कविता हमेशा शब्दों के झगड़े में नहीं रहती,
वह अक्सर अपने ही भीतर
एक शांत सरोवर की तरह ठहरी रहती है,
जहाँ ध्वनियाँ डूब जाती हैं
और केवल भावों की लहरें बचती हैं।
हर कविता चाहती है—
मौन होना।
इतना मौन कि काग़ज़ की सफ़ेदी भी
उसके अर्थ को ढोने लगे,
इतना मौन कि सांसों की धीमी गिरहें
उसके छंद बन जाएँ,
इतना मौन कि तुम्हारी आँखें पढ़ लें
वह सब कुछ
जो शब्द कह नहीं पाए।
कविता जानती है
कि हर अक्षर एक बंधन है,
एक दीवार—
जिसके पीछे असली अनुभूति
कँपकँपाती रहती है
जैसे सर्द रात में
तेल के दीये की लौ।
वह चाहती है
कि तुम दीवार को नहीं,
उस काँपते उजाले को छू लो।
कविता चाहती है
कि तुम उसके भीतर उतर आओ
बिना दस्तक, बिना आवाज़,
जैसे कोई पुरानी याद
अचानक गले लग जाए
और तुम्हें पता भी न चले
कि तुम रोए कब थे।
कविता चाहती है
कि तुम उसे सुनो
उन जगहों पर
जहाँ भाषा की मरम्मत नहीं पहुँचती,
जहाँ अर्थ नहीं,
सिर्फ़ अनुभूति जीवित रहती है—
घायल, कोमल, अनकही।
हर कविता चाहती है
कि किसी एक क्षण
तुम अपने भीतर के शोर को
नींद पर उतार दो,
और जब सब शांत हो जाए—
तब वह अपना असली चेहरा दिखाए,
जो न कभी लिखा जा सकता है
न कभी बोला।
कविता चाहती है
कि तुम उसे महसूस करो—
जैसे हथेली पर रखी कोई धड़कन,
जैसे बरसों बाद मिला कोई पुराना नाम,
जैसे किसी ने तुम्हारे भीतर
बेआवाज़ फूल उगा दिए हों।
सुनो,
कविता कभी शब्द नहीं चाहती—
वह चाहती है
कि कोई उसे
पूरा, अधूरा,
टूटा, गहरा,
ठीक वैसे ही समझ ले
जैसे हम अपने दर्द को समझते हैं
बिना किसी को बताए।
और तुम—
अगर एक बार भी
इस मौन को पढ़ सको,
तो कविता तुम्हें थाम लेगी
अपने उस अंधेरे उजाले में
जहाँ भाव बोलते नहीं—
बस जिए जाते हैं।
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