बुधवार, 26 नवंबर 2025

एकांत का अलाप

एकांत से डरना कैसा?
वही तो सबसे पवित्र स्थान है
जहाँ दिल और दिमाग
पहली बार बिना जंग लड़े
एक-दूसरे की भाषा समझते हैं।

भीड़ में हम जीते हैं,
पर खुद को कभी नहीं सुनते।
लोगों की आवाज़ें इतनी ऊँची होती हैं
कि अपनी ही धड़कन खो जाती है।
मगर एकांत —
वह शांत कमरा है
जहाँ आत्मा पहली बार
अपने नाम से पुकारती है।

एकांत में तुम टूटते नहीं,
तुम खुलते हो।
तुम गिरते नहीं,
तुम गिरावटों का कारण समझते हो।
तुम अकेले नहीं होते,
तुम अंततः अपने साथ होते हो।

यही वह जगह है
जहाँ दिल बोलने लगता है
और दिमाग उसे बीच में टोकता नहीं।
यही वह जगह है
जहाँ सोचों की भीड़ नहीं,
सच्चाइयों की रोशनी होती है।

लोग कहते हैं —
अकेले रहोगे तो टूट जाओगे,
पर सच्चाई है —
अकेले रहकर ही
अपने बिखराव को जोड़ पाओगे।

क्योंकि भीड़ तुम्हें वह नहीं देती
जो एकांत देता है —
एक मुलाक़ात तुमसे।
और दुनिया में सबसे कठिन
और सबसे खूबसूरत मुलाक़ात
यही होती है।

एकांत वह दर्पण है
जिसमें तुम
अपने चेहरे नहीं,
अपनी आत्मा देखते हो।
जहाँ तुम दूसरों की कहानी नहीं,
अपनी कहानी पढ़ते हो।

कभी-कभी
रोना भी पड़ता है,
झुँझलाना भी पड़ता है,
बीते वर्षों पर सवाल भी उठते हैं —
मगर फिर अचानक
एक हल्की सी समझ आती है —
कि जो गया, उसी ने मुझे बनाया है।

एकांत सज़ा नहीं,
शोध है।
अकेलापन बीमारी नहीं,
पुनर्जन्म है।
और जो एकांत से नहीं डरता,
वह स्वयं से प्रेम करना सीख जाता है।

इसलिए अब मैं
अकेलेपन से भागती नहीं —
उससे मिलती हूँ,
चाय की तरह घूँट–घूँट पीती हूँ,
और उसमें छिपे ज्ञान को
धीरे–धीरे समझती हूँ।

क्योंकि एकांत यही सिखाता है —
कि खुशी खोजनी बाहर नहीं,
निर्माण करनी भीतर है।
और प्रेम माँगना नहीं,
उगाना है —
पहले अपने लिए।

एकांत वह रात है
जो सुबह बनकर लौटती है।
और जो इस रात को सह ले —
वह सुबह के लायक हो जाता है।

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