मानो भीतर का समंदर
अपनी लहरें समेटकर
किसी अनजाने किनारे पर सो गया हो।
अब शोर भी नहीं होता,
बस एक ऐसी खामोशी है
जो आत्मा के कान तक चिपक जाती है।
न जुबां कुछ कहती है—
वो भी जैसे मेरी थकान की चादर ओढ़े बैठी है,
कभी-कभी होंठ हिलते हैं
पर आवाज़…
आवाज़ मानो कहीं बीच रास्ते
अपना पता ही भूल जाए।
दिल को समझाना चाहूँ
तो वो मेरी ही उँगलियों को पहचान नहीं पाता,
और मैं उसे—
एक टूटी हुई रौशनी की तरह
थाम तो लेती हूँ
पर जल नहीं पाती।
कलम का हाल भी अजीब है—
स्याही अभी सांस लेती है
पर काग़ज़ से मिलना नहीं चाहती,
जैसे हर शब्द
मेरे खिलाफ कोई मुकदमा दर्ज कर चुका हो—
कि मैंने उन्हें बहुत बार
दर्द की चौखट पर खड़ा किया है।
कभी लगता है
मैं खुद से उतर रही हूँ धीरे-धीरे,
जैसे कोई नदी
अपने ही किनारों को भूलकर
रेत में रिसने लगे।
पर फिर भी…
इस खालीपन में कहीं
एक अनसुना स्पर्श बचा हुआ है—
बहुत मामूली, बहुत हल्का,
पर उतना ही सच—
जैसे कोई पुरानी उम्मीद
मेरी पलकों के किनारों पर
चुपके से धूप रख जाती हो।
शायद वही धूप
किसी रात मेरे अंदर लौट आएगी,
शायद मेरी चुप्पी के नीचे
फिर कुछ खिल उठेगा,
और शायद—
कलम फिर से पहचान लेगी
कि मैं कौन हूँ
और किस दर्द का रास्ता
मेरी अंगुलियों ने चुना था।
और मैं…
मैं फिर से लिखूँगी
ठीक उसी तरह
जैसे कोई घाव
अपनी ही गहराई से
कविता बनकर उठता है।
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