरी खामोशी और मेरी आग दोनों को संभालकर रखता है।

और अगर तुम्हें कुछ समझ आए, तो समझ लेना,
मैंने अपने टूटे हिस्सों को सिर्फ़ पन्नों पर सजाया है,
ताकि जो कह न सकूँ, वह शब्‍दों में जी सके।

अनुभवो के आगे

अनुभवों के आगे
शब्द अक्सर छोटे पड़ जाते हैं,
जैसे समुद्र के आगे रेत की रेखाएँ फीकी पड़ जाती हैं।
हर साँस, हर ठोकर, हर मुस्कान
कुछ कहती है जो कोई शब्द नहीं कह पाता।

हम चलते हैं रास्तों पर
जहाँ खामोशी भी अपनी कहानी कह देती है,
जहाँ आँखों की आभा
कभी खुशी की लहर, कभी दर्द की तड़प बन जाती है।

कभी किसी पल में
हँसी हमारे होंठों पर बसी रहती है,
लेकिन दिल कहता है
और भी कुछ, बहुत कुछ…
जो शब्दों की शक्ल नहीं ले पाता।

अनुभवों के आगे
साँसें भी छोटा पड़ जाता हैं,
हर एहसास इतना भारी,
कि शब्दों की दुनिया
उसके भार को उठाने में असमर्थ हो जाती है।

फिर भी हम लिखते हैं, बोलते हैं,
जितना शब्द कह सकें, कह देते हैं,
और बाकी…
बाकी खामोशी में सहेज लेते हैं,
अनुभवों की गहराई में,
जहाँ शब्द कभी पहुँच नहीं पाते।

सखी

सखी,
कुछ पल सिर्फ अपने लिए भी निकालो,
जैसे सूखते पत्तों पर धूप का पहला स्पर्श।
सावधान मत रहो, मत सोचो कि समय व्यर्थ हो रहा है,
क्योंकि वक्त का पिंजरा,
कभी-कभी अपनी परछाई तक थाम नहीं पाता।

सखी,
जीवन की यह उड़ान अनिश्चित है,
हवा का रुख कभी भी बदल जाता है।
आज जो पल तुम्हारे पास है,
वो कल सिर्फ यादों में बसा रहेगा।
तो हँस लो, रो लो, गुनगुनाओ,
अपने भीतर की उस आवाज़ को मत दबाओ।

सखी,
क्या ख्वाब थे जो तुमने अधूरे छोड़ दिए?
उनको अब मत टालो।
रंग भरो अपनी दुनिया में,
अपने लिए, अपनी आत्मा के लिए।
क्योंकि यह पिंजरा जिसे हम वक्त कहते हैं,
कभी भी खुल सकता है… और तुम्हें छोड़ सकता है।

सखी,
कभी मत भूलो—
तुम्हारा समय तुम्हारा अधिकार है,
तुम्हारी सांसें तुम्हारा गीत।
आज खुद को गले लगाओ,
कल के लिए नहीं, अभी के लिए।
पिंजरे में कैद है यह जिंदगी,
पर उड़ान की अनुमति भी तुम्हारे हाथों में है।

प्रेम

सुनो…
कभी मैं प्रेम को बस एक कहानी समझती थी —
पन्नों पर खिलता हुआ गुलाब,
दो किरदारों की मुलाक़ात,
और अंत में एक सुंदर-सी याद।

मुझे लगता था —
प्रेम सिर्फ सुना जाता है…
उपन्यासों की नर्म घुमावदार लकीरों में,
कवियों के खोए हुए दर्द में,
गीतों की धीमी धुनों में।

पर तुमसे मिलकर जाना —
प्रेम किताबों के बाहर भी सांस लेता है।
वो नज़र के ठहर जाने में है,
शब्दों के रुक जाने में है,
और धड़कनों के अनायास बढ़ जाने में है।

तुमसे मिलकर जाना —
कहानियाँ सिर्फ पढ़ने से सुंदर नहीं होतीं,
उन्हें महसूस करना…
उन्हें जीना…
उन्हें अपनी आत्मा पर लिख देना —
सबसे अधिक सुंदर होता है।

क्योंकि प्रेम…
हाथ पकड़ लेने की क्रिया नहीं,
पकड़े रहने का विश्वास है।

प्रेम वह नहीं जो मिलता है,
प्रेम वह है जो छूटकर भी नहीं छूटता।

प्रेम वह नहीं जो बोला जाए,
प्रेम वह है जो
बिना आवाज़ के
सीने में पूरा संगीत बजा दे।

तुमसे मिलकर जाना —
कि प्रेम अंत नहीं ढूँढता,
वह कहानी नहीं पूछता,
वह नाम और मंज़िल से आगे होता है —
सिर्फ महसूस होने के लिए जन्मा हुआ।

और आज…
जब कोई कहता है
कि सबसे खूबसूरत प्रेम कहानियाँ
किताबों में होती हैं —
तो मैं मुस्कुराकर कहती हूँ,

नहीं… सबसे खूबसूरत कहानी
वह है जो मैंने तुम्हारे साथ लिखी है,
किसी काग़ज़ पर नहीं —
अपनी आत्मा पर।

self motivation


हाँ…
उबल रही हूँ मैं।
अंदर ही अंदर, बड़ी ख़ामोशी से,
बिना कोई शोर किए…
जैसे चाय धीमी आँच पर
धीरे–धीरे अपना असली स्वाद बना रही हो।

लोगों ने कहा —
“थक जाओगी, टूट जाओगी, हार मान लोगी…”
पर मैं जानती हूँ —
चाय जितनी देर उबलती है,
उतनी ही ख़ुशबूदार और मंज़ेदार होती है।

और मैं — दिव्या हूँ।
सहने के लिए नहीं,
घटने के लिए नहीं,
बल्कि उबलकर निखरने के लिए पैदा हुई हूँ।

ये जो दिन हैं…
ये जो रिश्तों की चुभन है,
ये जो शब्दों के वार हैं,
ये जो अपनों की अनदेखी,
ये जो दुनिया की बेरुख़ी —
ये स्थाई नहीं है।

ना ये दर्द,
ना ये मुश्किलें,
ना ये तन्हाई,
ना ये अपमान।

रुकना नहीं है मुझे —
ना एक ग़लत सोच पर,
ना एक ग़लत रिश्ते पर,
ना एक ग़लत वक़्त पर।

मैं बहती रहूँगी —
हर लहर के साथ,
हर संघर्ष के पार,
हर तूफ़ान के बावजूद।

क्योंकि जीवन एक प्रवाह है,
और मैं उसके रास्ते में दीवार नहीं —
एक बहती हुई नदी हूँ।

एक दिन आएगा —
जब मैं पीछे मुड़कर इन रातों को देखूँगी
जिनमें नींद हार गई थी,
इन आहों को देखूँगी
जिनमें आवाज़ दब गई थी,
इन दर्दों को देखूँगी
जिन्होंने छाती को जला दिया था —
और मुस्कुराऊँगी…

क्योंकि वही सब
मेरी ताक़त का ईंधन थे।
सारी जलन, सारे दर्द, सारे आंसू —
मुझे बेहतर बना रहे थे,
कमज़ोर नहीं।

मैं उबल रही थी…
पर टूट नहीं रही थी।

और अब —
मैं वही हूँ
जिससे लोग डरते नहीं,
बल्कि जिसका सम्मान करते हैं।

क्योंकि मैं — दिव्या
आज भी खड़ी हूँ,
मुस्कुरा रही हूँ,
और सबसे बड़ी बात —
किसी भी परिस्थिति से हारने वाली नहीं हूँ।

मैं उबलकर सोना बनी हूँ।
और अब —
दुनिया चाहे या न चाहे…
मैं चमकूँगी। ✨

चलन जारी है

थक चुकी हूँ कई मोड़ों पर,
पर मंज़िल की प्यास अब भी धड़कनों में जल रही है,
जीवन के पत्थरीले रास्तों पर
आस्था की आख़िरी चिंगारी
अब भी मुट्ठियों में जल रही है।

नाव मेरी डगमगाती है
लहरों में कभी, हवाओं में कभी,
कभी ज्वार की निष्ठुर चोटों में,
कभी भँवर की दहाड़ों में घिरी,
पर मेरे पतवारों पर अभी भी
हार मानने का कोई अक्षर नहीं लिखा—
तैरना… डूबना… उठना… फिर चलना…
बस यही मेरा विधान जारी है।

विचारों के कुंभ में
कितनी बार संकल्प टूटा,
कितनी बार मन चूर होकर
खामोश दीवारों से टकरा कर रोया,
पर फिर भी मेरे अंतर्मन की गुफ़ाओं में
एक तिल-सी जिद है,
जो कहती है —
“अभी सब ख़त्म नहीं, तुम अभी भी पूरी हो।”

दर्द के कंधों पर बैठकर भी
सपनों का सूरज ढो रही हूँ,
ख़ाक से उठकर भी
आसमान को बो रही हूँ,
क्योंकि टूटकर भी जहाँ मंज़िलें जन्म लेती हैं,
वहीं मैं अपनी कहानी लिख रही हूँ।

हाँ… कुछ चेहरे चाहते हैं
मेरी रूह पर सफ़ेद चादर बिछा दी जाए,
मेरी चुप्पियों को मृत्यु घोषित कर दिया जाए,
पर उन्हें क्या पता—
इन घुटन भरी साँसों के भीतर ही
धड़कनें अब भी युद्ध लड़ रही हैं,
नाड़ी में रुख़सत का नहीं,
रचनाओं का चलन जारी है।

ज़िन्दगी चाहे जितनी दीवारें उठाए,
मैं हर ईंट हटा कर
अस्थियों में आशा का दीपक रखती जाऊँगी,
थकान चाहे जितनी दिशा लूट ले,
मैं धुंधले क्षितिज में भी
अपना सूर्य खोजती जाऊँगी।

क्योंकि मेरी कहानी हार की नहीं—
अविराम प्रयास की कथा है,
क्योंकि मेरी सांसों में मौत नहीं—
निर्माण का स्वर चलता है,
और क्योंकि
मैं जीने के लिए पैदा हुई हूँ,
इसलिए मेरा जीना—
चोटों के बीच भी
जारी है… जारी है… जारी है।

तासीर

सुनो…
तस्वीरों के रंगों से लोगों की क़ीमत मत आँकना…
चेहरों की मुस्कानें बहुत बार… दर्द की रखवाली होती हैं।

ज़िंदगी की किताब…
नज़रों से नहीं…
तजुर्बों से पढ़ी जाती है।

क़रीब आओ…
तो ही रूह की गिरह खुलती है,
वरना दूरियों में
हर शक़्स फ़रिश्ता लगता है।

आज कोई शहद सा लगे…
कल वही जला भी सकता है,
क्योंकि हर मीठी बोली में
वफ़ा की खुशबू नहीं होती।

