गुरुवार, 13 नवंबर 2025

तन की बजाय मन का मरना मुक्ति है

तन का मरना तो सहज है —
मिट्टी को मिट्टी में लौट जाना ही उसका धर्म है,
पर मन का मरना…
वो तो अग्नि से भी कठिन तप है।

जिस दिन मन मर जाता है,
उस दिन व्यक्ति मरता नहीं —
वो जन्म लेता है अपने ही भीतर,
जैसे कोई कैदी अपनी बेड़ियों से मुक्त होकर
पहली बार साँस लेना सीखता है।

मन — जो चाह की लहरों में डूबा रहता है,
आकांक्षाओं का व्यापारी,
अतीत का संग्रहालय,
भविष्य की अनगढ़ मूर्ति।
जब वह थम जाता है…
तो वर्तमान अपना पूरा रूप दिखाता है —
शांत, निर्विकार, और अनंत।

तन का मरना अंत है,
मन का मरना आरंभ।
तन की मृत्यु श्मशान तक पहुँचती है,
मन की मृत्यु ब्रह्म तक।

जब मन मरता है —
तो “मैं” शब्द की दीवार गिर जाती है,
फिर न “मेरा” कुछ बचता है,
न “तेरा” कुछ शेष रहता है।
बस एक “वह” रह जाता है,
जो सबमें है,
और जिससे सब हैं।

मन के जीते हुए हम मरते हैं हर दिन —
लोभ से, भय से, मोह से,
“क्या मिलेगा” और “कौन छूट जाएगा”
की चक्की में पिसते रहते हैं।
पर जब मन मर जाता है,
तो जीवन पहली बार जीवन लगता है।

तब कोई दुख शत्रु नहीं रहता,
कोई सुख मित्र नहीं,
क्योंकि जो मुक्त है,
वो द्वैत से परे है।

मुक्ति...
वो कहीं बाहर नहीं —
वो मन के शांत होने के बाद
अपने आप प्रकट होती है,
जैसे रात के बाद उगता सूरज नहीं,
बल्कि भीतर से फूटती रोशनी।

तन की मृत्यु केवल शरीर के वस्त्र उतारती है,
मन की मृत्यु अहंकार के वस्त्र।
तन को अग्नि जलाती है,
मन को बोध।

और जब मन सचमुच मरता है —
तब कोई मृत्यु बचती ही नहीं।
क्योंकि जो मरने वाला था,
वो तो माया थी;
जो बचा, वही सत्य है —
अमृत, अविनाशी, अचल।

इसलिए —
जो मन के मृत्यु तक पहुँच गया,
वो जीवित रहते हुए भी मुक्त है,
और जो केवल तन से मरा,
वो जन्मों तक भटकता रहेगा।

🌼
“मुक्ति वही है — जब भीतर की चिताएँ बुझ जाती हैं।”

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