मंगलवार, 27 अक्टूबर 2015

मेरे मिटने से पहले

मुझे फर्क नही पड़ता
रूप का श्रृंगार का
शर्त बस इतनी ही है की
सोच सही और दिल सच्चा हो
इंसानियत बसी हो रग रग में
जवाँ हो समझदारी
पर दिल बच्चा हो
रूप का क्या
माटी ही तो है
हल्की सी बारिश में गल जायेगी
तेज धुप में बदल जायेगी
बस एक ख्वाहिश है
जिंदगी तेरे
बीतने से पहले
कुछ ऐसा हो मेरे नसीब की
रेखाएं मिटने से पहले
किसी की के नसीब में उजाला ला सकूँ
किसी भूखे को रोटी खिला सकूँ
किसी के आँसू हर लूँ
किसी का दामन खुशियों से भर दूँ
मरे तो माटी मरे
#वजूद में जिन्दा रहूँ हरपल पल पल!!

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2015

नजर आता है

आईना तुझमे मुझे एक शहर नजर आता है।
फिजाओं में घुला है जो जहर नजर आता है।।

झुग्गियाँ जल गयी बदनसीबो की देखा मैंने।
उनके पीछे की हर एक वजह नजर आता है।।

मांग कर भी नही मिलता जिन्हें जीने के लिए।
उनके चेहरे का हर एक सन्ताप नजर आता है।।

रोज घुटता है दम मेरा आईने में किस तरह।
अब तो हर चेहरे में मुझे पाप नजर आता है।।

खुद से टुटा है वजूद ए शहर देख तो जरा।
जाने क्यों आज हर एक वजह नजर आता है।।

रविवार, 18 अक्टूबर 2015

मेरी सोच

सोच रही हूँ आजकल
कलम को एक नई दिशा देदूँ।
जिंदगी तो चलती ही रहेगी
एहसासो के साथ
या एहसासों के परे
माथे की लकीर हो
या हाथो की लकीर
बदलना है तो
बदल जायेगी
नही लिखना मुझे
कोई दर्द कोई फ़साना
अब लिखूँगी वही
जो जमाना बोलता है
साकी का पैमाना बोलता है
समाज की जटिलताएं
लोगो की भावनाएं
राजनीति के रंग
और आपस के जंग
जिनकी वजह से
इंसानियत है तंग
होगा कुछ प्रतिकार कलम का
बदलेगा आकार कलम का
कुछ विरोध की भावना होगी
कुछ बातो में सद्भावना होगी
मानवता की बाते होंगी
अद्भुत दिन और रातें होंगी
कलम चाहती है
बदल दूँ ढंग
एक बार चलो
फिर जमा इस खामोश
स्याही का रंग
अपनी माटी के संग
देश की थाती का रंग
मेरी कलम पर चढ़ी है
आज फिर से
#मेरे_देश_की_माटी_का_रंग

गुरुवार, 15 अक्टूबर 2015

कुछ भी नही

जिंदगी तेरा अहले एहसान बस इतना ही रहा।
जीने के लिए दिया दर्द के सिवा कुछ भी नही।।

घर तो कबका बदल चुका था मकानों की तरह।
है जहाँ हम वो दीवारों के सिवा कुछ भी नही।।

मेरा कातिल निकला माहि जो दिल में रहता था।
उसको कहना है बेगानो के सिवा कुछ भी नही।।

ख्वाब जितने थे मेरे आँखों में वो जल गए सारे।
सुखीदरिया में अब नमी के सिवा कुछ भी नही।।
#दिव्या

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015

ये कलयुग है

जिंदगी के रंग मंच पर कितना नाटक कर लिया।
बिना आग लगे ही गैरो को देख कर जल लिया।।

अपनी चादर छोटी पड़ी तो ताक लगाई दूसरी ओर।
वो प्यासा ही मर गया और अपनी गागर भर लिया।।

झूठ ओढ़कर निकल गए फिर मासूमियत के हाट में।
कुछ इंसा मासूम मिले तो उनका सुख फिर हर लिया।।

खुदगर्जी की दुनियाँ में किसी का सपना किसी का सच।
कैसे अपना ईमान गिरा के फिर से इसने छल किया।।