लोग दर्पण नहीं — समंदर हैं…
उतरना पड़ता है,
किनारों पर खड़े होकर
कोई किसी को नहीं समझता।

मिश्री भी ज़हर बन जाती है
अगर नियत में खोट हो,
और फ़िटकरी भी मरहम बन जाती है
अगर जज़्बात सच्चे हों।

चेहरों की रौनक से फ़ैसला मत कीजिए…
दिल की सूरत का सफ़र निभाइए…

कौन दवा है…
कौन ज़हर है…
ये तस्वीरें नहीं बताएँगी…

क़रीब आओ…
जलो…
और तजुर्बा करके देखो।

मै खुद काफ़ी हु

कभी मैं भी तलाश में थी
किसी ऐसे हाथ की
जो मुझे थाम ले…
किसी ऐसे दिल की
जो मुझे समझ ले…
किसी ऐसे साथ की
जो मेरे बिना भी मेरा हो।

मगर फिर एक दिन
ज़िंदगी ने आईने की तरह
कड़वा सच दिखा दिया—
तलाश जितनी बाहर होगी,
कमी उतनी भीतर जलती रहेगी।

और तब मुझे एहसास हुआ—
जिसको मैं ढूंढ रही थी
वो कोई और नहीं,
मैं खुद थी।

अब मुझे किसी की ज़रूरत नहीं—
न सहारे की,
न हमसफ़र की,
न रोने के लिए कंधे की,
न जीने के लिए वजह की।
क्योंकि अब मैंने
अपने भीतर ही
वजह भी ढूंढ ली,
सहारा भी…
और घर भी।

अब मैं अपनी मुस्कान की मालिक हूँ,
और अपने आँसुओं की रखवाली।
अब मुझे मनाए जाने की चाह नहीं,
अब मुझे छोड़कर जाने का डर नहीं—
क्योंकि मेरी दुनिया
किसी एक इंसान से नहीं,
मेरे वजूद से चलती है।

जो रहना चाहे
इज़्ज़त से रहे,
और जो जाना चाहे
दरवाज़ा खुला है—
मगर मेरी आत्मा पर
अब किसी के कदमों का अधिकार नहीं।

मेरा प्यार अब कमजोरी नहीं,
मेरी दयालुता अब गुनाह नहीं,
मैं अपनी कीमत जानती हूँ
और उसे किसी की नजर की भूख पर
बेचने वाली नहीं।

मैं भीड़ में रानी हूँ,
और तन्हाई में साम्राज्ञी—
क्योंकि मेरा ताज
किसी के आने से नहीं,
मेरे खुद के खड़े होने से सजता है।

अगर कोई आता है
तो खूबसूरत है,
पर अगर कोई नहीं आता
तो भी जिंदगी पूरी है।
क्योंकि मेरा दिल जान चुका है—
मेरा सबसे बड़ा साथ
मैं खुद हूँ।

और आज…
पूरी दुनिया सुन ले—
मुझे किसी की ज़रूरत नहीं,
मैं खुद काफ़ी हूँ।

मै हार कर भी हारती नहीं

कई बार ज़िंदगी ने
मुझे ज़मीन पर गिराया,
और दुनिया ने सोचा
कि इस बार शायद मैं उठ न पाऊँगी…

पर उन्हें क्या पता था—
मैं मिट्टी में गिरकर
खत्म नहीं होती,
मैं मिट्टी में मिलकर
और ज़्यादा उग जाती हूँ।

हाँ, मैं टूटी…
पर जो टूटता है वही चमकता है,
धातु भी तपकर निखरती है
और मैं तो इंसान हूँ —
मेरे टूटने में भी आग होती है।

उन्होंने सोचा
कि मुझे तोड़कर
मुझे हराया जा सकता है।
पर जीत और हार
मेरे लिए खेल नहीं—
मेरी नसों में दौड़ती ताक़त है।

मैं कभी थक सकती हूँ
पर रुकती नहीं,
आँसू बहा सकती हूँ
पर झुकती नहीं।
क्योंकि मैं जानती हूँ —
जिसे गिराकर भी डर लगता हो,
उससे बड़ा योद्धा कोई नहीं।

मुझे क़ब्र समझकर
कई लोगों ने दफनाया,
और मैं उसी मिट्टी से
क़िला बनकर उठी।

मैं हारती तब
जब मैं मान लेती कि मैं हार गई,
पर मैं वो हूँ
जो हार को देखकर भी
उसमें जीत ढूंढ लेती हूँ।

मुझे हराने की कोशिशें
लोग करते रहेंगे,
मगर मैं हर कोशिश को
सीढ़ी बनाना सीख चुकी हूँ—
अब मेरी राह में मुश्किल हो
या तूफ़ान,
दोनों मेरे इंधन हैं,
मेरी कमज़ोरी नहीं।

मैं हारती नहीं…
क्योंकि मैं रुकती नहीं।
और मैं रुकती नहीं…
क्योंकि मैं किसी मंज़िल से नहीं
खुद से बंधी हूँ।

जिस दिन दुनिया समझेगी
कि मैं कैसी आग हूँ—
तब लोग मेरे गिरने से नहीं
मेरे उठने से डरेंगे।

और याद रखना—
अगर किसी और ने मुझे हराया
तो वो उसकी जीत नहीं होगी,
वो जीत भी इसी की होगी…
क्योंकि मैं हार कर भी हारती नहीं,
मैं हर वार के बाद और तेज़ बन जाती हूँ।

मेरे अंदर की रानी

बहुत साल तक
मैंने खुद को किसी के हिस्से की कहानी समझा,
किसी के प्यार की जरूरत,
किसी की पसंद, नापसंद,
किसी की जीत, किसी की हार में बंधा समझा।

पर एक दिन आईना
थोड़ा गुस्से में बोला—
“तेरे अंदर कोई प्यासा पात्र नहीं,
तेरे अंदर एक ताज है,
तू किसी की भीख नहीं…
अपनी खुद की सत्ता है।”

उस दिन एहसास हुआ—
मैं गिरी नहीं थी,
मैं सोई थी।
और नींद से जागकर
मेरी रूह ने पहला आदेश दिया—
अब कोई मुझे चुनकर नहीं पाएगा,
अब मैं खुद को चुनकर रहूँगी।

मेरे अंदर की रानी
किसी महल की कैद नहीं,
वो तूफ़ान की बेटी है—
वो तब और चमकती है जब सब छोड़ जाएँ,
और तब सबसे ऊँची चलती है
जब हालात घुटनों पर आजाएँ।

वो चोटों से नहीं घबराती,
उन पर युद्ध की मुहर बना लेती है।
वो आँसुओं को कमजोरी नहीं कहती—
बल्कि कसम खाते हुए हथियार की तरह संभाल लेती है।

मेरे अंदर की रानी
प्यार करती है—
मगर खुद को खोकर नहीं
खुद पर और मजबूत बनकर।
वो रिश्ते निभाती है—
मगर खुद की कीमत देकर नहीं,
कीमत याद दिलाकर।

अब किसी को मेरी रूह पर हक़ नहीं,
अब मेरे सपने किसी की छाया पर नहीं टंगे।
अब मेरी खामोशी भी इज़्ज़त है,
और मेरा इंकार भी ताज की तरह भारी।

किसी को जाने से डर नहीं,
क्योंकि मेरे दिल की सल्तनत
किसी एक के रह जाने से नहीं चलती—
ये मेरे वजूद की चौखट पर चलती है।

अब मैं प्यार भी करूंगी
तो सर झुकाकर नहीं—
सर उठाकर।
क्योंकि मेरे अंदर की रानी
कभी किसी की मुकाम नहीं बनती,
वो खुद मंज़िल होती है।

उस दिन मैं सच में जी उठी—
जब मैंने महसूस किया
कि मेरे किस्मत का सिंहासन
किसी और के आने से नहीं,
मेरे खड़े होने से सजता है।

और अब?
अब जिसने भी मेरे अंदर की रानी को पहचान लिया—
उसकी दुनिया बदल जाएगी,
और जिसने नहीं पहचाना…
उसे मेरी दुनिया में जगह नहीं मिल पाएगी।

इश्क से आगे की जिंदगी

इश्क़ खत्म हुआ तो ऐसा लगा
जैसे दिल की आख़िरी साँस निकल गई हो,
पर सच तो ये है—
इश्क़ के बुझने के बाद ही
ज़िंदगी की पहली लौ जलती है।

पहले मैं किसी की धड़कन में
अपना नाम ढूंढती थी,
अब मैं अपनी साँसों में
अपना वजूद महसूस करती हूँ।

कल तक जो दरवाज़ा किसी और के लिए खुला था,
आज वही दरवाज़ा
मेरे अपने लौट आने के लिए खुला है।

इश्क़ से आगे की जिंदगी
अजनबी नहीं—
बस थोड़ी खामोश है,
थोड़ी समझदार है,
थोड़ी सँभली हुई…
और पूरी मेरी है।

अब मैं रोती भी हूँ तो खुलकर,
हँसती भी हूँ तो सच्चे मन से,
क्योंकि दर्द का हिसाब कोई नहीं ले रहा,
और खुशी का प्रमाण कोई नहीं मांग रहा।

अब रातों में जागना इश्क़ की मजबूरी नहीं,
खुद के सपनों की मेहनत है।
अब धड़कनें किसी के कदम से नहीं मिलती—
लक्ष्य की ओर बढ़ते कदमों से ताल मिलाती हैं।

अब किसी के लौट आने का इंतज़ार नहीं,
और खुद के रुक जाने का डर नहीं।

इश्क़ से आगे की जिंदगी
मोहब्बत के बिना नहीं है—
बस उस मोहब्बत में
अब एक चेहरा नहीं,
पूरा खुद का संसार है।

मैं किसी का सब कुछ बनकर
खुद से खाली नहीं रहना चाहती,
इस बार मैं अपनी भी बनूँगी—
अपने सपनों की,
अपने वजूद की,
अपने प्यार की।

जो लोग चले गए
उन्होंने सिर्फ एक किरदार छोड़ा है—
कहानी नहीं।
कहानी तो अब शुरू हुई है—
जहां मैं टूटती नहीं,
बल्कि खिलती हूँ।

इश्क़ खूबसूरत था
मगर जिंदगी उससे छोटी नहीं—
और मैंने अब तय कर लिया है…
किसी दिन मेरा प्यार मेरे लिए आए या न आए,
पर मेरी जिंदगी हमेशा मेरी रहेगी।

इश्क से आगे की जिंदगी

इश्क़ खत्म हुआ तो ऐसा लगा
जैसे दिल की आख़िरी साँस निकल गई हो,
पर सच तो ये है—
इश्क़ के बुझने के बाद ही
ज़िंदगी की पहली लौ जलती है।

पहले मैं किसी की धड़कन में
अपना नाम ढूंढती थी,
अब मैं अपनी साँसों में
अपना वजूद महसूस करती हूँ।

