बुधवार, 10 अक्टूबर 2018

सच मे

हमने तलाशा नही
तराशा है
उन लम्हो को
जो जीवन के सुख में थे
दुःख में थे
कभी मुस्कान
तो कभी आंखों की
नमी में थे
पाने के सुख में दिखे
तो कभी खोने की कमी में थे
हमने तराशा है
उन लम्हो की
जो उजाले में थे
तो कभी अंधेरो में दिखे
कभी भीड़ में तो
कभी अकेलेपन में दिखे
हा हमने तराशा है
ओस की बूंदों को
सुबह की धूप में
धूमिल से अक्स को
उज्ज्वल से रूप में
दिन की थकान को
रातो के आराम से
मन के द्वंद को
शब्दो के अल्पविराम से
है तराशा है
तभी तो मेरे अनुभव
चमकते है
कभी आंखों में
तो कभी बातों में
कभी सूरज से रोशनी लेकर
मेरे चेहरे पर इतर उतर
हा तराशा ही तो है
खुद को
तमाम अनुभवों से....