पर आईने के लिए नहीं, अपने अस्तित्व के लिए।
पहला श्रृंगार मैं आत्मसम्मान से करूंगी,
विनम्र रहूंगी, पर झुकूंगी नहीं।
अन्याय को सहना मेरा स्वभाव नहीं,
गलत को गलत कहने का साहस मेरा आभूषण होगा।
दूसरा श्रृंगार मैं हौसले से करूंगी,
मुसीबतें कैसी भी हों, मैं डटकर खड़ी रहूंगी।
भय नहीं, विश्वास मेरी काजल की रेखा बनेगा।
मैं शिक्षा की बिंदी पहनूंगी,
तो संस्कारों का तिलक माथे पर सजाऊंगी।
करुणा के कंगन खनकाऊंगी,
और ममता की चूड़ियाँ हाथों में झनकाऊंगी।
ओढ़ूंगी शालीनता की चूनर,
और पैरों में बाँधूंगी कर्तव्य की पायल,
जिसकी हर झंकार मुझे याद दिलाए —
मैं स्त्री हूँ, सृजन हूँ, चेतना हूँ।
प्रेम की नथ से सजाऊंगी मुस्कान,
और लज्जा की करधनी से बाँधूंगी मर्यादा।
स्नेह मेरा श्रृंगार होगा,
और किसी का संबल बनना मेरा गौरव।
मैं दीप बनकर राहें उजियारा करूंगी,
सशक्त, सौम्य और संवेदनशील रहूंगी।
हाँ, मैं खुद को इन सब आभूषणों से सजाऊंगी —
पर मेरा सबसे सुंदर गहना होगा —
मेरी आत्मा की आभा।
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