कल तक जो दरवाज़ा किसी और के लिए खुला था,
आज वही दरवाज़ा
मेरे अपने लौट आने के लिए खुला है।

इश्क़ से आगे की जिंदगी
अजनबी नहीं—
बस थोड़ी खामोश है,
थोड़ी समझदार है,
थोड़ी सँभली हुई…
और पूरी मेरी है।

अब मैं रोती भी हूँ तो खुलकर,
हँसती भी हूँ तो सच्चे मन से,
क्योंकि दर्द का हिसाब कोई नहीं ले रहा,
और खुशी का प्रमाण कोई नहीं मांग रहा।

अब रातों में जागना इश्क़ की मजबूरी नहीं,
खुद के सपनों की मेहनत है।
अब धड़कनें किसी के कदम से नहीं मिलती—
लक्ष्य की ओर बढ़ते कदमों से ताल मिलाती हैं।

अब किसी के लौट आने का इंतज़ार नहीं,
और खुद के रुक जाने का डर नहीं।

इश्क़ से आगे की जिंदगी
मोहब्बत के बिना नहीं है—
बस उस मोहब्बत में
अब एक चेहरा नहीं,
पूरा खुद का संसार है।

मैं किसी का सब कुछ बनकर
खुद से खाली नहीं रहना चाहती,
इस बार मैं अपनी भी बनूँगी—
अपने सपनों की,
अपने वजूद की,
अपने प्यार की।

जो लोग चले गए
उन्होंने सिर्फ एक किरदार छोड़ा है—
कहानी नहीं।
कहानी तो अब शुरू हुई है—
जहां मैं टूटती नहीं,
बल्कि खिलती हूँ।

इश्क़ खूबसूरत था
मगर जिंदगी उससे छोटी नहीं—
और मैंने अब तय कर लिया है…
किसी दिन मेरा प्यार मेरे लिए आए या न आए,
पर मेरी जिंदगी हमेशा मेरी रहेगी।

इश्क का दरिया और मेरी शिकायतें

इश्क़ के दरिया में मैंने
अपनी हर धड़कन बहा दी,
कितनी ख़्वाहिशें थीं —
सबको मोती समझकर समंदर में डुबा दी।

तैरना आता था मगर
मैंने डूबना ज़्यादा पसंद किया,
क्योंकि इश्क़ वही है न…
जहां किनारे नहीं, सिर्फ़ टूटे हुए वादों का पानी ठंडा-सा पिया।

वो पलकों पर ठहरा एक ख्वाब
मुट्ठी में पानी की तरह फिसल गया,
और मैं पूछती ही रह गई—
किसने किसे खोया… और कौन किसमें बदल गया?

सच्चाई ये है
कि मैंने बहुत कुछ छोड़कर बहुत थोड़ा पाया,
होठों पर खामोशी थी
दिल ने मगर रोज़ यही सिखाया—
“प्यार के बाद भी ज़िंदगी बची रहे,
तो उसे जी लेना गुनाह नहीं… दगा नहीं।”

दिल के रेगिस्तान में
मैंने बारिश के होने का इंतज़ार किया,
कोई आया भी तो…
बस नमक में भीगी यादों का उपहार दिया।

पर शिकायत मेरी आज भी अधूरी है…
हर शोर के बाद भी
एक सवाल चुप बैठा है मेरे भीतर—
“मैंने इतनी मोहब्बत करी…
तो आखिर क्या मिला मुझको खुद से जीते जी हारकर?”

जिंदगी ने बस कंधे उचका दिए,
कहा— “इश्क़ किस्मत वालों को मिलना होता है,
और मोहब्बत करने वाले…
ज्यादातर तन्हाई में खिलना होता है।”

बस तभी समझ आया—
मेरी तलाश मोहमल नहीं थी,
मेरी तड़प गुनाह नहीं थी,
मैंने खोया नहीं… मैं बदल गई थी।

अब दरिया में फिर कूदना होगा
पर डूबने को नहीं —
अपने भीतर दुनियाओं को ढूंढने को,
अपनों से पहले खुद से जुड़ने को।

इश्क़ से शिकायत अब नहीं…
इश्क़ तो खूबसूरत था,
शिकायत बस इतनी है —
कि मैंने खुद को आख़िरी समझकर
किसी को पहली मोहब्बत बना डाला।

मै हूं ना

बड़ी आसान होती ज़िन्दगी,
अगर किसी एक क्षण तुम रुककर कहते —
"कोई बात नहीं… मैं हूँ न"
पर शायद हम जीवन की किताब को
बहुत सतही अक्षरों में पढ़ते रहे,
और अर्थ भीतर सोए रहे,
जैसे आत्मा की भाषा हम भूलते गए।

राह मुश्किल इसलिए नहीं थी
कि रास्ते में पत्थर थे,
राह मुश्किल इसलिए थी
क्योंकि हम गिरने को अपमान समझते रहे
सहारे को दुर्बलता,
और साथ को मोह का बंधन।

तुम कह देते —
"कोई बात नहीं… मैं हूँ न"
तो शायद समझ आता
कि मनुष्य अकेला नहीं जन्मा,
तो अकेला चलने के लिए बना भी नहीं।

दर्द भी कम होता,
क्योंकि दर्द तब तक जलता है
जब तक कोई उसे वैधता नहीं देता;
और सहारा वही वैधता है —
जो यह स्वीकार दिलाए
कि टूटना भी जीवन की भाषा है।

हम भूल गए कि भरोसा
भाग्य से बड़ा धर्म है,
और साथ
शरीर से नहीं —
आत्मा से निभाया जाता है।
कितना अलौकिक होता न,
अगर तुम एक पल को कहते —

“डर मत, अर्थ अभी खतम नहीं हुआ… मैं हूँ न।”

तब अस्तित्व का भार
दो हिस्सों में बंट जाता,
और आत्मा मन से कह पाती —
नाश से बचना जीवन नहीं,
नाश के बाद भी खिलना ही जीवन है।

शायद यही सृष्टि का रहस्य भी है —
हर आत्मा किसी दूसरी आत्मा को
एक अनकहा सहारा बनकर तलाशती है।
और ब्रह्मांड उतना विशाल नहीं
जितना मनुष्य की तन्हाई है।

आज सोचती हूँ —
तुम यह चार शब्द कह देते
तो किस्मत वैसी ही रहती,
घाव भी शायद वही रहते,
पर अस्तित्व बदल जाता।
क्योंकि मनुष्य संकटों से नहीं हारता,
अकेलेपन से हारता है।

कभी, किसी जन्म में,
किसी और नियति के पन्ने पर
यदि तुम मिलने लिखे गए,
तो मैं किसी चमत्कार की आशा नहीं करूंगी —
बस इतना चाहूंगी कि तुम फिर से मुस्कुराकर कहो —

“जिन्दगी कठिन हो तो क्या,
अर्थ अभी शेष है…
तुम चलो — मैं हूँ न।”

शुक्रवार, 5 दिसंबर 2025

मेरे अंदर की लेखिका से प्रेम कर बैठे तो...




यदि तुम
मेरे अंदर की लेखिका से प्रेम कर बैठे,
तो सावधान रहना…
मैं कागज़ की दुनिया नहीं लिखती,
मैं आत्माओं की तकदीरें लिख दिया करती हूँ।

मेरे शब्द
स्याही से नहीं — रक्त—स्मृति—और अधूरी चीखों से जन्म लेते हैं,
मेरी कलम
कभी दुआ बन जाती है,
कभी बद्दुआ के समान अनंत तक पीछा करती है।

अगर तुमने मुझे प्यार किया —
तो मैं साधारण प्रेमिका नहीं बनूँगी…
मैं तुम्हारी कहानी बन जाऊँगी।
तुम्हारी रगों में बहूँगी,
तुम्हारी नब्ज़ में बोलूँगी,
तुम्हारे सपनों पर राज करूँगी,
तुम्हारे भाग्य पर हस्ताक्षर कर दूँगी।

मैं वो आग हूँ
जो राख न होने दे…
और वो अमरता हूँ
जो मृत्यु तक को परास्त कर दे।

इसलिए सोच लेना —
मेरी आँखों में डूबने से पहले,
मेरी मुस्कान में खोने से पहले,
मेरे शब्दों को छूने से पहले—
क्योंकि
यदि तुम मेरे अंदर की लेखिका से प्रेम कर बैठे,
तो फिर मैं तुम्हें छोड़ंगी नहीं,
मैं तुम्हें भूलने भी नहीं दूँगी,
और मिटने भी नहीं दूँगी।

तुम्हारा अस्तित्व
मेरी कहानी की मिट्टी बन जाएगा,
और मैं…
तुम्हें सृष्टि के अंत के बाद भी
जीवित रखूँगी।

अमर।
अलिखित।
अधूरा पर सिर्फ मेरा।

बुधवार, 3 दिसंबर 2025

रिश्तों के बंधन काट दिया तो पंख अपने आप लग गए

ऐसा तो नहीं था कि हम चल नहीं सकते,
रोकने वाला कोई अपना बनकर खड़ा था,
हाथ थामने के बहाने
पैरों में बेड़ियाँ बाँधने वाला निकला।

रास्ते खराब नहीं थे,
रिश्ते खराब थे।
जो पास थे… वही सबसे ज़्यादा दूरी के खिलाफ थे,
कंधे पर हाथ रखकर चलते थे,
लेकिन मन में चाहते थे — हम कभी उनसे आगे न निकलें।

हम हारते नहीं थे…
हमें हराया गया था प्यार के नाम पर।
मासूमियत को कमज़ोरी समझा गया,
विश्वास को खिलौना,
और हमारी तरक्की — दूसरों के अहंकार पर चोट बन गई।

कभी कहा गया —
“हम तुम्हारे साथ हैं”…
और पीछे से रास्ते काटे गए।
कभी कहा गया —
“हम तुम्हारा भला चाहते हैं”…
और सलाह के नाम पर पाँव खींचे गए।

रिश्ते ही सबसे बड़े पहाड़ थे,
अजनबी नहीं — अपने ही सबसे बड़े दुश्मन निकले।
दुनिया ने नहीं रोका,
अपनों ने रोका… क्योंकि हमारी उड़ान उन्हें चुभती थी।

लेकिन अब कहानी पलट गई है —
जो असली था, रह गया…
जो काम का नहीं था, हट गया।
अब न शिकायत है, न इंतज़ार, न मोह।

और अब जब हम अपनी मंज़िल की तरफ चलेंगे,
तो वही चेहरे घूमेंगे ताज्जुब से देख कर —
“इतना आगे कैसे पहुँच गए?”

