बुधवार, 12 नवंबर 2025

मिलन हमारा कब होगा

रात की गहराइयों में जब तारे भी सो जाते हैं,
मैं तेरे नाम की रौशनी में आँखें भिगो जाती हूँ।
हर प्रार्थना के अंत में बस एक शब्द बचता है —
“मिलन हमारा… कब होगा?”

समय की धारा उलझी है किसी अधूरे गीत की तरह,
हम दो सुर हैं जो अब तक एक नहीं हुए।
वक्त के पन्नों पर नाम तो लिखे हैं हमारे,
पर शायद किस्मत की स्याही अब भी अधूरी है।

मैंने तुझे हर जन्म में ढूंढा —
कभी हवा बनकर, कभी धूप बनकर,
कभी प्रार्थना बनकर, कभी प्रतीक्षा बनकर,
पर हर बार तू बस "थोड़ा सा दूर" रह गया।

कभी लगता है, तू आकाश है और मैं धरती,
हम बस बारिश के मौसम में मिलते हैं।
कुछ पल की बूंदें, कुछ पल का सुकून,
फिर वही जुदाई का असीम विरानापन।

मुझे लगता है मिलन हमारा शब्दों में नहीं होगा,
वो होगा जब मेरी रूह तेरे स्वर से टकराएगी।
जब ये सांसें थम जाएँगी किसी शांति में,
और तेरा नाम आख़िरी धड़कन में समा जाएगा।

मिलन हमारा शायद समय से परे होगा,
जहाँ न दिन होंगे, न रातें,
बस एक उजाला होगा — तेरी बाँहों का,
जिसमें मैं और तू नहीं, सिर्फ़ हम होंगे।

वो मिलन न शरीरों का होगा,
न किसी मोह का, न किसी प्रतिज्ञा का,
वो होगा आत्मा का आत्मा से संवाद,
जहाँ प्रेम न कहा जाएगा, बस महसूस होगा।

कभी तो टूटेंगे ये दूरी के नियम,
कभी तो थम जाएगी ये प्रतीक्षा की नदियाँ,
कभी तो बोलेगा सन्नाटा —
“अब और नहीं, अब मिलन होगा।”

और तब —
तू मेरे भीतर समा जाएगा ऐसे,
जैसे प्रार्थना मंदिर में,
जैसे राधा श्याम में,
जैसे आत्मा अपने ईश्वर में...

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