शनिवार, 15 नवंबर 2025

तुम मेरा कल और आज बनोगे क्या

तुम बताओ…
क्या तुम बनोगे मेरे आज की धूप,
जो रात के तम को धीरे-धीरे पिघलाती है,
क्या तुम बनोगे मेरी सुबह की पहली हवा,
जो थकी सांसों को फिर से जीना सिखाती है?

क्या तुम बनोगे वो कंधा
जहाँ मैं अपने टूटे हुए दिनों को रख दूँ,
और तुम मुस्कुरा कर कहो—
"रुको, इन्हें फिर से जोड़ देता हूँ…"

क्या तुम मेरा आज बनोगे?
जब मेरे चारों ओर अकेलेपन का सन्नाटा
इतना गाढ़ा हो जाता है
कि दिल की धड़कनें भी सुनी नहीं देतीं,
तब तुम आकर
मेरे नाम की एक हल्की सी पुकार बनोगे?

और बताओ…
क्या तुम मेरा कल भी बनोगे?
वो कल जिसकी आँखों में उम्मीद की नीली चमक है,
जिसके हाथों में अधूरी इच्छाओं की माला,
जिसके कदमों में सपनों की नदी बहती है।

क्या तुम वो कल बनोगे
जहाँ मैं बूढ़ी होती लकीरों के बीच
तुम्हारा नाम छुपाकर रखूँ,
जहाँ मेरी जीतें छोटी हों
पर तुम्हारे साथ होने का सुख बड़ा?

क्या तुम वो कल बनोगे
जिसमें मेरे डर भी तुम्हारी बाहों में
अपने अर्थ खो दें,
जिसमें मैं बिना कुछ कहे,
सिर्फ तुम्हारी नज़र पढ़कर
सारा दिन जी लूँ?

तुम बताओ…
क्या तुम बनोगे मेरी अधूरी कहानी का
वो अंतिम अध्याय
जहाँ कोई विराम नहीं होता,
बस साथ लिखा होता है—
"हम दोनों",
और उसके आगे
समय खुद शर्माकर ख़ाली पन्ने छोड़ देता है।

क्या तुम बनोगे मेरा आज—
जो अभी मेरे हाथों की रेखाओं में थरथरा रहा है,
और मेरा कल—
जो कलियों की तरह मेरी पलकों पर उग रहा है?

बोलो न…
क्या तुम बनोगे वो पूरा जीवन
जिसे मैं तुम्हारे नाम की मिट्टी में
धीरे-धीरे,
स्नेह से,
खुद को बोकर उगाना चाहती हूँ?

तुम मेरा आज और कल बनोगे क्या?
या मैं अपनी आत्मा की तहों में
तुम्हारी प्रतीक्षा को
फिर एक बार
कविता बनाकर रख दूँ?

कहो…
मेरे साथ चलोगे क्या?
तुम मेरी जमी और विशाल गगन
बनोगे क्या?

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