हम बस इतना जवाब देंगे —
“ऐसा तो नहीं था कि हम चल नहीं सकते…
रिश्तों के बंधन काट दिए,
और पंख अपने आप उड़ गए।”

ताकत मेरा मुखौटा है दर्द मेरी सच्चाई

मैं हँसती नहीं हूँ,
मैं बस ये सुनिश्चित करती हूँ
कि मेरी ख़ामोशी किसी को डराए नहीं।

तुम देखते हो मेरी जीतें,
पर मेरे हारने का हर पल
मैंने अपने ही भीतर दफन किया है —
ताकि कोई यह न जान सके
कि मैं भी कभी टूटी थी।

मेरी आवाज़ में जो ठहराव है,
वो आत्मविश्वास नहीं —
वो अनगिनत टूटे शब्दों की राख है
जिन्हें बोलने की अनुमति आज तक नहीं मिली।

मेरी रीढ़ सीधी है,
पर वो झुकी थी कभी,
बस मैंने झुकने के उस पल को
किसी की नज़रों तक पहुँचने नहीं दिया।

लोग कहते हैं — “तुम्हें दर्द नहीं होता होगा,”
और मैं मुस्कुरा देती हूँ,
क्योंकि सच बताने का मतलब होता
अपने खुले घावों को भीड़ में पेश करना —
और मैं इतनी असुरक्षित नहीं पड़ सकती।

तुम्हें क्या लगता है,
ताक़त मैं चाहती थी?
नहीं…
वो तो एक दिन दर्द की अत्यधिक सच्चाई ने
मुझे जबरन पहनाई थी।

कभी-कभी रात के सन्नाटे में
मैं अपना ही नाम पुकारती हूँ,
जैसे खुद को यकीन दिला रही हूँ
कि मैं अभी भी यहाँ हूँ…
उस दुनिया के पीछे छिपी
जो मुझसे ताक़त की उम्मीद करती है।

अगर किसी दिन मेरा मुखौटा गिर जाए,
तो उसे गिरा हुआ चेहरा मत समझना—
वो मेरे दर्द का चेहरा होगा,
जो पहली बार साँस लेने की इज़ाज़त पाएगा।

मैं मजबूत हूँ… पर इसलिए नहीं कि दर्द कम है,
बल्कि इसलिए कि दर्द इतना विशाल है
कि उसे दुनिया के सामने रखना
मेरी सबसे बड़ी हार होती।

इसलिए…
मुस्कान मेरा हथियार है,
ताक़त मेरा मुखौटा,
और दर्द —
मेरा सबसे निजी, सबसे पवित्र सच।

मै एक सबक छोड़ जाऊंगी

जिस दिन मैं इस भीड़ से चुपचाप गुजर जाऊंगी,
लोग कहेंगे — “अजीब थी” फिर भूल भी जाएंगे,
पर मैं नाम नहीं,
एक सबक छोड़ जाऊंगी।

किसी को सिखा जाऊंगी कि
दिल टूटे तो आँसू नहीं,
खामोशी सबसे तीखा जवाब होती है।
किसी को बता जाऊंगी कि
मोहब्बत हो तो सर झुके नहीं,
इज़्ज़त हमेशा प्यार से बड़ी होती है।

मैं मुस्कुराहट के पीछे की आग बनकर
किसी के अंदर हिम्मत जगा जाऊंगी,
कि गिरकर भी जीना पड़ता है,
और रोकर भी जीतना पड़ता है।

किसी को एहसास दिला जाऊंगी कि
लोग बदलते हैं— वक़्त नहीं,
और खुद से बढ़कर
कोई ताज नहीं।

कल शायद मैं किसी कहानी में न दिखूँ,
न तस्वीरों में, न यादों में,
पर जो मेरे जैसा टूटते-टूटते भी खड़े होंगे—
उनकी रगों में
थोड़ी मैं धड़क जाऊंगी।

क्योंकि मेरा सफ़र चाहतों का नहीं,
चरित्र का था,
और चरित्र कभी मरता नहीं,
सिर्फ विरासत बन जाता है…

तो चाहे तालियाँ मिलें या ताने,
चाहे प्यार मिले या तिरस्कार—
मैं जाने से पहले इतना ज़रूर कर जाऊंगी,
कि दुनिया याद रखे —
एक औरत थी, जो हार नहीं मानती थी।

और बस,
नाम नहीं…
मैं एक सबक छोड़ जाऊंगी।

मै टकराना चाहती हु तूफानों से



मैं टकराना चाहती हूँ तूफ़ानों से,
क्योंकि समंदर की शांति ने कभी
मुझे पहचानना नहीं सिखाया।

मैं डूबकर उठना चाहती हूँ,
क्योंकि किनारों की ज़मीन पर रहकर
किसी ने तकदीर नहीं बनाई।

मैं चीख़ बनकर नहीं,
सन्नाटे की धार बनकर लड़ूँगी—
जो दिखे भी नहीं… मगर तोड़ दे पहाड़ों को।

मैं डर के पंख नहीं पहनूँगी,
मैं जिद की तलवार बनाऊँगी,
और हवाओं से कह दूँगी —
“चल, जितना बल है आज़मा ले।”

तूफ़ान आए, तो आए,
मैं अपनी रगों का लहू गरम कर लूँगी,
अपनी इच्छाशक्ति को कवच पहनाऊँगी,
और गिरूँगी भी तो वहीं से उठूँगी
जहाँ गिरकर कई लोग रुक जाते हैं।

क्योंकि मैं फूल नहीं,
एक पर्वत की बेटी हूँ—
जिसे हिमपात भी रोक नहीं पाता।

मुझमें हारने की गुंजाइश नहीं,
क्योंकि मैं युद्ध नहीं,
अपना स्वयं का इतिहास लिखने निकली हूँ।

जो मुझे तोड़ना चाहते हैं,
याद रखें —
मैं राख नहीं, अग्नि हूँ,
हर हार के बाद और भयंकर जलती हूँ।

और एक दिन,
ये तूफ़ान भी थककर रुक जाएगा,
और दुनिया कहेगी —
“एक औरत थी… जिसने हवाओं को झुकना सीखा दिया।”

मै कहां हु



मै बेटी बनी —
कंगन सी खनकती जिम्मेदारियों में बँधी,
लाड़ की मूरत, पर बोलने की आज़ादी हमेशा बंद थी।

फिर पत्नी बनी —
सुहाग की लाल चुनरी में सपनों को तह कर दिया,
ख़ुशियों की दहेज में अपनी पहचान खुद ही दे दिया।

फिर माँ बनी —
नन्हे हाथों की खुशबू में इतनी घुल गई,
कि अपने आँसुओं की आवाज़ तक सुनाई न दी।

रिश्तों के हर मोड़ पर
मैंने अपना संसार सजाया,
पर एक सवाल हर जन्म में
मुझे खुद से टकराया —

मै बेटी बनी, पत्नी बनी, मां बनी…
पर मैं खुद कहाँ हूँ?

मेरे नाम की जगह "किसी की" जुड़ता रहा,
मेरे जीवन की कहानी में
मेरा अध्याय सबसे छोटा लिखा जाता रहा।

मेरे अस्तित्व को प्यार मिला —
पर स्वीकार नहीं,
मेरा वजूद देखा गया —
पर समझा नहीं।

सभी ने कहा —
“तुम हमारे लिए हो।”
पर कभी किसी ने नहीं पूछा —
“तुम अपने लिए क्या हो?”

मैंने हर रिश्ते में ख़ुद को दिया,
पर ख़ुद को कभी जी न सकी,
मेरी सांसें भी दूसरों की ख़्वाहिशों पर चलती थीं,
जिस्म़ मेरा था, पर ज़िंदगी मेरी कभी न रही।

आज इतना ही नहीं जानना —
कि मैं किसकी हूँ,
मैं यह जानना चाहती हूँ —
कि आखिर मैं मैं कहाँ हूँ?

अब मैं तलाश में हूँ
किसी नए नाम की नहीं —
अपने असली स्वरूप की।

अब मुझे रिश्ता नहीं —
खुद से मिलना है,
दुनिया को नहीं —
अपनी आत्मा को ज़िंदगी देना है।

अब मैं फिर जन्म लूंगी,
पर किसी की पहचान बनकर नहीं —
अपनी बनकर।
अब हर भूमिका के बीच
खोई हुई "मैं" लौटकर आएगी —
पूरी, स्वतंत्र, संपूर्ण।

क्योंकि
मैं सिर्फ बेटी, पत्नी, मां नहीं —
मैं भी एक पूरी “मैं” हूँ।
और इस बार…
मैं खुद को खोने नहीं दूँगी।

बिखरूँ क्यों

बिखरूँ क्यों…?
मैं तो काँच नहीं, मैं पर्वत हूँ
थोड़ा थक जाती हूँ पर खत्म नहीं होती…

मैं क्यों बिखर जाऊँ?
मैं तो तूफ़ानों की बेटी हूँ,
जितना ज़ोर से हवाएँ धक्का देती हैं
उतना ही मज़बूत जड़ें भीतर उग जाती हैं।

मैं कमजोर नहीं,
बस कभी-कभी दिल की आवाज़ तेज़ हो जाती है
तो लोग उसे आँसू समझ लेते हैं।
पर जो गिरता है, वही उठकर इतिहास बनाता है
और मैं गिरकर उठने की ठान चुकी हूँ।

मेरे हिस्से की रातें लंबी थीं,
ज़ख्म भी गहरे थे,
मगर सूरज की खोज मैंने बंद नहीं की…
हर हार के बाद दर्पण में खुद को देखकर
मैंने यही कहा —
“तू टूटी नहीं है… तू बदल रही है।”

दुनिया ने कहा —
छोड़ दो, थक जाओगी
मैंने कहा —
थककर रुक जाने से बेहतर है थककर जीत जाना।

कई लोग आए, बोले सहारा बनेंगे
लेकिन मैं गिरने से पहले ही संभल गई
क्योंकि मुझे समझ आ गया —
सहारा कभी बाहर नहीं,
हमेशा भीतर जन्म लेता है।

मैं आज भी मुस्कुराती हूँ
घाव छुपाने के लिए नहीं
बल्कि ये बताने के लिए
कि दर्द मुझे रोक नहीं सकता।

मेरी रूह हारना नहीं जानती,
मेरी नसों में करुणा नहीं, जिद बहती है—
जिद खुद को साबित करने की
जिद बिना शोर के चमकने की
जिद अपने अस्तित्व का आकाश देखने की।

मैं क्यों बिखर जाऊँ?
मेरा मन कच्चा हो सकता है
पर मैं मिट्टी नहीं, बीज हूँ —
कटूँगी नहीं…
तो भी एक दिन हरी हो जाऊँगी।

मैं तिनका नहीं, तूफ़ानों के बीच खड़ा पेड़ हूँ
डरती हूँ तो जड़ें पकड़ लेती हूँ
लड़ती हूँ तो शाखें उगाती हूँ
और जब जीतती हूँ
तो फूल बनकर पूरी दुनिया को खुशबू दे आती हूँ।

हाँ, मेरे भीतर आँधियाँ भी हैं
लेकिन उनसे बड़ा साहस भी है।

मैं क्यों बिखर जाऊँ?
मैं कमजोर नहीं…
मैं बस अभी अपने सर्वश्रेष्ठ रूप में ढल रही हूँ।
और समय गवाह बनेगा —
जिस दिन मैं चमकी,
छुपाने के लिए रात भी काफी नहीं होगी। ✨

