रविवार, 8 फ़रवरी 2026

झरना

अगर झरनों की राह में पत्थर न होते,
तो उनका बहाव सिर्फ़ पानी होता—कहानी नहीं।
पत्थर झरने के दुश्मन नहीं होते,
वे उसके रचनाकार होते हैं।
हर टकराव से उसकी धुन बनती है,
हर गिरावट से उसकी पहचान उभरती है।
सीधा बहता पानी कहीं खो जाता है,
पर संघर्ष से गूंजता झरना युगों तक याद रहता है।
जीवन भी हमें ऐसे ही पत्थर देता है—
कभी रिश्तों के, कभी हालातों के,
कभी अपनों की बेरुख़ी के,
तो कभी अपने ही डर के।
हम इन्हें हटाना चाहते हैं,
पर यही तो हमें रुककर सोचने,
संभलकर चलने और मज़बूत बनने का अवसर देते हैं।
जिस दिन जीवन आसान लगता है,
समझिए उस दिन सीख कम हो रही है।
और जिस दिन कठिनाइयाँ बढ़ जाएँ,
जान लीजिए भीतर कुछ बड़ा आकार ले रहा है।
संघर्ष हमें तोड़ने नहीं आता,
वह हमें वह रूप देने आता है
जिसे देखकर हम खुद पर गर्व कर सकें।
झरना हर पत्थर से लड़ता नहीं,
वह उसे स्वीकार कर आगे बढ़ जाता है।
कभी फिसलकर, कभी छलांग लगाकर,
पर रुकता कभी नहीं।
यही उसका सौंदर्य है,
यही उसकी शक्ति।
इसलिए जब ज़िंदगी भारी लगे,
तो खुद से कहिए—
“मैं झरना हूँ,
और ये पत्थर मेरी आवाज़ बना रहे हैं।”
एक दिन यही आवाज़
किसी थकी हुई आत्मा के लिए
सुकून बन जाएगी।