शायद अपने ही कथन के बिपरीत
चल रही है जिंदगी
शायद इसीलिए पल पल बदल
रही है जिंदगी
सोचा था आकाश के तारे तोड़कर
रोशन कर दूँगी
अपने बच्चों का दामन खुशियों से
भर दूँगी
शायद नाकाम हूँ मैं सिर्फ परेशानियों
का नाम हूँ।
शायद इसीलिए आज खुद से हारी हूँ
अब पता चला मैं एक नासूर सी बिमारी हूँ
दुनियां के सवालो से डर लगता है
कौन हूँ मैं ये तक भूल जाने का मन करता है,
तुम परछाई हो मेरी मेरे जीवन का तार हो
कुछ हो जाता तो क्या होता
मेरा वजूद खुद अपना मूल्य खोता
कभी कभी बस ये ही सोच कर
रो जाने का मन करता है,
दुनिया की इस भीड़ में बस खो जाने
का मन करता है...
मैं एक कवयित्री और लेखिका हूँ, जो शब्दों में अपनी भावनाओं की छवियाँ उकेरती है। यह मेरा छोटा-सा संसार है, जहाँ एहसास कविता बनकर और अनुभव शब्द बनकर जीवित हो उठते हैं।
गुरुवार, 31 मार्च 2016
मैं खुद से हारी हूँ
शुक्रवार, 4 मार्च 2016
तुम
तुम अटल हो
सत्य हो
सौभाग्य हो
तुम स्नेह से पूरित
मेरे विचारो की अभिव्यक्ति हो
मेरे हृदय में उपजी आशाओ
का तुम एक साकार रूप हो
मुझपर लगे प्रश्नचिन्हों
का विराम हो....
अतीत के काली अंधियारी
रातों के काले बादल को
चीर कर जब तुमने मुझे
नया सबेरा दिया
यकीन मानों मेरे आँखों
से ख़ुशी की जो लहर आई
उनसे धूल गयी
जीवन पर लगे वो सारे काले
धब्बे सच..
मैं फिर से बढ़ रही हूँ
सौभाग्य ख़ुशी इच्छावों
आशाओं और उम्मीदों
की चादर समेटे
अपने भविष्य की तरफ
धीरे धीरे हौले हौले..
बस एक दुवा करना तुम
सिर्फ मेरे लिए
की मेरी हर दुवा में तुम
रहना .
इस जनम,उस जनम,हर जनम
और जनम जनम..
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