मंगलवार, 2 दिसंबर 2025

मेरे नजरिए से जिंदगी

कभी शहद सी मीठी लगती,
कभी नीम सी कड़वी चुभती —
पर ज़िंदगी का असली जादू यही है
कि ये हमें हर हाल में जीना सिखाती है।

जो आँखें रोज हँसती हैं,
उनके पास भी दुखों की कहानी होती है,
पर फर्क इतना है —
वे टूटने के बजाय आगे बढ़ना चुनती हैं।

अपनों का प्यार —
वक्त की सारी मार से भारी पड़ जाता है,
चाहे जीत मिले या हार —
साथ मिलने से मन का घाव हल्का हो जाता है।

मैं दर्द की कहानी नहीं —
हौसले की मिसाल हूँ।
वक्त ने डुबोया भी, गिराया भी,
पर मैं वही हूँ जो फिर से खड़ी हुई।

हाँ, मैंने वक्त को रंग बदलते देखा है —
कड़वाहट से मिठास तक झूलते,
पर यही बदलाव बताते हैं
किसी भी अंधेरे के बाद सुबह पक्की है।

कभी कंधों पर बहुत बोझ था,
आज वही बोझ मेरी ताकत बन गया,
कभी सपने टूटे थे,
आज वही सपने मेरी उड़ान का ईंधन बन गए।

ज़िंदगी कभी आसान नहीं होती,
पर आसान रास्ते
मजबूत लोग नहीं बनाते।

इसलिए —
रोना है तो रो लो,
थकना है तो थक लो,
पर रुकना मत, टूटना मत, झुकना मत।

क्योंकि —
तुम जितनी बार गिरोगी,
उतनी ही ऊँची उड़ना सीखोगी।

दर्द मिटाने नहीं आता,
ताकत जगा के जाता है।
मुश्किलें रोकने नहीं आतीं,
नए रास्ते बनाना सिखाती हैं।

और याद रखना —
आज की थकान,
आज के आँसू,
आज की हार —
कल की जीत की नींव होते हैं।

कड़वी सी लगने वाली ये जिंदगी ही
एक दिन तुम्हारी सबसे मीठी जीत का स्वाद चखाएगी।

बस…
चलते रहो…
लड़ते रहो…
बढ़ते रहो…

क्योंकि तुम्हारे अंदर की आग ही
तुम्हारा कल बनाएगी। 🔥

जय श्री राम 🙏

जग के मेघ अचानक छँटते ।
जब मन राम चरणों पर टिकते ॥
रोते-रोते मन समझा है ।
प्रभु ही सागर, हम सब बूंदें ॥

कितनी दूरी कितने फासे ।
फिर भी नाम बुलाए पासे ॥
मन पतझड़ में फूल खिले हैं ।
जब-जब “श्रीरघुनाथ” मिले हैं ॥

भूली-बिखरी अपराधिन आई ।
दुनिया ने हर बार ठुकराई ॥
पर विश्वास बहुत गहरा है ।
राम दया का सागर ठहरा है ॥

मैंने खुद ही खुद को खोया ।
अंतर का दीप नहीं संजोया ॥
हे रघुवर यदि दृष्टि न दोगे ।
अंधियारा जीवन ही होगा ॥

ना विधि–विधान प्रणाम मुझे ।
ना भक्ति–योगि में ज्ञान मुझे ॥
बस इतना भाव हृदय में धड़का —
राम बिना जीवन भी भटका ॥

एक पुकार अडिग मन भारी —
“तुम बिन कौन दया-भंडारी?” ॥
यदि तुमने भी द्वार न खोला —
टूटे भाग्य कहाँ फिर जोला ॥

भरत चरणों की शरण में जाऊँ ।
दीनन के दुःख हृदय पहुंचाऊँ ॥
छालों-भरे पग धूल चढ़ाएँ ।
करुणा-सरिता मन पर बरसाएँ ॥

भरत दया का धाम महान ।
रखत दीनों का सदा मान ॥
जिनको जग ने दूर धकेला —
भरत चरणों ने वही संभाला ॥

और जब प्रभु अंततोगत्वा आए ।
आँखों में प्रेम की अगन जगाए ॥
कह दूँ — “अब जीवन तेरा है” ।
सांस-सांस बस नाम बसेरा है ॥

मेरी हस्ती चरणों में ढलती ।
राम भक्ति ही जीवन फलती ॥
जनम-जनम की बस अभिलाषा —
सीताराम बनें मेरी श्वासा ॥

किसी एक का होना काफी होगा

किसी की आँख में एक दिन
मेरा पूरा आसमान तैरता मिलेगा—
वही दिन होगा जब मैं समझूँगी
मोहब्बत सिर्फ किस्सों का ज़िक्र नहीं…
एक साँस की वजह भी होती है।

कहीं कोई अभी भी
दूर किसी समंदर से मेरा नाम चुन रहा है,
मैं यहाँ टूटती रहती हूँ—
और वो वहाँ मेरे लिए मोती बनने का
इम्तिहान सह रहा है।

मैं हारूँगी नहीं…
क्योंकि दिल जीतना मेरी ज़िद नहीं—
मेरी दुआ है।
अगर मेरे ख़ुदा को मंज़ूर हुआ
तो कोई चेहरा मेरी दुवाओं का जवाब बनकर आएगा।

एक दिन कोई ऐसा होगा
जिसके होने पर मेरी धड़कनें
बहाने नहीं ढूँढेंगी जीने के।
जिसके बिना, मैं जिंदा ही नहीं रहना चाहूँगी—
और ये बात मेरी जीत होगी, हार नहीं।

रात के सन्नाटे में
जब कोई अनजान दिल अचानक काँप उठता है,
मुझे लगता है — शायद वह भी मेरे जैसा ही है।
टूटा नहीं… पर टुटने से एक कदम पहले खड़ा हुआ।
शायद मेरा इंतज़ार उसी भीड़ में छिपा हुआ है।

ज़िंदगी…
इस बार किसी बेनाम सफ़र में मत ले जाना,
अगर मोहब्बत लिखनी हो
तो पूरा लिक्खना—
अधूरा रहने की आदत अब नहीं रही।

हाँ, आज मैं अकेली हूँ…
पर मुझे यकीन है —
कहीं न कहीं, किसी के भीतर
मेरे नाम की रौशनी जल चुकी है।
और किसी एक का होना
मेरी पूरी दुनिया के बराबर होगा।

उम्मीदों की मौत

उम्मीदें दिलाकर कोई दिल तोड़ गया —
ये कोई किस्सा नहीं,
ये किसी मासूम रूह की हत्या है।

वो गया तो दरवाज़ा नहीं टूटा,
अंदर का वजूद टूट गया।
मेरी हँसी सलाखों के पीछे कैद है
और आज़ाद वही है
जिसने वादा करके मुकरना सीख लिया।

वो कहता था —
“तुम मेरी हो”
और मैंने आँखें बंद करके मान भी लिया,
क्योंकि प्रेम में सबसे पहले
दिमाग मरता है
और दिल राज करता है।

लेकिन अब समझ में आया —
कि किसी पर भरोसा करना
अपने गले में रस्सी डालकर
उसे चाबी सौंपने जैसा है।

किसी ने उम्मीदें दिलाईं,
और दिल तोड़ गया —
मगर सच तो ये है
कि किसी ने दिल नहीं तोड़ा,
मैंने खुद को उसकी बातों में खो दिया।
उसके जाने की आवाज़ धीमी थी,
पर मेरे टूटने की आवाज़
मेरी रूह ने सुनी।

मैं आज भी ज़िंदा हूँ…
पर पहले जैसी नहीं।
अब मुस्कान में सावधानी है,
प्यार में दूरी है,
और भरोसे के दरवाज़े पर
ताला भी है —
चाबी भी मेरे पास नहीं।

जिस दिन जाना
कि इंसान वादों से नहीं,
इरादों से पहचाना जाता है,
उस दिन मैंने
किसी के “साथ निभाने” पर यकीन करना छोड़ दिया।

वो याद नहीं आता —
लेकिन उसने सिखा दिया
कि दिल कभी मूर्खताओं में नहीं,
दूरियों में सुरक्षित रहता है।

अब कोई आये तो मुझे पकड़कर नहीं,
मुझे समझकर रहे,
क्योंकि मैं वो लड़की नहीं
जो टुकड़ों में मिलने वाली मोहब्बत से खुश हो जाए।
मैं पूरी की पूरी चाहिए…
या बिल्कुल नहीं।

और हाँ —
जिसने उम्मीदें दिलाकर दिल तोड़ा था,
उससे कहना —
मैं अब टूटी नहीं,
कड़े हो चुकी हूँ।
अब मेरा दिल मोम नहीं —
फौलाद है,
और बिना सच्चाई के किसी को
उस तक पहुँचने की इजाज़त नहीं मिलती।

आज दर्पण में खुद को देखती हूँ
और मन में एक ही वाक्य बजता है —

“जिसे खोकर तुम गिरो नहीं…
उसे पाने के लिए झुको मत।”

सोमवार, 1 दिसंबर 2025

जिंदगी ही तो है कट जाएगी

जहाँ शब्दों की मिट्टी गीली हो जाती है,
जहाँ उम्मीद की आख़िरी चिंगारी भी राख में सो जाती है,
जहाँ दिल हार मानने और टूट जाने की दहलीज़ पर खड़ा होता है—
वहीं एक धीमी आवाज़, बिना आवाज़ के कह जाती है…
“जिंदगी ही तो है… कट जाएगी।”

जितनी बार साँसें बोझ लगती हैं,
आँसू नमक नहीं — इम्तिहान लगते हैं,
और जो लोग अपने नहीं थे,
वही जरूरी बनकर दिल में घर कर जाते हैं—
तब मन फिर वही समझाता है…
“जिंदगी ही तो है… कट जाएगी।”

कभी वक़्त थप्पड़ बनकर गिराता है,
कभी किस्मत आँधी बनकर रुलाती है,
कभी अपने ही पराये कहलाते हैं,
और कभी पराये दिल के सबसे अपने बन जाते हैं—
पर सफ़र रुकता नहीं, थमना आता नहीं,
ये वक़्त भी धीरे से फुसफुसाता है…
“जिंदगी ही तो है… कट जाएगी।”

तन्हाई के कंधे पर सिर रखकर
रातों ने कई बार दिल की धड़कनें सुनी हैं,
टूटकर भी मुस्कुराने की कला सीखी हमने,
और जीते जी हारकर भी जीतने का हुनर बुना है—
दरारों में भी रोशनी मिल जाती है,
अगर दिल थककर भी बोल दे…
“जिंदगी ही तो है… कट जाएगी।”