भरम तोड़ दो कलयुग है ईमान नही दीखता यहाँ अब।
रंग मंच पर आकर देखो किसको क्या किरदार मिला।।
  

सोमवार, 12 अक्टूबर 2015

एक सच

दोपहर तक बिक गया बाजार का हर एक झूठ,
और मैं एक सच लेकर शाम तक बैठी रही।।

हजार चेहरों से रूबरू हुवा वजूद मेरा लेकिन।
सच का चेहरा ना दिखा मै शाम तक तकती रही।।

काश! की खोज रही काश! की बुलन्दी तक।
हर एक झूठ में उस काश! को ढूँढती ही रही।।

बोलबाला है आज भी बाजार में झूठ का देखो।
एक सच के साथ मै धुप में हर बार ही जलती रही।।

बेनकाब होगा किसी रोज झूठ का परदा यारो।
जिसके आड़ में ये मुफलिसी आज तक पलती रही।।

बुधवार, 7 अक्टूबर 2015

नन्ही गौरैया

मन के आँगन में उतरती है
हर सुबह एक नन्ही सी गौरैया
उछलती कूदती
पंखो को फैलाकर अटखेलियां
करती,
न जाने रोज कितने सन्देश लेकर
आती जीवन के....
मै अक्सर उसके साथ खेलती
उसके नन्हे पंखो को सहलाती
उसकी आँखों में झाँकती
ऐसा लगता मानो वह
चहचहाकर मुझसे कहती
तू तोड़ धरातल की बंदिशों को
मेरे पंख भी नए है
और तेरे सपने भी
आ तू मुझे उड़ना सीखा दे
मै भी तुझे पंख पसारना सीखा दूँ
तोड़ बेड़िया
घर की चहारदीवारी से कुछ
आगे बढ़ एक नए
आसमाँ की तरफ..
वह नन्ही गौरैया रोज देती
मुझे जीवन का एक नया
सन्देश~~~~~~
#सुप्रभात

रविवार, 4 अक्टूबर 2015

सोच बदलो

दोस्तों आज वक्त और हालात दोनों बदल गए है आधुनिकता की दौड़ में हम इतने आगे निकलते जा रहे है की समय के साथ हमारी सोच भी बदलती जा रही है जिसका प्रभाव हमारी संस्कृति और सभ्यता पर भी पड़ रहा है। वक्त के साथ आगे बढे ये तो एक हद तक ठीक है पर ऐसा ना हो कीवक्त की आँधी में हम बह जाए और सबकुछ हमसे छूट जाए। मिले तो बस एक तिश्नगी की हमने क्या खोया और क्या पाया~~~

है इस जहाँ में बेशुमार आदमी।
पर खुद में ही है बेजार आदमी।।

खुद बर्बादियों की वजह बन गया।
फिर भी टुटा नही खुमार आदमी।।

साथ मंजर वो सारे बिखर से गए।
है कितना खुद में खुद्दार आदमी।।

शौक सीढ़ी बना के बढ़ तो गया।
पर अंदर ही अंदर बीमार आदमी।।

जिंदगी वक्त के साथ ढल जायेगी।
और हो जाएगा तू लाचार आदमी।।

चल बदल सोच दुनियाँ में रहकर जरा।
वक्त मिलता नही है हर बार आदमी।।

शनिवार, 3 अक्टूबर 2015

एक उड़ान सपनो की

कोई सपने सजाता है आँखो में
तो कोई ठोकर मार कर आगे
बढ़ने की कोशिश करता है
क्या वास्तविक जिंदगी में जीने
के लिए है कुछ इन
सपनो के सिवा...
जीवन में उड़ान की एक सोच
कैसे उभरती है
आखिर सोच भी तो सपनो का
एक हिस्सा ही होता है
हा मैंने सुना है कुछ एक से
जीने का मकसद ही
ख्वाब को पूरा करना है
तो सच तो है ना
बिना सपनो के जीना कैसा
तुम ही कहो क्या
रखा है जीने में इन
सपनो के बिना...
मेरी इन जागती आँखो में
भी पलता है
एक ख्वाब जज्बातों का
रोज निकलता है
जज्बा बनकर
छूता है मन की खामोशियो को
और हँसाता है बेरंग सी
दुनिया को मेरे
फिर क्यों सोचूँ कुछ और मै
चलो आज उड़ान भरती हूँ
मै भी
एक अनुभूति को साथ लेकर
अनन्त आकाश में
पंख पसारे
अपनों के लिए
अपने
सपनो के लिए
बस एक उड़ान...

