शनिवार, 22 नवंबर 2025

ये खामोशियों के शोर

ये रातों के सन्नाटे,
ये खामोशियों के शोर,
कुछ अनकहा सा कहते हैं
हर सांस की सरगोशियों में छिपकर…

जब शहर की थकी-हारी रोशनियाँ
नींद के आगोश में खो जाती हैं,
तभी जागती हैं ये परछाइयाँ
दीवारों पर अपनी कहानी उकेरती हुई…

चाँद भी आजकल कुछ ज्यादा उलझा-उलझा है,
कभी बादलों में छुपकर रोता है,
तो कभी तारों के सिर पर
जगमग ताज रख देता है…

हवा का हर झोंका
जैसे अपनी पुरानी यादें ढोता है,
खिड़की के पल्लों को बजाकर
पूछता है — “सोई हो? या मेरे जैसी जाग रही हो?”

घड़ी की टिक-टिक
सिर्फ़ समय नहीं नापती,
कितने सपने टूटा करते हैं
और कितनी आँखें आँसू पीती हैं,
सबका हिसाब रखती है…

कभी-कभी लगता है
ये सन्नाटा किसी म्यूज़िक की तरह बजता है,
धीमे-धीमे,
दिल के तारों को छेड़कर
यादों की बारिश बरसा देता है…

खामोशियाँ शोर मचाती हैं
उन बातों का, जो कही न गईं—
उन चिट्ठियों का, जो लिखी तो गईं
पर भेजी कभी नहीं गईं…

ये रातें जानती हैं
कौन हँसी का मुखौटा पहनकर रोता है,
कौन दिल की राख में
अपनी उम्मीदें ढूंढता है…

ये चाँदनी सब देखती है
कि कौन टूटकर भी मुस्कुराता है,
कौन सपनों की कब्रगाह में
ख्वाहिशों के दीये जलाता है…

रातें सवाल पूछती हैं—
“क्या सुबह सच में उजाला लाएगी?
या फिर सपने हमेशा की तरह
तकिये पर दम तोड़ देंगे…?”

और हम…
हम हर बार झूठ बोल देते हैं—
“हाँ, सब ठीक होगा…”

फिर वही सन्नाटा, वही शोर—
किसी की बेचैन धड़कन जैसा,
किसी की थकी हुई आत्मा जैसा…

इन रातों में
आसमान तकिए की तरह नरम नहीं,
कभी-कभी पत्थर जैसा सख़्त होता है—
जहाँ तारे चुभते हैं
यूँ, जैसे किसी के शब्दों की नुकीली परछाईं…

मगर…
हर अँधेरे की गोद में
एक नई सुबह पल रही होती है,
तुम बस अपने सपनों की नब्ज़
धीरे-धीरे थामे रखना…

क्योंकि ये खामोशियों का शोर ही
किसी दिन चीख बनकर नहीं,
नयी शुरुआत बनकर टूटेगा—

और कहेगा—
“अँधेरा जितना होगा, उजाला उतना ही ज़्यादा चमकेगा…”

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