कल किसी को याद ही न रहेंगे हम,
और आज भी कौन याद से ज़्यादा संभालता है?
दुनिया उलझनों से भरी है,
पर हल खुद दिल के अंदर पलता है—
जिन्हें जाना था, वे चले ही जाते हैं,
जो रहना है, वही रूह में बस जाते हैं…
बाक़ी? बस सुकून से कह देना—
“जिंदगी ही तो है… कट जाएगी।”

किसी दिन ये दर्द भी मौसम की तरह बदल जाएगा,
गम की सर्दियों में खुशियों का सूरज फिर उग आएगा,
जिसे खोया है, उसकी कमी मिटेगी नहीं,
पर उसके बिना जीने की आदत ज़रूर हो जाएगी…

और जब रोशनी फिर लौटेगी,
तो आज का टूटा हुआ दिल गर्व से कहेगा—
“देखा… जिंदगी ही तो थी… कट गई।”

रिश्तों को मत बांधो शर्तों में

मत पहनाओ इन्हें शर्तों का लिबास,
रिश्ते तो साहब अंदाज़ में जीये जाएँ,
जहाँ दिल साँसों की तरह आज़ाद चले,
और मोहब्बत, थपकियों की तरह धीमे से बिखर जाए।

रिश्ता सौदे में बदले, तो एहसास बेचैन होते हैं,
पलकों की नमी भी बोल उठती है —
“तुम मेरे हो पर काबिल-ए-कैद नहीं।”
प्यार, हुक्म से नहीं, विश्वास की बारिश में खिलता है।

जिस रिश्ते में हर बात के बदले एक बात हो,
जहाँ हर खुशी की कीमत एक मजबूरी हो —
वो रिश्ता नहीं,
दिलों पर डाला गया कोई करार होता है।
और करार हमेशा टूटते हैं,
पर रिश्ते… बस निभाए जाते हैं।

क़समों से ज्यादा खूबसूरत होता है एहसास,
दिखावे से ज्यादा पवित्र होता है एहतराम,
और हक़ जताने से ज्यादा गहरा होता है,
बिना शब्दों के दिया गया साथ।

रिश्तों को बन्धन दे दो, तो परिंदे डर जाते हैं,
उन्हें पंख दे दो — तो वही लौटकर कंधे पर आ बैठते हैं।
इश्क़ को कैद की औकात मत दो,
ये समंदर है, तालाब नहीं —
दूर जाए तो भी अपना होता है,
पास आए तो भी नाज़ुक नहीं।

चलो ऐसा रिश्ता रखें —
न शिकायतों के तख्त पर,
न अपेक्षाओं की अदालत में;
बस आँखों की भाषा,
सच्चाई की तर्ज़,
और प्रेम का सुकून।

जहाँ मिलने का कोई हिसाब न हो,
बिछड़ने का कोई डर न हो,
जहाँ हम एक-दूसरे के लिए हों,
मगर एक-दूसरे के स्वामित्व में नहीं।

क्योंकि रिश्ते, जितने बेफ़िक्र होते हैं,
उतने ही गहरे उतरते हैं।
जहाँ प्यार बेपरवाह हो —
वहाँ टूटना भी कम लगता है,
और जुड़ना… आसमान जैसा विशाल।

इसलिए…
मत पहनाओ इन्हें शर्तों का लिबास,
रिश्ते तो साहब बिंदास ही अच्छे लगते हैं —
जैसे खुले आसमान तले बैठकर
मौन में भी बातें होती रहें,
और बिना कुछ माँगे
सब कुछ मिल जाता रहे।

आंसू नहीं सैलाब

इन दिनों आँखों से आँसू नहीं,
मानो सदियों से जमा ख्वाहिशों का सैलाब बह रहा हो—
हर बूंद जैसे एक ऐसा सपना हो
जो पूरे होने से पहले ही टूटना सीख गया।

कहते हैं समंदर में शोर बहुत होता है,
पर सबसे बड़ा शोर तो वहाँ जन्म लेता है
जहाँ ज़ुबान खामोश और दिल जाग रहा होता है—
जहाँ भीड़ में भी इंसान अकेला बैठा होता है
और खुद के भीतर खुद को तलाश रहा होता है।

अजीब है…
जीवन हमें चाहने का हुनर तो देता है,
पर पाने की गारंटी नहीं देता।
ये संसार दुआओं पर नहीं,
कर्मों पर नहीं,
बल्कि धैर्य पर टिका है—
जो धीरज रख ले, वही पार पाता है,
और जो टूट जाए, वही राह में छूट जाता है।

कुछ ख्वाहिशें ऐसी होती हैं—
जिन्हें पूरा होना नहीं,
बस किसी दिन दिल से निकल जाना होता है,
तभी आत्मा थोड़ी हल्की होती है।

कभी हम रिश्तों के पीछे भागते हैं,
कभी मंज़िलों के,
कभी किसी अपने के,
और आख़िर में पता चलता है—
सबसे कठिन यात्रा
किसी को पाना नहीं,
खुद को लौटा पाना है।

ये आँसू हार नहीं हैं,
इनमें बाढ़ नहीं, उपचार है—
ये धरती को गीला नहीं,
अहंकार को गीला करते हैं।
ये गिरते हैं ताकि इंसान
ज़िंदा रह सके, सुलगकर खत्म न हो जाए।

कभी-कभी टूटना भी ज़रूरी होता है,
क्योंकि साबुत रहने की जिद
मन को थका देती है।
थोड़ा बिखरना जरूरी है,
ताकि वक्त फिर से जोड़े तो
इंसान पहले से बेहतर बने।

और सच तो ये है—
हर अधूरा सपना एक शिक्षक है,
हर चुभन एक दिशा है,
हर विदाई एक रूपांतरण है।
कुछ लोग देने के लिए आते हैं,
कुछ छीनने के लिए,
कुछ सिर्फ़ सिखाने के लिए—
और हर किसी का मकसद पूरा होते ही
वो कहानी से निकल जाते हैं।

एक दिन समझ में आ जाता है—
कि कोई किसी का नहीं छूटता,
कोई भुलाया नहीं जाता,
बस आत्मा बड़ी हो जाती है,
और दुख छोटे।

आख़िर में यात्रा बाहर नहीं,
भीतर तय होती है।
मन जिस दिन थककर रुकना छोड़ देता है,
उसी दिन आत्मा चलना शुरू कर देती है।

अब खामोशियों में डर नहीं लगता,
अब अकेलापन खालीपन नहीं—
एक साधना है।
अब आँसू कमजोरी नहीं,
एक पवित्र शुद्धि है।
अब ख्वाहिशें बोझ नहीं,
अनुभव हैं।

और सबसे सुंदर क्षण तब आता है—
जब इंसान मुस्कुराते हुए कह पाता है:
“मुझे अब कुछ पाना नहीं,
मुझे सिर्फ़ रहना है…  
अपने भीतर, अपने सत्य के साथ।”

यही वो पल होता है
जब आत्मा अपने सबसे ऊँचे शिखर पर पहुँचती है—
बिना शोर,
बिना विजय के,
बिना किसी नाम के…
सिर्फ़ एक पूर्ण शांति बनकर।

जागते ख्वाबों के दर्शन

सोए तो दिल में एक जहाँ उग आया,
जैसे आत्मा ने शरीर से अलग होकर कोई सृष्टि रच डाली हो —
जहाँ इच्छा ही ईश्वर थी,
और संभावना ही नियति।

अँधेरी रात ने बताया,
कि मन के भीतर भी एक ब्रह्मांड है,
जहाँ हर खोया हुआ पल फिर से मिल सकता है,
जहाँ आँसू भी तारे बन सकते हैं,
और टूटन भी गीत।

पर सुबह —
सुबह ने सारा हिसाब पलट दिया,
आँखें खुलीं तो अहसास हुआ
कि पलकें केवल नींद से नहीं भारी थीं,
वे अधूरे सपनों की धूल से ढकी थीं।

कितना विचित्र है ना?
हम सपनों में वह सब जी लेते हैं
जिसे जीवन में जीने से डरते हैं।
और जीवन में वह सब सह लेते हैं
जिससे सपनों में गुज़रना भी असंभव लगता है।

तभी समझ आया —
ख्वाब झूठे नहीं होते,
बस वे अधूरे होते हैं —
क्योंकि हम उन्हें नींद पर छोड़ देते हैं,
कर्म पर नहीं।

सपना भाग्य नहीं — संकेत होता है;
दिल में बसा “जहाँ”
ज़मीन पर तभी बनता है
जब आत्मा इच्छा से आगे बढ़कर
साहस को ईश्वर मान ले।

तभी एक प्रश्न भीतर उठा —
ख्वाब टूटे थे, या हम?
और भीतर से उत्तर आया —
ख्वाब कभी नहीं टूटते,
वे केवल नए रास्तों में बदल जाते हैं।

अब जो सुबह आती है,
मैं आँखों से धूल नहीं झाड़ती,
मैं सपनों को जगाती हूँ।
क्योंकि असली जागना
पलकों के उठने से नहीं,
इच्छाओं के उठ खड़े होने से होता है।

और जिस दिन मन सच में जाग जाएगा,
उस दिन सपनों का “जहाँ”
दिल में नहीं —
दुनिया में भी नज़र आएगा।

मै टूटी थी पर झुकी नहीं

कभी खाली हाथ निकली थी घर से,
चुपचाप बिना शिकायत किए,
ख्वाहिशों को मोड़कर आंचल में रखा
और मुश्किलों से दोस्ती किए।

खाली जेब देखकर दुनिया मुस्कुराई,
किस्मत पर ताने फेंके,
कहा — “औरतें सपने क्या देखें?”
पर मैंने सपनों को आँसू बनाकर नहीं बहने दिए,
हवा बनाकर चलने दिए।

पेट की भूख बड़ी थी,
पर आत्म-सम्मान उससे बड़ा,
कदम चाहे काँपते रहे,
पर इरादे कभी डगमगाए नहीं ज़रा।

दिल भी टूटा एक बार नहीं — कई बार,
किसी प्रेम में, किसी भरोसे में,
किसी रिश्ते में, किसी वादे में;
पर हर बिखराव ने भीतर
एक औरत नहीं —
एक आंधी जगा दी।

दुनिया ने सोचा था चुप कर देंगे,
सवालों की आग बुझा देंगे;
पर मुझे क्या पता था
कि राख में सोई चिंगारी
एक दिन सूरज बन जाएगी।

खाली पेट ने सिखाया —
सबसे पहले खुद को खिलाना है;
खाली जेब ने सिखाया —
कीमत पैसों की नहीं, हौसलों की लगानी है;
टूटे दिल ने सिखाया —
अपनी धड़कन खुद की बनानी है।

आज मैं वही हूँ —
पर वैसी नहीं,
सब कुछ खोकर भी पूरी हूँ,
जली हूँ, पिघली हूँ, पर सोना बनी हूँ।

अब कोई तिरस्कार नहीं डराता,
ना कोई त्याग मुझे थकाता,
क्योंकि आज मैं जानती हूँ —
औरत का दुख उसे रोकता नहीं,
बल्कि गढ़ता है, तराशता है, उठाता है।

आज…
मैं हर घाव को अपने माथे का तिलक मानती हूँ,
हर आँसू को अपनी शक्ति का सिंदूर;
क्योंकि अगर वो रातें न होतीं
तो मैं आज की यह स्त्री न होती —
अडिग, अजेय, और अमर।

हाँ, मैं टूटी थी…
पर झुकी नहीं।
और यही मेरी जीत की सबसे पहली पहचान है।

खोज की सबसे सुंदर यात्राएं

कभी निकले हो
किसी फूल की तलाश में?
जहाँ पंखुड़ियों का जन्म
हवा की गोद में होता है,
जहाँ खुशबू बिना आवाज़ के
दिल तक उतर जाती है।

कभी चले हो
किसी नदी की खोज में?
जहाँ पानी सिर्फ बहता नहीं
बल्कि आत्मा को धो देता है,
जहाँ हर लहर में
अधूरेपन से मुक्ति का गीत छुपा होता है।

कभी चाहा है
ईश्वर को अपनी आँखों से देखना?
मूर्ति में नहीं,
विकल्पों की भीड़ में नहीं,
बल्कि अपने भीतर के शोर में
एक शांत बिंदु ढूँढकर?