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2015

दिल तोड़ दिया

दिल चाहा जज्बात से खेला
दिल चाहा दिल तोड़ दिया।
अहसासों के गहरे उतरकर।
मांझी ने कश्ती मोड़ दिया।।

उनसे क्या उम्मीद करुँ अब
जिसने दिल से मेरे खेला है।
इश्क का एक खिलौना देके
दिल का खिलौना तोड़ दिया।

दर्द भरी एक दरिया हूँ मै।
रोज आँख से बहती हूँ।
उसको इसमें बहा ले जाऊ।
जिसने मुझको तोड़ दिया।

दुनियाँ के बाजार में अब तो
साथ मेरे मेरा साया बस है।
गम मेरा मझधार हो गया।
जबसे उसने मुझे छोड़ दिया।।

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2015

वृद्ध दिवस पर

बड़े नाजो से पाला था सारे दुःख सह गयी।
पर अभागन माँ मै आज अकेली रह गयी।।

बेटा जो मेरे सारे जीवन का एक सहारा था।
उसी बेटे ने एक दिन मुझे घर से निकाला था।।

उमर का क्या अब थोड़े दिन का ही गुजारा है।
चली जाऊ दुनियाँ से यहाँ अब क्या हमारा है।।

उसे ना धूप लग जाए मेरा आँचल सहारा था।
कह दिया फर्ज था तेरा जो तूने खुद उतारा था।।

चलो तुम्हारी ख़ुशी की खातिर मै सब सह गयी।
इसीलिए तो अपने अंत में मै अकेली रह गयी।।

खिला के पेट भर खाना उसे भूखी ही सोती थी।
रोता था मेरा बच्चा अगर तो मै भी रोती थी।।

मेरी ममता का मोल नही उसको गवारा था।
यही सोच कर उसने मुझे घर से निकाला था।।

कोई बात नही मै बोझ थी उसके जमाने की।
तभी तोकोशिश की शायद मुझको भुलाने की।।

मगर एक बात सुन बेटे आखिरी वक्त है मेरा।
भेज दे कफ़न मेरे लिए क्योंकि तू लाल है मेरा।।

मुझे अब तेरे कन्धों का नही कोई सहारा है।
इसीलिए तो तुमने मुझे घर से निकाला है।

तुझे आशीष है मेरा तेरी दूनियाँ महक जाए।
तेरा बेटा तुझे हक दे तू हरदम घर में रह जाए।।

तेरी बगिया भरी हो चाँद आँगन में उतर जाए।
तू दुनिया में हमेशा खूब खुदा की रहमते पाये।।

एक नया एहसास

जिंदगी के उतार चढ़ाव में जब मन कुछ व्यथित होने लगे...आशा और प्रत्याशा युद्ध की स्थिति उत्पन्न करने लगे...और हृदय में तमाम ज्वार उठने लगे..तब इस युद्ध की स्थिति पर विराम लगाने के लिए लिखने बैठ जाइए...कलम और कागज जीवन के वो मित्र है जो आपकी हर बात को सहजता से सुनते है...यकीन मानिए लिखने से बहुत सुकून मिलेगा..जैसे मुझे मिला..आत्म मन्थन की कुछ पंक्तिया आपके साथ...

बहुत दूर थी मंजिल मेरी और कठिन था रास्ता।
ना कोई पहचान थी और ना किसी से था वास्ता।
तुम मिले और मै चली, मै से फिरमै भी हम हुयी।
मिल गया एक कारवाँ फिर मिल गयी मंजिल नई।
साज सुर सब साथ है गीत सब लब पर सजे।
गम भी सारे मिट गए जब साथ मेरे तुम हँसे।