सोमवार, 24 नवंबर 2025

दिल है कोई अखबार नहीं

मेरी किसी भी कविता में,
कहीं भी उनका नाम नहीं लिखा,
क्योंकि मेरा दिल,
किसी अख़बार का पन्ना नहीं…
जहाँ मोहब्बत छापी जाए,
और अगले ही दिन रद्दी बन जाए।

वो मेरे अक्षरों से फिसलते नहीं,
वो मेरी रगों में बसते हैं,
मैं लिख दूँ अगर उनका नाम…
तो दुनिया पूछेगी –
कौन हैं वो?
और मैं जवाब में टूट जाऊँगी।

वो राज़ हैं मेरे एहसासों का,
इश्क़ के सबसे खामोश किनारों पर
लहरों की तरह उतरते हैं।
मेरी सांसों के बीच रुककर,
मेरे दिल की धड़कन बनकर
मेरे अस्तित्व को जीते हैं।

मैंने छुपाया है उन्हें
खुद से कम नहीं…
इतना कि आहटें भी उनकी
परदों के पीछे से हौले से गुजर जाएँ।
कभी खिलखिलाहट में,
कभी सिसकियों में,
कभी बेवक्त की खामोशी में
उनकी धुनें सुनाई देती हैं।

वो सरेआम नहीं हैं…
मगर हर रात चाँद से पूछो,
मेरी आँखें क्यों चमकती हैं?
हर सुबह सूरज से कहो,
मेरी हथेलियाँ क्यों गरम रहती हैं?
ये सब गवाही देंगे
कि मेरा इश्क़ पर्दों के पीछे
कैसे रोशनी बनकर पनपता है।

लोग तलाशते रहते हैं
उनका नाम मेरे शब्दों में,
पर उन्हें क्या पता…
मैंने अपनी जुबान को चुप रहने का
वादा कर रखा है।
वो दुआ हैं, बदन पर लिखी नहीं जातीं…
वो धड़कन हैं, किसी दीवार पर टांगी नहीं जातीं…

कविताएँ छोटी पड़ सकती हैं
पर वो नहीं…
मैं अगर नाम लिखूँ उनका,
तो कागज़ जल उठेगा,
स्याही इश्क़ का बोझ न झेल पाएगी।

वो मेरे दिल में हैं —
शोर के बिना,
हंगामे के बिना,
बिन पहचान, बिन तख़ल्लुस,
नज़र से दूर, मगर अहसास से पास…

मेरी हर कविता में नाम नहीं उनका,
फिर भी हर कविता उन्हीं से शुरू,
उन्हीं पर मुकम्मल होती है।

कभी अगर पढ़ लेना तुम
मेरी खामोशी को…
तो समझ जाना —
वो वहीं हैं,
जहाँ आज भी तुम्हारी जगह है।

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