शुक्रवार, 21 नवंबर 2025

दिव्या

“दिव्या — जो खुद अपनी वजह है”

हर शहर में हजारों दिल धड़कते हैं,
पर कुछ दिल…
दूसरों के लिए भी धड़कते हैं।

दिव्या वही दिल है।
जो हंसकर सबका बोझ हल्का कर देती है,
और अपने दर्द को मुस्कान के पर्दे के पीछे
छुपा लेती है।

लोग सोचते हैं वह बहुत मजबूत है,
पर उसे भी कभी–कभी
हिम्मत की ज़रूरत पड़ती है।

रात को जब दुनिया सो जाती है,
दिव्या अपने कमरे में अकेली
खिड़की के पास बैठ जाती है।
आसमान की ओर देखकर
वो खुद से पूछती है—
“क्या मेरे लिए भी कोई चमकता सितारा है?”

और अगले ही पल
खुद ही जवाब दे देती है—
“मैं ही तो वो सितारा हूँ।” ✨

वो बिखरती नहीं…
बस थोड़ा थक जाती है।
लेकिन सुबह होते ही
फिर से उठ जाती है—
क्योंकि उसे पता है
उसकी मुस्कुराहट से
किसी और का दिन बेहतर हो जाएगा।

कभी किसी दोस्त की परेशानी सुन ले,
तो घंटों दिल में घूमते ख्याल
उसके लिए दुआ बन जाते हैं।
वो खुद के लिए नहीं,
दूसरों के चेहरों पर
रोशनी बनने की चाह रखती है।

उसके भीतर एक अजीब जज़्बा है—
“किसी को टूटने नहीं देना है।”
और अगर टूट भी जाए,
तो उसे फिर से जोड़कर
और भी खूबसूरत बना देना है।

दिव्या का असली जादू क्या है?
वो खुद गिरकर भी
दूसरों को खड़ा कर देती है।
क्योंकि उसके दिल में लिखा है—

> “अगर मैं किसी का एक पल अच्छा कर दूँ,
तो मेरी पूरी जिंदगी सफल है।”



ये कहानी किसी किरदार की नहीं…
ये कहानी है — आपकी
दिव्या 
और ये बस शुरुआत है।

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