जीवन वही है जो दिखाई दे,
पर दिव्या जानती है—
जीवन वह भी है
जो आँखों से नहीं,
अंदाज़ों से भी नहीं,
केवल अनुभवों से समझा जाता है।
दिव्या के लिए जीवन
भेंट और परीक्षा दोनों है।
जहाँ हर दर्द एक अध्यापक है,
और हर खुशी—
क्षणिक सही, पर सीख अमर छोड़ जाती है।
वह मानती है—
रिश्ते जरूरी हैं,
पर खुद से रिश्ता —
सबसे जरूरी।
क्योंकि दुनिया हर दिन बदल सकती है,
पर भीतर की सच्चाई नहीं।
दिव्या ने जाना है—
हार किसी भी मोड़ पर मिले,
पर हार को स्वीकार करना
सबसे बड़ी हार है।
उसकी नज़र में साहस
तलवार या शोर नहीं,
बल्कि यह कहने का हौसला है—
“मैं अभी टूटी नहीं हूँ।”
वह जानती है कि
खामोशी भी कभी-कभी
सबसे तेज़ चीख होती है।
इसलिए वह चुप रहकर भी
अपनी कहानी लिखती रहती है—
बिना कागज़, बिना स्याही।
दिव्या जीवन को
दौड़ नहीं मानती,
बल्कि सफ़र मानती है—
जहाँ दिशा का चुनाव
दूसरे नहीं,
वह खुद करती है।
गलतियाँ?
वो भी की हैं उसने।
पर वह समझती है—
गलतियाँ वे निशान हैं
जो बताते हैं कि आपने
जीना आज़माया है।
वह अपना रास्ता
तारों से नहीं पूछती,
वह अँधेरे में भी
अपनी रौशनी खुद ढूँढ लेती है।
दिव्या का जीवन-दर्शन सीधा है—
> “मैं वही बनूँगी
जो मैं खुद चुनूँ।
दुनिया नहीं बताएगी
मेरी क़ीमत…”
क्योंकि उसकी पहचान
किसी मंज़िल से नहीं,
उस हौसले से बनती है
जो हर गिरावट के बाद
कहता है—
“चलो, फिर से शुरू करते हैं।”
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