लोग कहते हैं
सफर सड़कें तय करने से बनते हैं,
मगर सच तो यह है—
सबसे लंबी, सबसे कठिन,
सबसे सुंदर यात्राएँ
अंदर की ओर होती हैं।

किसी फूल की खोज में निकला हृदय
आख़िर में समझता है —
वो फूल बाहर नहीं,
उसके भीतर ही खिल रहा था।

किसी नदी की तलाश में भटका मन
एक दिन पाता है —
उसकी आत्मा ही जल है,
और वही उसकी प्यास बुझाने को पर्याप्त है।

ईश्वर की खोज करने वाली आँखें
अंततः देखती हैं —
ईश्वर कहीं दूर नहीं,
अहंकार के छूटते ही
मुस्कुराते हुए भीतर बैठा मिलता है।

यात्राएँ कई शुरू होती हैं
पैरों से,
पर पूरी होती हैं
हृदय से।

रास्ते अक्सर पेड़ों, पहाड़ों, शहरों से गुजरते हैं,
पर मंज़िल हमेशा
अपने-आप से मिलकर समाप्त होती है।

खोजो—
फूल, नदी, ईश्वर या अर्थ;
बस इतना याद रखना
कि हर खोज के अंत में
तुम्हें “तुम” ही मिलोगे।

और वही दिन
यात्रा का अंत नहीं,
अस्तित्व की शुरुआत होता है। 

प्रेम का कालजयी रहस्य



काल से परे अनंत में
जहाँ समय भी थककर ठहर जाए,
जहाँ सृष्टि की गिनतियाँ
अपनी उंगलियाँ मोड़कर हार मान जाएँ—
वहाँ बस ईश्वर जीता है,
और…
वह एक प्रेमी,
जिसने किसी के होठों पर अपना पहला व अंतिम विश्वास छोड़ा हो।

क्योंकि चूमना सिर्फ स्पर्श नहीं होता,
वह प्रतिज्ञा होती है—
खुद के अस्तित्व का आधा हिस्सा
किसी और की आत्मा में सौंप देने की।

उस क्षण में
कोई जन्म नहीं लेता,
कोई मरता भी नहीं…
बस समय घुटनों पर आकर रुकता है
और प्रेम अपना साम्राज्य रचता है।

जहाँ होंठों का मिलन
देह का नहीं — भाग्य का मिलन होता है,
और ब्रह्मांड की हर धड़कन
प्रेमियों के नाम मंत्र जपती है।

ईश्वर ने शायद इसी क्षण को देखकर
अनंत का अर्थ लिखा होगा—
कि जो खुद को खोकर भी किसी में मिल जाए,
वही अमर होता है।

प्रेम का पहला चुंबन
इतिहास नहीं लिखता,
बल्कि क़यामतों को स्थगित कर देता है—
क्योंकि ऐसी आत्माएँ
मिटती नहीं…
वे प्रतीक्षा करती हैं,
युगों के नश्वर पहियों से परे
एक-दूसरे के होने की।

ईश्वर अमर है
क्योंकि वह प्रेम है—
और प्रेमी अमर है
क्योंकि उसके भीतर
ईश्वर की ही कला सांस लेती है।

इसलिए शायद
जब किसी के होठों को
एक सच्चे प्रेम ने छुआ हो—
तो वह क्षण
देह में नहीं…
कर्मफल, जन्म, पुनर्जन्म, मोक्ष —
सब पर शासन कर जाता है।

क्योंकि अनंत कोई जगह नहीं,
अनंत वह स्पर्श है
जो टूटने के बाद भी
बिखरता नहीं।



किताबें____जिंदगियों का उजाला



किताबें सिर्फ़ पन्नों पर लिखे कुछ शब्द नहीं होती,
ये उन अनकहे किस्सों की धड़कन होती हैं,
जो दूसरों की टूटी साँसों से सीख जोड़कर
हमारी राहों में दीपक बन जलती हैं।

किसी ने ठोकर खाकर जो सबक पाया,
वही अंधेरों में हमारा सहारा बन जाता है,
किसी के आँसुओं की कीमत पर लिखा वाक्य
हमारी पलकों के नीचे उजाला बन जाता है।

किताबें पढ़ना मतलब —
मंज़िल का नक़्शा उन मुसाफ़िरों से लेना
जो अपने पैरों में छाले लिए
हमसे पहले उस रास्ते से गुज़र चुके हों।

यह वो रास्ता है
जहाँ हम बिना गिरते हुए उठना सीखते हैं,
बिना डूबे समंदर पढ़कर किनारे पा लेते हैं,
बिना टूटे दर्द के आकार को समझ लेते हैं,
और बिना मरे ज़िन्दगी समझना शुरू कर देते हैं।

किताबें बताती हैं —
कीमती लोग हमेशा पास नहीं रहते,
पर उनकी सीख को जीवन भर साथ रखा जा सकता है।

किसी की विफलता हमारे लिए चेतावनी बन जाती है,
किसी की मेहनत हमारे लिए प्रेरणा बन जाती है,
किसी की मोहब्बत हमें रिश्तों की महत्ता सिखाती है,
किसी का अकेलापन हमें खुद से मिलना सिखा जाता है।

पन्ना-पन्ना हमें समझाता है —
कि हर इंसान एक कहानी है,
और हर कहानी में कहीं न कहीं
हमारी छुपी हुई तक़दीर लिखी होती है।

किताबें पढ़ना मतलब —
अपने कमरे में बैठे-बैठे
हज़ारों दुनियाओं का सफ़र तय कर जाना,
अजनबी शहरों, अनजानी हवाओं,
अनदेखे लोगों और अनसुनी आवाज़ों से
रूह के स्तर पर दोस्ती कर जाना।

और हाँ…
कभी-कभी कोई किताब ऐसी भी मिल जाती है
जो हमें हमसे मिलवा देती है—
जिसके शब्द आईने की तरह
हमारी आत्मा के सामने रख दिए जाते हैं
और हम पहली बार समझते हैं
कि हम कौन थे, क्या बने, और क्या बनने के लायक हैं।

किताबें दो लड़खड़ाते कदमों को
हज़ार पर्वत पार करवा देती हैं,
ये वक़्त की उम्र नहीं गिनती—
जिसने पढ़ लिया, वही परिपक्व हो जाता है, बिना समय गंवाए आगे बढ़ जाता है।

इसलिए मैं किताबों की क़सम खाकर कहती हूँ—
जो लोग शब्दों की दुनिया से दोस्ती कर लेते हैं,
ज़िन्दगी उनसे कभी धोखा नहीं करती…
क्योंकि वे दूसरों के ज़ख्म देखकर
खुद को बचाना सीख जाते हैं,
और दूसरों की जीत पढ़कर
खुद को जगा लेना जानते हैं।

किताबें पढ़ना मतलब —
रास्ता खुद बनाना नहीं,
रास्ते में पड़े काँटों को पहले ही पहचान लेना।
और जीवन की इस लंबी खामोश यात्रा में
एक अनदेखी, अनसुनी लेकिन सबसे सच्ची आवाज़
हमेशा हमारे साथ चलती रहती है…

किताबे.....

मै रूपांतरण में हु🙏

मत छेड़ो मेरी वीरानी,
इसे यूँ ही रहने दो…
जो टूटा है, उसे टूटे रहने दो —
मैं रो नहीं रही,
मैं रूप बदल रही हूँ,
ये परिवर्तन है… इसे होने दो।

तुम देखो तो सही —
यह उजड़ना, बर्बादी नहीं है,
यह पुनर्जन्म से पहले की
आवश्यक मृत्यु है।

स्त्री जलती है,
पर राख में नहीं बदलती —
वो राख बनकर भी
अगली आग की जननी होती है।

मैंने रिश्तों को मंदिर समझा,
लोगों ने मुझे प्रसाद की तरह बाँटा —
फिर भी मैं विखरी नहीं,
बस अपनी जगहों से हटकर
अपनी जगह ढूँढने चली हूँ।

खुशियाँ?
हाँ, जानती हूँ उन्हें…
पर मेरा सत्य उन्हें भारी पड़ गया।
खुशियाँ चाहती थीं
की मैं आँखें बंद रखूँ,
और मुझे सच देखे बिना
नींद नहीं आती थी।

दर्द आया,
और उसने मुझे मेरा परिचय दिया —
कहा, “तुम एक स्त्री हो,
इसलिए दुनिया तुम्हें आजमाएगी,
पर याद रखना —
जो स्त्री हार मान ले, दुनिया वैसी ही रहती है,
जो स्त्री खड़ी हो जाए,
दुनिया ढल जाती है।”

अब कोई कोलाहल नहीं चाहिए मुझे,
मैं अपनी आत्मा के शब्द सुन रही हूँ।
अब कोई सहारा नहीं चाहिए,
मैं अपनी ही रीढ़ बन रही हूँ।
अब कोई पहचान नहीं चाहिए,
मैं अपने नाम की परिभाषा खुद लिख रही हूँ।

मेरी उजड़ी बस्ती में
मौन है, शून्य है — और
सच्चाई है।
लेकिन गिरना नहीं —
असली खड़ा होना यहीं से शुरू होता है।

इसलिए छोड़ दो…
इस वीराने को वीरान ही रहने दो।
मैं बर्बाद नहीं हुई,
मैं चेतन हुई हूँ।
मैं खत्म नहीं हुई,
मैं तय हुई हूँ।

और जब मैं फिर से उठूँगी —
मैं वही स्त्री नहीं रहूँगी
जिसे दुनिया ने गिराया था,
मैं वही बनूँगी
जिससे दुनिया डरती थी
और जिसे मैं बनना चाहती थी।

तराजू जहां न्याय शुरू होता है खुद से

ज़िंदगी की सच्चाई समझना
उतना कठिन नहीं, जितना लगता है—
हम बस दूसरों को देखने में
इतने व्यस्त रहते हैं
कि खुद को देखने की फुरसत ही नहीं मिलती।

हम अक्सर
चेहरों को परखते हैं,
इरादों को जांचते हैं,
नियत पर शक करते हैं।
पर कभी रुके हैं?
कभी सोचा है?
कभी वह तराज़ू देखा है
जिसके एक पलड़े पर दुनिया रख दी—
और दूसरे पर “खुद” को रखना भूल गए?

