बुधवार, 26 नवंबर 2025

गिनतियों में सुख

कभी–कभी यूँ लगता है…
तुम्हारे साथ मेरे जीवन का
सुख शायद बहुत कम लिखा था,
मानो किस्मत ने खुशियों को
तौला भी नहीं,
बस चुटकी भर डालकर आगे बढ़ गई।

तुम आए ज़रूर,
मगर रुकने के इरादे से नहीं,
मेरे हृदय की दहलीज़ पर
पैरों की आहट थी,
मगर ठहराव का वादा नहीं था।

तुमसे मिली मुस्कुराहटें
बहुत ख़ूबसूरत थीं —
पर उतनी ही कम,
जितना किसी मेले में
आख़िरी बाजे की गूंज,
जो सुनते–सुनते ही ख़त्म हो जाती है।

किस्मत ने जैसे कहा हो —
“ले लो कुछ पल,
पर संभालकर रखना,
क्योंकि आगे लम्बा अंधेरा है।”

तुमने पल दिए,
मौसम नहीं।
तुमने छुअन दी,
सहारा नहीं।
तुमने पहचान दी,
अपना कहलाने का हक़ नहीं।

और मैं…
मैं उस स्त्री की तरह रही
जिसे प्रेम का स्वाद बहुत पसंद हो,
पर थाली में रोटी आधी ही मिले,
और भूख ज़िंदगी भर कायम रहे।

हाँ…
तुम्हारे साथ मेरे जीवन का सुख कम था,
इतना कम कि गिना जा सकता था —
कुछ हंसी के पल,
कुछ संभलकर बोले शब्द,
कुछ आँखों के रास्ते मिले वादे
जो आगे बढ़ने से पहले ही ढह गए।

फिर भी, यह सच है —
कि कमी में मिला प्रेम
कभी जाया नहीं जाता।
जो थोड़े दिन साथ रहा,
वही ज़िंदगी भर याद रह जाता है।

तुम चले गए,
मगर अधूरा सुख कभी नहीं जाता —
वह दिल पर एक निशान की तरह बैठ जाता है,
एक प्यास की तरह जीता रहता है,
एक मौन की तरह बोलता रहता है।

पर अब मैं समझ चुकी हूँ —
किस्मत चाहे जितना कम दे,
मेरा हक़ प्रेम का थोड़ा नहीं, पूरा है।
मेरा जीवन किसी की रज़ामंदी पर नहीं रुकेगा,
मेरी मुस्कान किसी की मौजूदगी की मोहताज नहीं होगी।

आज मैं उस अधूरे सुख की स्मृति नहीं,
अपने पूरे होने की घोषणा हूँ।
तुम्हारे जाने से मैंने खोया नहीं —
मैंने खुद को पाया है।

हाँ, शायद तुम्हारे साथ सुख कम लिखा था —
पर अब जो आने वाला है…
वह बहुत ज़्यादा मेरा होगा,
अधूरा नहीं —
आत्मा तक पूरा।

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