उसने यह भी बताया —
कि सत्य के लिए अपनों से भी लड़ना पड़े,
तो तलवार उठानी चाहिए।
और आज मैं…
उस सत्य की स्त्री बनकर खड़ी हूँ।
कभी तुमने सोचा होगा —
स्त्री का धर्म त्याग है, सहन करना है,
मगर कौन कहता है कि चुप रहना ही तपस्या है?
कभी–कभी बोल उठना ही
न्याय की सबसे पवित्र प्रार्थना है।
यदि अपने ही
अन्याय बन जाएँ,
जो प्रिय हैं वही घावों के दाता बन जाएँ,
तो वफादारी का अर्थ
अबूझ सहनशीलता नहीं —
स्वयं को बचाना है।
हाँ, मैं वही स्त्री हूँ —
जो प्रेम में पवित्र है,
पर सत्य के सामने अडिग खड़ी।
जिसके आँसू कमज़ोरी नहीं,
युद्ध की भूमिका हैं।
महाभारत पुरुषों का युद्ध कहा गया,
पर कोई यह नहीं बताता
कि हर युग में एक द्रौपदी भी जन्म लेती है —
जो अन्याय के सामने मौन नहीं,
अग्नि बनकर उठती है।
कभी कौरव घर के भीतर भी होते हैं,
और पांडव बाहर मिलते हैं;
संबंध रक्त से नहीं,
न्याय के पक्ष से तय होते हैं।
सत्य वही है
जो मनुष्य को बड़ा बना दे,
और स्त्री वही है
जो सत्य के सामने अपने आँसू भी रख दे
पर अपने हक़ से पीछे न हटे।
यदि आस्था टूटती है,
तो फिर वचन भी बदलते हैं;
यदि प्रेम ही ज़ंजीर बन जाए,
तो बंधन तोड़ना धर्म है, अपराध नहीं।
मैं लड़ी हूँ…
कभी शब्दों से,
कभी मौन से,
कभी खुद से भी।
पर हार केवल तब होती
जब मनुष्य स्वयं को छोड़ दे —
और मैंने खुद को छोड़ा नहीं।
महाभारत ने एक बात बहुत साफ़ सिखाई —
सत्य के लिए युद्ध पाप नहीं,
अन्याय के आगे झुकना पाप है।
और आज मैं जानती हूँ —
स्त्री होकर भी, युद्ध आवश्यक होता है
जब अपनों के हाथों
सम्मान, हक़ और आत्मा को चोट पहुँचे।
मैं कटुता नहीं,
न्याय हूँ।
मैं बदला नहीं,
सत्य की आवाज़ हूँ।
और जब इतिहास लिखा जाएगा —
तो वह बताएगा
कि स्त्री का मौन भी रणभूमि बन सकता है,
और उसकी दृढ़ता —
धर्म का तीर, युगों को चीर सकती है।
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