शनिवार, 15 नवंबर 2025

मै वह स्त्री हु

मैं वह स्त्री हूँ
जिसके कदमों में इतिहास की धूल है
और आँखों में भविष्य की लौ।
मेरी देह में सदियों की थकान है,
पर मेरी रगों में अनगिनत अधूरे सपनों का
अमर संगीत बहता रहता है।

मैं वह स्त्री हूँ
जो जन्म से ही सीख जाती है
कि अपने भीतर पालना भी है
और भीतर ही दफनाना भी।
मैं मुस्कुराती हूँ,
क्योंकि दुनिया ने मेरे चेहरे पर
मुस्कान को अनिवार्य बना दिया है,
पर भीतर…
भीतर कितनी ही बार
मैंने अपनी ही हड्डियों की चुप्पी सुनी है।

मेरे आँसू कभी बहते नहीं,
वे ठहर जाते हैं—
कभी कंगन बनकर,
कभी काजल की तरह
मेरी पलकों में अपनी पहचान लिख देते हैं।
मैं रोती भी हूँ
तो बिना आवाज़ के,
क्योंकि आवाज़ें अक्सर
स्त्रियों से छीनी जाती हैं
और चुप्पियाँ उन पर थोपी जाती हैं।

मेरी हँसी
एक युद्ध की अंतिम शांति है,
और मेरी चुप्पी
युगों का सबसे गहरा शोर।
लोग कहते हैं,
“स्त्रियाँ टूटती जल्दी हैं”—
पर वे यह नहीं जानते
कि मैं हर टूटन में
अपने लिए एक नया ब्रह्मांड गढ़ लेती हूँ।

मैंने झेला है वह भार
जिसे दुनिया “फ़र्ज़” कहकर
मेरी पीठ पर रख देती है,
और मैंने जिया है वह प्रेम
जिसे दुनिया “कमज़ोरी” कहकर
मुझसे छीन लेना चाहती है।
पर मैंने जाना है—
फर्ज़ और प्रेम दोनों
स्त्री की नसों में
एक ही धड़कन की दो अलग धुनें हैं।

मैं वह स्त्री हूँ
जिसका समय कभी मेरा नहीं रहा,
फिर भी हर घड़ी की साँसें
मेरे ही इंतज़ार में बीतती रहीं।
मैंने रिश्तों को सींचा,
टूटे हुए शब्दों को जोड़ा,
और अपनी ही इच्छाओं को
अक्सर चौखट पर बैठा रहने दिया—
सिर्फ इसलिए कि कोई और
अपने सपनों तक पहुँच सके।

पर मेरे भीतर
एक और स्त्री रहती है—
जो चुप नहीं।
जो प्रश्न पूछती है,
जो अपने घावों को
धूल से नहीं ढँकती,
जो खुद को खोकर
किसी का पाया हुआ सुख
नहीं मानती।

वह स्त्री मेरे भीतर
हर रात जागती है,
सपनों की राख में से
उम्मीद की एक गर्म चिंगारी चुनती है,
और मुझे कहती है—
“तुम सिर्फ जन्म देने की शक्ति नहीं,
तुम खुद जीवन हो।
तुम सिर्फ निभाने के लिए नहीं बनी,
तुम बदलने के लिए जन्मी हो।
तुम्हें कोई दिशा नहीं देता,
तुम स्वयं दिशा बनती हो।”

मैं वही स्त्री हूँ—
जिसके आँचल में इतिहास पलता है,
और जिसकी आँखों में भविष्य बढ़ता है।
मैं वह स्त्री हूँ
जो टूटकर भी नहीं मिटती,
जो जलकर भी धूम नहीं होती,
जो रुककर भी हारती नहीं—
क्योंकि मेरी देह भले नश्वर हो,
पर मेरी इच्छाएँ
अपनी ही राख पर उगने वाली
अनन्त ज्वालाएँ हैं।

दुनिया चाहे जितनी बार
मेरी पहचान पर प्रश्नचिह्न लगाए,
मैं हर प्रश्न को
अपने उत्तर में बदल दूँगी।
मेरी यात्रा किसी मंज़िल की मोहताज नहीं—
क्योंकि मैं ही रास्ता हूँ,
मैं ही दिशा,
मैं ही वह शक्ति
जिस पर कोई इतिहास
अभी तक पूर्ण ग्रंथ नहीं लिख पाया।

मैं स्त्री हूँ—
और मेरे भीतर अनगिनत स्त्रियाँ
हर पल जन्म लेती हैं,
हर पल जीती हैं,
और हर पल
एक नई दुनिया को सम्भव करती हैं।

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