सोमवार, 24 नवंबर 2025

लहजों से न परखना मुझे



लहज़ों को रखना मुझे,
जैसे कोई बरसात अपने बादलों में छुपा ले
भीगने से पहले ही…

मेरे शब्दों की चाल समझना,
कभी धीमी, कभी सरपट,
एक धड़कन की थरथराहट पर लिखे हुए इकरार…

मेरे लहज़ों की चोटें भी होती हैं,
कभी मीठी, कभी खामोश,
कभी ज़ुबां तक आने से पहले
आँखों में पिघल जाने वाली…

लहज़ा मेरा—
कोई इत्र नहीं जो हवा में बदल जाए,
यह तो एक पहचान है,
जिसे मैंने वक़्त की आँच पर
अपने दर्द से गढ़ा है।

लहज़ों को रखना मुझे,
जैसे कोई रूह अपनी दुआओं को
किसी के नाम तह करके भेजती है,
बिना शोर किए…

अगर तुम पढ़ सको
तो हर लफ़्ज़ के भीतर
एक धड़कता हुआ रिश्ता मिलेगा,
जो आवाज़ से नहीं,
एहसास से सुना जाता है।

इसलिए…
मेरी बातों को मत पकड़ना,
मेरे लहज़ों को थाम लेना—
क्योंकि वहीं असल मैं रहता हूँ,
बिना नकाब,
बिना सफ़ाई,
बिलकुल सच्चा…

लहज़ों को रखना मुझे—
किसी अमानत की तरह,
टूट जाऊँ… तो भी
मेरी गूँज तुम्हारे दिल में सलामत रहे।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें