तो… बीते दिनों की खुशबू आती है,
हर हँसी के पीछे…
कुछ चेहरे झिलमिलाते हैं,
हाँ… कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं।
कभी… शाम के धुंधलके में,
चाय के प्याले से उठती भाप में,
वो बातें… फिर से घुल जाती हैं,
जिन्हें वक्त ने बहुत पीछे छोड़ दिया था।
और मैं… बस मुस्कुरा देती हूँ —
कुछ दोस्त… बहुत याद आते हैं।
ना जाने अब कौन से नगर में होंगे वो,
जो मेरे हर राज़ जानते थे,
रात गहराती है,
तो नींद आँखों से रूठ जाती है,
दिल फुसफुसाता है…
"कुछ चेहरे, बहुत याद आते हैं।"
कुछ शब्द… गुलाब की पंखुड़ियों जैसे थे,
कुछ हँसी… पहली बारिश की बूँदों सी,
अब भी जब दिल के बाग़ में जाती हूँ,
वो महक… चुपचाप लौट आती है।
वो रूठना, वो मुँह फेर लेना,
फिर बिना कुछ कहे… मान जाना,
अब तो खुद से ही जब खफा होती हूँ,
दिल कहता है —
"कुछ दोस्त… बहुत याद आते हैं…"
हाँ… कुछ दोस्त अब भी… बहुत याद आते हैं। 🌙
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