और जब ज़िंदगी उलझा दे—तो गीता से खुद को खोज लेना।
क्योंकि
राम की तपस्या सिर्फ़ युद्ध का आख़्यान नहीं,
मर्यादा के पथ पर चलती मानवता का प्रमाण है,
जहाँ वचन सिंहासन से बड़ा था,
और सत्य—स्वयं भगवान था।
सीता के आँचल में त्याग की चाँदनी थी,
लक्ष्मण की रेखा कोई क़ैद नहीं,
बल्कि सम्मान का आभूषण थी।
हनुमान की उड़ान शक्ति नहीं,
निष्ठा की पहचान थी।
रामायण कहती है—
जीत का अर्थ रावण को जलाना नहीं,
अपने भीतर की अहंकार की अग्नि बुझाना है।
इसलिए अगर मर्यादा सीखनी हो—
तो रामायण पढ़ना,
क्योंकि वहाँ हर पात्र बोलता है—
"राज्य से बड़ा धर्म है,
और धर्म से बड़ा मनुष्य का चरित्र।"
और
जब जीवन के प्रश्न तलवार बनकर गर्दन पर रखे,
जब रिश्ते किवाड़ बनकर बंद होने लगें,
जब मन का अशांत सागर किनारों को तोड़ने लगे,
तब—
गीता को खोल लेना…
उसे पढ़ना नहीं, महसूस करना।
वह सिखाती है—
कर्म समाधान है,
परिणाम की चिंता कैद है,
और भय—मन का सबसे बड़ा शत्रु।
गीता कहती है—
“स्वयं से युद्ध ही सबसे बड़ा युद्ध है,
और स्वयं पर विजय ही सच्ची जीत।”
कृष्ण की मुस्कान समझ आ गई तो—
हार भी शांति बन जाती है,
उलझन भी साधना बन जाती है।
वे बताते हैं—
जीवन पांव पकड़कर रोकने नहीं आया,
चलाना सिखाने आया है।
रुकना दुख देता है,
और आगे बढ़ना मोक्ष।
इसलिए अगर कभी
दिल थक जाए,
मन बिखर जाए,
और जीवन सवालों का तूफ़ान बन जाए—
तो युद्ध मत छोड़ना,
बस अर्जुन बन जाना,
और गीता से फिर खड़े होना।
मर्यादा—रामायण से,
और समाधान—गीता से,
मनुष्य का जीवन इन दोनों के बीच की यात्रा है।
जो इसे समझ गया—
वही प्रेम करता है, वही जीता है, वही जीतता है।
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