समाज किसका होता है?
उन हाथों का, जो ईंट उठाकर शहर बनाते हैं?
या उन कंधों का, जो नियमों के बोझ तले झुक जाते हैं?
किसका होता है समाज —
उन कलमों का, जो कानून लिखती हैं?
या उन उँगलियों का, जो मगध से लेकर मगध तक
बस हस्ताक्षर भर कर पाती हैं?
समाज किसका होता है?
उन अमीरी के शीश-महल का
जहाँ खिड़कियाँ भी परदों के पीछे सांस लेती हैं?
या उन झोंपड़ियों में
जहाँ धुआँ भी छत न पाकर
बच्चों का भविष्य काला कर देता है?
ये समाज…
किसका होता है?
उन नज़रों का
जो लोगों को दर्ज़ों में बाँटती हैं?
या उन आँसुओं का
जो दर्ज़ा पूछकर गिरना नहीं सीखते?
समाज…
क्या वो स्कूल की हवा में तैरती
अंग्रेज़ी उच्चारण की धुन है?
या वो छात्रा की ठिठुरती चुप्पी
जिसे अपनी ही भाषा में
कभी उतना मान नहीं मिलता?
ये किसका समाज है?
जहाँ लड़की होने पर सवाल होते हैं
और लड़का होने पर अधिकार?
जहाँ परंपराएँ बेड़ियाँ बन जाती हैं
और संस्कृति का नाम लेकर
स्वतंत्रता की उँगलियाँ तोड़ दी जाती हैं।
समाज…
उनके नाम पर चलता है
जो मंचों पर भाषण देते हैं,
पर बनता है
उनके पसीने से
जो चुपचाप रोज़ ज़िंदगी ढोते हैं।
समाज, उस माँ का होता है
जो बेटे-बेटियों में फ़र्क नहीं करती,
उस पिता का
जो अपनी बेटी के सपनों में
पंख लगाता है, पहरा नहीं।
समाज, उस शिक्षक का होता है
जो ज्ञान को जाति में नहीं,
मेहनत में तौलता है।
समाज, उस बच्ची का होता है
जो खिलौनों से नहीं
हक़ से खेलना चाहती है।
समाज, उस औरत का होता है
जो चुप नहीं रहती—
न घर में, न ऑफिस में, न सोच में।
वो अपने प्रश्नों से
पुराने दरवाज़ों की कुंडियाँ तोड़ती है,
वो अपने उत्तरों में
नई दुनिया की नींव डालती है।
हाँ—
समाज उन्हीं का होता है
जो डरकर पीछे नहीं हटते,
जो अन्याय को देखकर
आँखें नहीं मोड़ते,
जो आवाज़ को बंद करने वाले हाथों से
कलम छीनकर कहते हैं—
“समाज हम हैं!”
हम जो जीते हैं
हम जो बदलते हैं
हम जो भविष्य को
रोज़ थोड़ा-थोड़ा लिखते हैं।
समाज किसी एक का नहीं—
हर उस दिल का होता है
जो इंसानियत के नाम पर धड़कता है।
जो बराबरी की धरती पर
अपना कदम जमाकर कहता है—
“यह समाज मेरे लिए भी है
और मैं भी इस समाज के लिए।”
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