रोज बुनती हूँ सपने
इरादों के मजबूत धागों से
एक एक जिरह बाँधती हूँ
मजबूत इरादों से
कही जो झरोखा नजर
आये तो एक एक जिरह
खोलती हूँ..
कुछ इस तरह से मैं
रोज अपने सपने तोड़ती हूँ
उम्र गुजर गयी धागों
को खोलते बुनते
पर आज भी सपने
अधूरे ही रहे...
टाट की पैबन्द से
कबतक छुपाऊँ आँखों
की नमी अपनी
किसको और कैसे बताऊँ
मैं कमी अपनी..
उलझे धागों की गाँठो
को रोज तोड़ती जोड़ती हूँ
कुछ इस तरह से मैं रोज
अपने सपने तोड़ती हूँ..
रिश्तों नातो की भीड़ में
मैं ऐसे खोई...
खुद अपने सपने तोड़ कर
मैं बहुत रोई...
ये ताने बाने तो जिंदगी के
चलते ही रहेंगे..
जबतक है कायनात
सपने पलते ही रहेंगे
मेरी ज़िरह ही मेरी बगावत होगी
अदावते रियायतें तो चलते
ही रहेंगे...
ऐसी बातों से ही खुद को
झकझोरती हूँ...
मैं इस तरह से रोज एक सपने
तोड़ती हूँ..
मैं एक कवयित्री और लेखिका हूँ, जो शब्दों में अपनी भावनाओं की छवियाँ उकेरती है। यह मेरा छोटा-सा संसार है, जहाँ एहसास कविता बनकर और अनुभव शब्द बनकर जीवित हो उठते हैं।
मंगलवार, 29 नवंबर 2016
टूटते सपने
जिंदगी
कभी शहद सी मीठी
तो कभी नीम सी कड़वी जिंदगी
महसूस तो होती होगी
जो आँखे रोज हँसती है
मुमकिन है कभी रोती
तो होंगी....
अपनों का प्यार
वक्त के मार पर भारी
पड़ जाता है...
कुछ मिले ना मिले पर
जख्म कुछ हल्का हो जाता है
मैं किस्सा नही हकीकत हूँ
वक्त को देखा है
रंग बदलते
स्वाद बदलते
कभी थमते तो कभी
बिना पंखो के उड़ते...
बोझिल होते तो कभी
सपनो में खोते..
हर रंग हर साँचे में ढलते
हर जेहन में पलते
हा आँखो की नमी से
रीस रीस के निकलते
नीम सी कड़वी जिंदगी को
शहद में बदलते...
सतरंगी सपनों में खोती
तो कभी थक के चूर
होती जिंदगी...
रंग बदलती जिंदगी...
मंगलवार, 22 नवंबर 2016
तजुर्बा
हमने तो जो भी लिखा तजुर्बा ही लिखा।
सीख लो जीवन क्या है और जीना क्या।।
जब ग़मे जिंदगी से बहाली ना मिले तो।
पतझड़ क्या सावन क्या महीना क्या ।।
हम तो ढूंढते ही रहे फ़क़त उजाले हरदम।
मिले जो नूर तो क्या और नगीना भी क्या।।
तमाम उम्र गुजर गयी सम्भालते खुद को।
इस जिंदगी में पाना क्या और खोना क्या।।
जो मिला कबूल है मुझको गम हो या ख़ुशी।
खुदा तेरे दरबार में अब रो रो कर जीना क्या।।
रविवार, 6 नवंबर 2016
मेरा कौन???
कभी ख़ामोशी में पूछना
खुद से या जमीर से
ये जो तुम अपनेपन का
दम भरते हो
क्या सचमुच तुम मुझपर
यकीन करते हो।
दिखावे की आँच में झुलसता
जमीर मेरा है
सच कह रही हूँ
बस जी भर रही हूँ
जीने के लिए आई थी
उम्मीद का चोला पहन कर
उतार के रख दिया
यकीन मानो तुमने मुझे
मार के रख दिया।
तुम्हे सब यूँ ही लगता है
पर पलट के देखो तो
किसी का आस जलता है
सब तो तुम्हारे है
और तुम सबके
मेरा कौन??
मेरा अस्तित्व आज फिर
मौन।
जीने की चाह में सबकुछ
गवा दिया
एक बार फिर मैंने
खुद को मिटा दिया।।
शुक्रवार, 4 नवंबर 2016
रंजोगम दिल से मिटा दो तो नजर आऊँगी
मै आइना ही हूँ एक ठोकर से टूट जाऊँगी। जज्बात नही बिखर के भी निखर जाउंगी।।
सलामतें उनके लिए मांगो जिन्हें जरूरत हो।
मै हूँ एक रूह बांधोगे तो भी भटक जाउंगी।।
हर एक शै से यहाँ उठती है गदर की ज्वाला।
सुलग रही हूँ बस एक फूंक से जल जाउंगी।।
जहाँ में रंज है गम है तो खुमारी भी है यारो।
मिला लो हाथ जो मुझसे तो संवर जाउंगी।।
दबी दबी सी खुश्बू फैलने को आतुर है देखो।
रंजो गम दिल से मिटा दो तो नजर आउंगी।।
दिव्या पाण्डेय (ऋतू)
26-10-2016