यूँ नहीं कि सिर्फ़ मेरे होंठ तुम्हारा नाम लें,
बल्कि मेरे भीतर जो अँधेरे का आख़िरी कोना है,
वहाँ भी तुम्हारी कोई हल्की-सी रोशनी ठहर जाए।
तुम मेरे भीतर की नमी को पहचानो,
मेरे शब्दों के पीछे छिपी चुप्पियों को पढ़ो,
और जब कभी मैं अपने ही सवालों में खो जाऊँ,
तुम अपने उत्तरों की तरह
धीमे-धीमे मेरे आसपास फैल जाओ।
मुझे तुम किसी बाहरी दुनिया की तरह मत देखना,
मुझे मेरी परतों में बाँधना—
जैसे नदी खुद अपने किनारे चुनती है,
जैसे चाँद खुद अपने अक्स को समंदर में ढूँढ लेता है।
तुम मेरी आत्मा में बस जाना,
वहाँ जहाँ बचपन की थकान भी लोरी बन जाती थी,
जहाँ उम्मीदें खुद को फूल समझ कर खुलती थीं,
जहाँ टूटी हुई इच्छाएँ भी
थोड़े प्यार की धूप में फिर जी उठती थीं।
मेरे मौन को सुनना—
क्योंकि मौन ही वो जगह है
जहाँ आत्मा सबसे ज़्यादा बोलती है।
तुम वहाँ मेरी हर सिसकी को अर्थ दो,
हर धड़कन को दिशा दो,
और हर टूटे हुए टुकड़े को
अपनी हथेलियों में जोड़ दो।
तुम मेरी आत्मा की आवाज़ बन जाओ—
ऐसी आवाज़,
जो किसी भाषा में बाँधी न जा सके,
जो किसी लय की मोहताज न हो,
जो किसी शब्द की क़ैदी न बने…
बस महसूस हो,
बस जिया जाए,
बस मेरी रगों में
नर्म हवा की तरह बहती रहे।
जब जीवन थककर घुटनों पर बैठ जाए,
तुम मेरी आत्मा के भीतर से उठने वाली
वो पहली हिम्मत बन जाना।
जब दुनिया शोर बन जाए,
तुम मेरा वही शांत सुर बन कर
मेरी साँसों में उतर जाना।
और जब मैं कभी टूट जाऊँ—
तो मेरी टूटन की आवाज़ भी तुम्हें पुकारे,
तुम मुझे समेटो नहीं,
बस मेरे साथ बैठकर
मेरे भीतर की खिड़कियों को
धीरे-धीरे खोल दो।
तुम मेरी आत्मा की आवाज़ बन जाओ—
यूँ कि मुझे खुद से ज़्यादा
तुम पर विश्वास होने लगे,
यूँ कि मेरा हर रास्ता
तुम्हारी आहटों से शुरू होकर
तुम्हारी दहलीज़ पर खत्म हो।
और मैं…
अपनी रूह के हर कोने में
तुम्हारा नाम उतार दूँ—
जैसे कोई प्रेम
जन्मों से अपना घर ढूँढ रहा हो,
और आखिरकार उसे
तुममें मिल गया हो।
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