शुक्रवार, 28 नवंबर 2025

तुम गए तो.....

तुम गए तो ज़िंदगी नहीं रुकी…
पर हर धड़कन ठहरकर पूछती है —
जिसके लिए धड़कना था, वो कौन था?
जिसको पुकारना था, वो कहाँ गया?

राहें अब भी मोड़ों तक जाती हैं,
मगर किसी मंज़िल का नाम नहीं बचा,
आँखें अब भी सपने बुनती हैं,
पर तकियों पर कोई शाम नहीं बचा।

तुम गए तो शहर वही है,
पर गलियों में पहचान नहीं रही,
आईनों में चेहरा मेरा है,
पर आँखों में वो जान नहीं रही।

हवा पहले भी चलती थी,
पर अब उसका कोई मतलब नहीं,
चाँद कभी अपना लगता था,
अब उससे कोई रिश्ता नहीं।

तुम गए, तो मैं नहीं टूटी—
मैं बस ख़ुद से दूर चली गई,
जीने की आदत जैसे रही,
पर ज़िंदगी… बस ज़िंदा सी रह गई।

अब हर खुशी आधी लगती है,
हर जश्न में खामोशी है,
भीड़ भरी महफ़िल में भी
तन्हाई सबसे ज़्यादा रोशन होती है।

कभी तुमसे बात की तरह
आजकल ख़ुद से बातें करती हूँ,
पहले सवाल कम होते थे,
अब जवाबों की खोज में मरती हूँ।

लोग कहते हैं — "समय सब ठीक कर देता है"
पर उन्हें क्या पता…
कुछ दर्द ठीक नहीं होते,
हम बस उन्हें जीना सीख लेते हैं।

तुम गए… पर दिल ने जाना,
वियोग भी एक प्रेम होता है,
कभी मिलना लिखे न हो—
तो बिछड़ना भी सनम एक नेम होता है।

मैं अब भी हर रात सोने से पहले
उसी आसमान को देखती हूँ,
सोचती हूँ तुम भी वही देख रहे होगे,
फर्क बस इतना है—
तुम आगे बढ़ गए…
और मैं वहीं रुकी हूँ जहाँ तुम छोड़ गए।

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