खुद से खुद का परिचय बस इतना सा है...
हा कवि हूँ मैं
कविता ही मेरा परिचय
कविता ही मेरा धर्म
कविता में ही ईमान है
कविता से ही सम्मान है
क्योंकि कवि हूँ मैं...
अलंकार छंद से बधी हूँ
शब्द संयोजन से गढ़ी हूँ
हा परिपक्व नही हूँ
पर कवि हूँ मैं...
कभी भावो में बहकर
कभी आहों में जकड़कर
रोज निर्माण करती हूँ
हा रोज एक कविता गढ़ती हूँ
परिपक्व तो नही हूँ
पर कवि हु मैं....
जीवन की रीत समझना
आसान नही होता
हर इंसान में हमेशा
ईमान नही होता
गम जब भी मेहरबान होते है
लोग फिर खुशी को रोते है
सबके हालात समझना आसान नही होता
पर कवि हूँ मैं...
कभी स्वपन सजीले
कभी हालात रेतीले
गढ़ती हूँ
समझती हूं
हा परिपक्व नही हूँ
पर कवि हूँ मैं..
रोते हँसते
मस्ती में गाते
खुद में रमते
रिश्ते नातो को समझते
समाज की रीत को निभाते
एक कविता लिखती हु
क्योंकि कवि हु मैं...