दुनिया में स्त्री की पहचान किसी और के नाम से बनती है,
किसी की बेटी, किसी की बहू, किसी की पत्नी…
पर मैंने कहा —
“मैं दिव्या हूँ — और यह नाम ही काफी है।”
दिव्या
किसी सिलसिले का लेबल नहीं,
किसी रिश्ते का साया नहीं,
किसी परंपरा की ठंडी मुहर नहीं।
यह आग है —
और उसका ताप मेरे हर कदम में जलता है।
मैंने सिर झुकाकर पहचान नहीं माँगी,
मैंने सिर उठाकर पहचान गढ़ी।
उन्होंने सोचा था
कि मैं चुप रह जाऊँगी,
पर मेरा नाम आवाज़ बन गया —
और मैंने अपने शब्दों में क्रांति लिख दी।
दुनिया को आदत है
स्त्री को किसी और के नाम से बुलाने की,
पर जब मैंने कहा —
“मेरा नाम दिव्या है,”
तो समाज ने असहज होकर नज़रें झुका लीं,
क्योंकि उन्हें आज़ाद स्त्री की रोशनी चुभती है।
दिव्या
सिर्फ़ नाम नहीं —
यह मेरे वजूद की गूँज है,
मेरे घावों का साहस है,
मेरी हारों से जन्मी जीत है।
उन्होंने पूछा —
“किसकी बेटी हो? किसकी पत्नी हो? किसकी बहू हो?”
और मैं मुस्कराकर बोली —
“मैं खुद की हूँ — और यही मेरी पहचान है।”
मुझे भूमिका नहीं — अधिकार चाहिए,
भूषण नहीं — स्वाभिमान चाहिए,
बंधन नहीं — उड़ान चाहिए।
और मेरा नाम,
दिव्या,
मेरे आकाश का पहला पंख है।
दिव्या
भीड़ में खोने के लिए नहीं जन्मी,
भीड़ से अलग खड़े होने के लिए बनी है।
जो मुझे नहीं पहचानते
उन्हें पहचानने की मुझे कोई मजबूरी नहीं।
यह नाम —
झुकेगा नहीं, बिकेगा नहीं,
तोड़ना चाहोगे तो और सख़्त हो जाएगा।
यह नाम —
साहस है, विद्रोह है, स्वप्न है, स्वाभिमान है।
और मैं कहूँगी —
ज़ोर से, निडर होकर, हर धड़कन के साथ —
“मैं दिव्या हूँ।
मेरा नाम ही मेरी पहचान है —
और यह पहचान कभी झुकेगी नहीं।”
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें