उन्होंने बस अपनी आहों को मौन की चादर ओढ़ा दी है,
अब वे तड़पते कम नहीं…
बस दिखाते नहीं।
पहले जो शब्दों में बुझते थे,
अब आँखों की गहराइयों में जलते हैं,
और हम समझते हैं —
शायद दिल बदल गया।
नहीं…
बस टूट गया।
रिश्ते कमज़ोर नहीं थे,
विश्वास थक गया था,
वह बार-बार गिरकर उठते-उठते
एक दिन ज़ख्मों के बोझ से बैठ गया।
कौन बदला?
बदला सिर्फ़ इतना कि
जहाँ पहले हँसी थी,
अब आदत बनकर तटस्थता बैठ गई है
जहाँ पहले सवाल थे,
अब स्वीकृति का सांप लिपट गया है गले में।
खामोशी नया इंसान नहीं बनाती,
बस पुराने को बचा लेती है,
ताकि वह फिर से
किसी की बेरहम आवाज़ में
मर न जाए।
चुप्पी कोई विकल्प नहीं,
ये आत्मा की अंतिम सुरक्षा कवच है।
क्योंकि जब इंसान के भीतर
तूफ़ान बहुत ज़्यादा बोलने लगे,
तो होंठों की कुल्फ़ी जमानी पड़ती है।
लोग बदलते नहीं दिव्या,
वे बस अपने भीतर दफ़्न हो जाते हैं—
ताकि दुनिया उन्हें
बार-बार दफ़नाने का हक़
ना मांग सके।
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