शुक्रवार, 14 नवंबर 2025

मै जब भी टूटती हु एक नई कविता बन जाती हु

जिंदगी अपनी ही धुन में थी,
थोड़ी बेतकल्लुफ़,
थोड़ी बेफिक्र,
थोड़ी-सी मेरे जैसी—
हवा से बातें करती,
धूप को हथेलियों में पकड़ती,
कानों में झुमके झनकाते हुए चलती…

और तभी—
ठक्!
एक आवाज़ आई
जैसे तंज कर रही हो—
"चलो मैडम, अब असलियत देख लो…"
चप्पल टूट गई।

वो चप्पल…
जिसके साथ कितने रास्ते नापे थे,
कितनी शिकायतें मन में दबी थीं,
कितनी बार सोचा था—“कल बदलूँगी”,
पर आज वही
सबसे पहले बदलने की ज़िद कर बैठी।

भीड़ थी,
नज़रें थीं,
कुछ हँसी की हल्की खनक,
कुछ अफसोस की नकली साँस…
पर मैं—दिव्या
कब किसी टूटन से घबराई हूँ?

मैं बैठ गई वहीं,
अपने आँचल को थोड़ा समेटकर,
जैसे दुनिया की सारी शोरगुल
मेरी हथेलियों में समा गया हो।
उँगलियों ने चप्पल का पट्टा पकड़ा
और दिल ने अपनी बात—
"चल आगे… सफ़र अभी ख़त्म नहीं।"

चप्पल टूटने भर से
ज़िंदगी थोड़ी तिरछी ज़रूर हुई,
पर मैं जानती हूँ—
रास्ते कभी सीधे नहीं होते,
हम ही उन्हें सीधा चलकर
अपने क़दमों की इज़्ज़त बढ़ाते हैं।

लोगों के चेहरे बदले,
उनकी चाल तेज़ हुई,
किसी ने पीछे मुड़कर भी नहीं देखा—
पर मेरी मुस्कान
और भी ठहर गई।

क्योंकि हर स्त्री जानती है—
हम टूटते नहीं,
हम बस थोड़ा-सा रुककर
अपने ही जज़्बों को कसते हैं,
फिर ईश्वर को एक नज़र ऊपर देखकर
कहते हैं—
“अब देखो, कैसे चलता हूँ।”

मैंने अपने उंगलियों से
चप्पल की गाँठ बाँधी
जैसे अपना आत्म-सम्मान बाँध रही हूँ,
जैसे टूटी उम्मीद को फिर से
नीले आसमान से जोड़ रही हूँ।

और फिर,
मैं उठी—
न नई चप्पल,
न नए रास्ते।
बस एक नया हौसला लेकर।

धीरे-धीरे कदम बढ़ाए—
चप्पल की हल्की-सी चरमराहट
जैसे कह रही थी—
“हम दोनों टूटे नहीं,
बस थोड़ा-सा बन गए हैं…
और मजबूत।”

और मैं चलती रही,
ठीक उसी तरह
जैसे हर औरत चलती है—
रुकावटों को अपनी पायल में बदलती हुई,
और दर्द को अपने गीत में।

जिंदगी मौज में थी,
चप्पल टूट गई—
पर कहानी?
कहानी और खूबसूरत हो गई।
क्योंकि
हर टूटन
इक नई ताकत बनकर
कविता बन जाती है।
हर रुकावट
इक नया अध्याय लिख देती है।

और मैं…
अपने हर टूटे पल को
गले लगाकर चलती हूँ—
क्योंकि मुझे पता है—
मैं जब भी टूटती हूँ,
एक नयी कविता बन जाती हूँ।

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