मंगलवार, 11 नवंबर 2025

तुम मेरी कविताओं को महाकाव्य की तरह पढ़ना

तुम मेरी कविताओं को बस शब्द मत समझना,
इनमें मेरी धड़कनों की लय छिपी है,
हर पंक्ति में मेरा एक जन्म है,
हर विराम में एक मृत्यु।

तुम मेरी कविताओं को महाकाव्य की तरह पढ़ना,
जहाँ नायक कोई और नहीं —
मेरे भीतर जागी हुई स्त्री है,
जिसने युद्ध भी लड़े हैं
और प्रेम में भी समर्पण किया है।

इन कविताओं में अश्वमेध नहीं,
पर आत्मबलिदान है —
जहाँ अग्नि कोई यज्ञ नहीं,
बल्कि आत्मा की तपिश है,
जिसने शब्दों को सोना बना दिया है।

तुम पढ़ना,
जैसे ऋषि किसी मंत्र का उच्चारण करता है,
हर स्वर में ध्यान की गहराई हो,
हर अर्थ में युगों की गूंज।

यह पंक्तियाँ गद्य नहीं हैं,
ये समय की सिलवटों में रखे सपने हैं,
जो कभी सीते की मौनता में बोले,
तो कभी द्रौपदी के प्रश्नों में।

तुम मेरी कविताओं को महाकाव्य की तरह पढ़ना,
जहाँ प्रत्येक शब्द में कोई युद्धक्षेत्र है,
हर रूपक में कोई व्रत,
हर उपमा में कोई आह्वान।

इनमें नदियाँ हैं —
जो जन्म से बह रही हैं,
पर कभी समुद्र तक नहीं पहुँचीं,
क्योंकि उन्होंने सीखा है
अपने भीतर सागर बनना।

मेरी कविताएँ कोई कहानी नहीं कहतीं,
वे इतिहास रचती हैं —
जहाँ स्त्री अपने अस्तित्व की गाथा
स्वयं लिखती है,
बिना किसी कवि के कलम की भीख माँगे।

तुम इन्हें महाकाव्य की तरह पढ़ना,
जैसे हर पंक्ति में एक कालखंड सोया हो,
और तुम्हारा मन उसे जगाने जाए —
धैर्य से, श्रद्धा से, विस्मय से।

क्योंकि जब तुम पढ़ोगे
इन शब्दों को उस दृष्टि से,
तब जान पाओगे —
मैं कवयित्री नहीं,
एक युग हूँ जो स्वयं को कह रहा है।

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