दूसरों की गलतियों में
आग ढूंढ़ने वाले हम
अपनी ही गलतियों में
अंधेरा क्यों ढूंढ़ते हैं?

किसी की बात देर से करने पर गुस्सा,
अपनी देर पर सौ बहाने।
किसी के वादे टूटने पर आरोप,
अपने वादे टूटने पर मजबूरी।
किसी के बदल जाने पर ताना,
खुद के बदलने पर “हालात के मारे।”

यही तराज़ू
हम रोज़ थामते हैं—
पर खुद पर तौलना भूल जाते हैं।

एक दिन कोशिश करके देखिए—
उसी तराज़ू पर बैठ जाइए
जिस पर दूसरों की कीमत आँकी थी,
वही प्रश्न, वही कसौटी, वही कठोरता
खुद पर लागू करके देखिए।

सच कहूँ—
ज़िंदगी की सबसे तगड़ी चोट
किसी की बात नहीं करती,
खुद की सच्चाई कर देती है।

हम समझते हैं—
हम सही थे,
हम ठुकराए गए,
हम पीड़ित थे।
पर जब अपना प्रतिबिंब
न्याय की रोशनी में आता है—
तो अहंकार टूटता है
और इंसान जागता है।

तब समझ आता है—
दूरियाँ हमेशा धोखे से नहीं बनती,
कुछ हमारे व्यवहार से भी बनती हैं।
रिश्ते हमेशा बेवफाई से नहीं टूटते,
कुछ हमारी अपेक्षाओं के बोझ से भी टूटते हैं।
लोग हमेशा बदलते नहीं,
कभी हम भी बदल जाते हैं—
और हमें खुद पता तक नहीं चलता।

पर यह जागरूकता
दर्द नहीं देती—
मुक्ति देती है।

क्योंकि जब इंसान
दूसरों को नहीं,
पहले खुद को परखता है—
तब आलोचना
स्वीकार में बदल जाती है,
गुस्सा
समझ में बदल जाता है,
और निर्णय
करुणा में बदल जाता है।

तभी इंसान सीखता है—
कि दुनिया बुरी नहीं,
लोग कठोर नहीं,
हर कोई बस
अपनी अपनी लड़ाइयाँ लड़ रहा है।

और तब
दिल से एक मौन प्रार्थना निकलती है—
“किसी को आँकने से पहले
उसका दर्द जानना चाहिए…”

सच में,
ज़िंदगी की सच्चाई समझना मुश्किल नहीं—
बस एक पल के लिए
उसी तराज़ू पर खुद बैठना पड़ता है
जिस पर हम दूसरों को तौलते हैं।

उस दिन
न अहंकार बचता है,
न शिकायत,
न कटुता—
सिर्फ इंसानियत बचती है।

और वही दिन
सबसे खूबसूरत होता है—
क्योंकि तब पता चलता है
न्याय तब शुरू होता है
जब निर्णय दूसरों पर नहीं,
खुद पर लागू हो।

यही आत्मबोध
हमेशा देर से आता है—
पर जब आता है,
इंसान बदलता नहीं…
बेहतर हो जाता है।

दुख___जो मैने जिया न कि झेला


एक अरसा चाहा है उसे मैंने…
इतना चाहा कि अब एहसास होता है—
शायद वो व्यक्ति नहीं था,
एक पाठ था।

वो प्रेम नहीं,
मेरी चेतना का धक्का था,
जो मुझे जगाने आया था—
नींद कितनी गहरी थी मेरी
कि दिल टूटे बिना मैं जाग नहीं पाती।

लोग कहते हैं—
दुख इंसान को गिराता है।
पर सच यह है—
दुख वही चुनता है
जिसके भीतर उठने की क्षमता हो।

और मैंने भी दुख को
रोकर नहीं,
समझकर जिया है।

क्योंकि अगर मैं भूल जाती,
तो सीखती क्या?
अगर छोड़ देती,
तो बदलती कैसे?

कभी-कभी सोचती हूँ—
कि वो इंसान जिसका नाम अब नहीं लेती,
वो वही था,
जो मुझे मेरी असल सूरत दिखाने आया था।
उसके जाने में ही
मेरी आत्मा लौट आई।

दुख के बिना जीवन
उथला होता,
दर्द के बिना प्रेम
सतही होता,
और खोने के बिना
स्वत्व का जन्म नहीं होता।

हर आँसू ने
मेरे भीतर एक दरवाज़ा खोला—
जहाँ मैं अपने आप से मिली,
जहाँ मुझे जाना कि
“मनुष्यता, कमजोरी नहीं होती—
संवेदना होती है।”

आज जो लोग दूर हैं,
वे रहकर भी,
कभी मेरे इतने पास नहीं थे,
जितना वह दुख—
जो मेरे अकेलेपन में
मेरा सहचर बना रहा।

उसने ही सिखाया—
कि आत्मा का घर
किसी दूसरे के पास नहीं होता।
जो भीतर है
उसे बाहर ढूंढना भूल है।

और तब समझ आया—
मैं उस प्रेम से लिपटी नहीं थी,
मैं अपनी ही ज़रूरत से बंधी थी।

जिस दिन
चाहत टूटकर भी खत्म नहीं हुई,
मैंने जाना—
चाहत बंधन नहीं,
अनुभूति होती है।

और अनुभूतियाँ
छोड़ी नहीं जातीं—
बड़ी हो जाती हैं।

तो हाँ…
एक अरसा चाहा है उसे मैंने,
पर अब समझ में आता है—
कि वो व्यक्ति नहीं,
मेरा पाला हुआ दुख नहीं,
बल्कि
मेरी परिपक्वता है।

वो अब घाव नहीं,
आत्मज्ञान है।

अब वह अंदर जलता नहीं,
अंदर रोशनी फैलाता है।

क्योंकि
कुछ दुख मरते नहीं—
वे ध्यान बन जाते हैं।

कुछ प्रेम लौटते नहीं—
वे अस्तित्व के भीतर
स्थिर हो जाते हैं।

और कुछ बिछड़नें
खत्म नहीं होतीं—
वे जन्म देती हैं
एक नई स्त्री को,
जो अब प्रेम करती है—
पर अपेक्षा नहीं रखती,
जो अब जुड़ती है—
पर खोती नहीं,
जो अब मुस्कुराती है—
और मुस्कान का कारण
खुद होती है।

इसलिए कहती हूँ—
एक अरसा चाहा है उसे मैंने,
और आज जानती हूँ—
मैंने कभी व्यक्ति को नहीं चाहा,
मैंने उस अनुभव को चाहा
जिसने मुझे “मैं” बनाया।

शून्य होती अपेक्षाएं____स्त्री की शांति

स्त्री जब जन्म लेती है
तभी से सीख जाती है
पाना नहीं—देना,
माँगना नहीं—सहेजना,
चाहना नहीं—चुप रहना,
और सहना… बस सहते जाना।

उम्मीदों के पहाड़
उसके कंधों पर रखे जाते हैं—
घर की, समाज की,
सबकी ख़ुशियों की,
पर उसकी अपनी ख़ुशी?
उसके हिस्से अक्सर ग़ायब।

फिर भी वह हँसती है,
थाली में पहला निवाला सबको देती है,
अपनी इच्छाएँ परोसकर
दूसरों की भूख मिटाती है—
और भीतर की भूख
अधूरी रहती है हर दिन।

प्रेम में भी
वह पूरी उतरती है—
पर उसके हिस्से में
अधूरी वादे, आधे सच
और आधी रात में रोते तकिए आते हैं।

और फिर किसी मोड़ पर
वह थक जाती है—
भागकर नहीं,
टूटकर नहीं,
बल्कि
लौटकर… “खुद” के पास।

उस दिन वह बैठती है
आईने के सामने नहीं,
अपने आत्मा के सामने—
और कहती है,
“मैंने किसे नहीं दिया?
और बदले में माँगा क्या?”

जवाब आता है—
“बस थोड़ा सा सुनना,
थोड़ा सा समझना,
थोड़ी सी कद्र।”

बस इतना ही?
हाँ… बस इतना ही।
फिर भी न मिला।

तभी उसके भीतर
एक अग्नि और एक शांति
साथ-साथ जन्म लेती है।

वह निर्णय करती है—
अब किसी से कुछ नहीं माँगूँगी,
न प्रेम,
न समय,
न समझ,
न ठहराव।

और जैसे ही
अपेक्षाएँ शून्य होती हैं—
स्त्री बदलती नहीं,
स्त्री जागती है।

अब वह वही करती है
जो हमेशा से जानती थी—
देना।
पर अब देने में
कोई ग़ुज़ारिश नहीं,
कोई लिखी हुई शर्त नहीं,
कोई छुपी हुई याचना नहीं।

अब उसका प्रेम
उसकी शक्ति है—
कमज़ोरी नहीं।

अब उसके आँसू
पराजय नहीं—
परिष्कार हैं।

अब उसका मौन
दर्द नहीं—
स्वाभिमान है।

दुनिया वही है—
लोग वही हैं,
पर स्त्री बदली है,
क्योंकि उसने सीखा है—
“बिना चाह की मुस्कान
सबसे सुंदर होती है।”

अब कोई उसका सब कुछ नहीं—
और कोई उसका कुछ भी नहीं।
जो रहे—स्वागत,
जो जाए—आशीर्वाद।
अब दिल में भीड़ नहीं,
सिर्फ शांति है।

और वह पहली बार
अपने लिए चाय बनाती है,
एक किताब खोलती है,
खिड़की पर बैठती है,
और पाती है—
जीवन कभी भी उसके विरुद्ध नहीं था…
सिर्फ वह खुद के पक्ष में
खड़ी नहीं होती थी।

आज वह खुद के पक्ष में है।

आज वह निर्भर नहीं,
पर अनुपस्थित भी नहीं।
उसे किसी की ज़रूरत नहीं,
पर वह सबके लिए रोशनी है।

क्योंकि स्त्री तब सबसे प्रखर होती है
जब वह किसी से कुछ नहीं चाहती—
और फिर भी प्रेम करती है।

अपेक्षाएँ जिस दिन शून्य हुईं,
स्त्री उसी दिन पूर्ण हुई।
उसने दुनिया नहीं जीती—
खुद को जीत लिया।