ये काग़ज़ पर स्याही की कुछ लकीरें भर नहीं,
ये सदियों के संचित अनुभवों का अमृत हैं—
जहाँ अक्षर नहीं बोलते, जीते हैं,
और विराम चिह्न भी सांस लेते हैं।
किताबें…
माँ की गोद-सी नरमी लिए
चुपचाप सिर सहलाती हैं,
कभी आंसू पोंछती हैं,
और कभी उसी आंसू को कविता में ढाल देती हैं।
किताबें…
मनुष्यों की क़िस्मत बदलती हैं बिना आवाज़ के,
और किसी भी अभिमान को
नर्मी में बदल देती हैं बिना युद्ध के।
ये उन रास्तों की रोशनी हैं
जहाँ दुनिया अँधेरा कर देती है—
ये हाथ पकड़कर कहती हैं,
“चलो, तुम्हें तुम तक ले चलूँ।”
किताबें…
कभी कबीर बनकर समझाती हैं,
कभी मीर बनकर रुलाती हैं,
कभी गीता की तरह युद्ध में स्थिर करती हैं,
और कभी सूफ़ी-सी मोहब्बत में भीगा देती हैं।
किताबें…
तुम्हें शहरों की गलियों में घुमा आती हैं
बिना कदम चलाए,
तुम्हें युद्ध में लड़वा आती हैं
बिना रक्त बहाए,
तुम्हें गहराई में उतार देती हैं
बिना डुबोए।
किताबें…
रिश्ते नहीं मांगतीं,
अपनापन खुद रच लेती हैं—
तुम पलटना चाहो तो अपना देती हैं,
और बंद कर दो तो चुपचाप इंतज़ार करती रहती हैं।
किताबों में चरित्र मरते नहीं—
क्योंकि हर पाठक,
किसी पात्र को फिर से जन्म दे देता है।
किताबें…
हमारी आँखों को पढ़ने के लिए नहीं,
हमारी आत्मा को पढ़ने के लिए रची गई हैं।
ये जज़्बातों का दर्पण हैं—
जिस पन्ने पर उंगली फिराओ,
वही पन्ना तुम्हारा ही चेहरा लौटा देता है।
कभी एक किताब
पूरी इंसानियत से बड़ा सबक दे जाती है,
और कभी एक पंक्ति
पूरे जीवन की दिशा बदल जाती है।
किताबें…
लकड़ी की अलमारी में हों
या मोबाइल की छोटी स्क्रीन पर,
अपने अस्तित्व में कभी छोटी नहीं होतीं—
ये सभ्यता का आलोक हैं,
और समय की सबसे सच्ची स्मृति।
किताबें…
बिना जन्म के जन्म देती हैं,
बिना रक्त के रिश्ते जोड़ती हैं,
और बिना आदेश के
इंसानों को इंसान बना देती हैं।
और हाँ…
कभी अकेलेपन में किताब खोलकर देखना—
तुम अकेली नहीं रहोगी,
क्योंकि हर किताब में
तुम्हारा एक अधूरा हिस्सा इंतज़ार करता है
कि कब तुम उसे पढ़कर पूरा करोगी।
लेखिका परिचय — दिव्या
एक संवेदनशील, विचारशील और आध्यात्मिक लेखिका —
जो मनुष्य की भावनाओं, आत्मा और अस्तित्व को कविता और गद्य के माध्यम से उकेरती हैं।
उनके शब्द केवल पढ़े नहीं जाते, महसूस किए जाते हैं।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें